1.3.4.2 ताप के स्रोत
पृथ्वी के भीतर आज भी बहुत अधिक ऊष्मा मौजूद है। यही ऊष्मा मैंटल संवहन, प्लेट विवर्तनिकी, मैग्मा निर्माण, ज्वालामुखिता और भू-तापीय गतिविधियों को ऊर्जा देती है।
पृथ्वी की आंतरिक ऊष्मा किसी एक स्रोत से नहीं आती। इसके प्रमुख स्रोत हैं—
- पृथ्वी के निर्माण से बची प्रारंभिक ऊष्मा
- रेडियोधर्मी तत्वों का क्षय
- पृथ्वी के विभेदन से उत्पन्न ऊष्मा
- आंतरिक क्रोड के क्रिस्टलीकरण से मुक्त ऊष्मा
- बहुत छोटे स्तर पर ज्वारीय घर्षण और अन्य प्रक्रियाएँ
इनमें प्रारंभिक ऊष्मा और रेडियोधर्मी ऊष्मा पृथ्वी के दीर्घकालीन तापीय विकास के मुख्य स्रोत हैं।
प्रारंभिक ऊष्मा
पृथ्वी लगभग 4.54 अरब वर्ष पहले सौरमंडलीय पदार्थों के क्रमिक संचयन से बनी।
ग्रह निर्माण के दौरान छोटे-छोटे पिंड पृथ्वी से टकराते और उसमें जुड़ते गए।
इन टक्करों की गतिज ऊर्जा का बड़ा भाग ऊष्मा में बदल गया।
इसी कारण प्रारंभिक पृथ्वी अत्यंत गर्म थी।
इस निर्माणकालीन ऊष्मा का कुछ भाग आज भी पृथ्वी के भीतर सुरक्षित है।
इसे आदिम ऊष्मा (Primordial Heat) या अवशिष्ट निर्माण ऊष्मा कहा जाता है।
संपीड़न से उत्पन्न ऊष्मा
पृथ्वी के बढ़ते आकार के साथ गुरुत्वाकर्षण के कारण पदार्थ भीतर की ओर संकुचित हुआ।
इस गुरुत्वीय संपीड़न से भी ऊष्मा उत्पन्न हुई।
ग्रह निर्माण के प्रारंभिक चरण में यह प्रक्रिया महत्वपूर्ण थी।
विभेदन से उत्पन्न ऊष्मा
प्रारंभिक पृथ्वी के गर्म और आंशिक रूप से पिघले होने पर भारी तत्व, विशेषकर लौह और निकेल, केंद्र की ओर नीचे गए।
हल्के सिलिकेट पदार्थ ऊपर की ओर रहे।
इस प्रक्रिया को पृथ्वी का विभेदन (Differentiation) कहा जाता है।
भारी पदार्थों के केंद्र की ओर जाने से गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा मुक्त हुई और उसका एक भाग ऊष्मा में परिवर्तित हुआ।
इससे पृथ्वी के प्रारंभिक ताप में और वृद्धि हुई।
रेडियोधर्मी क्षय
पृथ्वी के भीतर मौजूद कुछ अस्थिर समस्थानिक समय के साथ क्षय होते हैं और इस प्रक्रिया में ऊष्मा मुक्त करते हैं।
इसे रेडियोधर्मी ऊष्मा उत्पादन (Radiogenic Heat Production) कहा जाता है।
मुख्य दीर्घजीवी रेडियोधर्मी तत्व हैं—
- यूरेनियम-238,
- यूरेनियम-235,
- थोरियम-232,
- पोटैशियम-40।
आज पृथ्वी के भीतर उत्पन्न होने वाली ऊष्मा का बड़ा भाग इन तत्वों के रेडियोधर्मी क्षय से जुड़ा है।
पर्पटी में रेडियोधर्मी ऊष्मा
यूरेनियम, थोरियम और पोटैशियम महाद्वीपीय पर्पटी की कुछ चट्टानों, विशेषकर ग्रेनाइटिक चट्टानों, में अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में मिल सकते हैं।
इसलिए महाद्वीपीय पर्पटी स्वयं भी महत्वपूर्ण रेडियोधर्मी ऊष्मा उत्पन्न करती है।
मैंटल में रेडियोधर्मी ऊष्मा
मैंटल में भी रेडियोधर्मी तत्व मौजूद हैं, लेकिन उनकी मात्रा पर्पटी के कई फेल्सिक भागों की तुलना में कम हो सकती है।
फिर भी मैंटल का आयतन बहुत बड़ा होने के कारण कुल ऊष्मा बजट में इसका योगदान महत्वपूर्ण है।
अल्पजीवी रेडियोधर्मी तत्व
पृथ्वी के शुरुआती इतिहास में कुछ अल्पजीवी रेडियोधर्मी समस्थानिक भी महत्वपूर्ण थे।
उदाहरण—
एल्युमिनियम-26।
इनका क्षय प्रारंभिक ग्रह और ग्रहाणुओं को गर्म करने में महत्वपूर्ण रहा, लेकिन आज वे लगभग पूरी तरह क्षय हो चुके हैं।
इसलिए वर्तमान पृथ्वी की ऊष्मा में उनका प्रत्यक्ष योगदान नगण्य है।
आंतरिक क्रोड का क्रिस्टलीकरण
पृथ्वी का आंतरिक क्रोड धीरे-धीरे बढ़ रहा है।
द्रव बाह्य क्रोड का लौह-समृद्ध पदार्थ ठोस होकर आंतरिक क्रोड में जुड़ता है।
इस प्रक्रिया से दो प्रकार से ऊर्जा मिलती है—
गुप्त ऊष्मा
द्रव से ठोस बनने के दौरान गुप्त ऊष्मा (Latent Heat) मुक्त होती है।
संरचनात्मक उछाल
ठोस आंतरिक क्रोड बनते समय कुछ हल्के तत्व द्रव बाह्य क्रोड में वापस चले जाते हैं।
इससे बाह्य क्रोड में घनत्व अंतर और संवहन को बढ़ावा मिलता है।
यह प्रक्रिया भू-डायनेमो को ऊर्जा देने में महत्वपूर्ण है।
क्रोड से मैंटल की ओर ऊष्मा
बाह्य क्रोड और निचले मैंटल के बीच क्रोड–मैंटल सीमा (Core–Mantle Boundary) स्थित है।
यहाँ से ऊष्मा क्रोड से मैंटल की ओर स्थानांतरित हो सकती है।
यह ऊष्मा—
- गहरे मैंटल संवहन,
- मैंटल प्लूम,
- भू-डायनेमो के तापीय विकास
से जुड़ी है।
इस सीमा पर ऊष्मा प्रवाह स्थान-स्थान पर समान नहीं होता।
ऊष्मा के स्थानांतरण की विधियाँ
पृथ्वी के भीतर ऊष्मा तीन प्रमुख तरीकों से स्थानांतरित होती है।
चालन
ठोस पदार्थ में बिना बड़े पैमाने पर पदार्थ के स्थानांतरण के ऊष्मा का फैलना चालन (Conduction) कहलाता है।
पृथ्वी की कठोर पर्पटी और स्थलमंडल में इसका विशेष महत्व है।
संवहन
गरम पदार्थ का ऊपर उठना और ठंडे पदार्थ का नीचे जाना संवहन (Convection) कहलाता है।
मैंटल में संवहन अत्यंत धीमा है, लेकिन करोड़ों वर्षों में यह पृथ्वी की भू-गतिशीलता को नियंत्रित करता है।
बाह्य क्रोड में द्रव संवहन भू-चुंबकीय क्षेत्र के निर्माण से जुड़ा है।
द्रव-प्रवाह आधारित ऊष्मा परिवहन
मैग्मा, गरम जल और जल-तापीय द्रव ऊष्मा को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जा सकते हैं।
इसे द्रव-प्रवाह आधारित ऊष्मा परिवहन (Advection) के रूप में समझा जा सकता है।
मध्य-महासागरीय कटकों के जल-तापीय तंत्र इसका प्रमुख उदाहरण हैं।
पृथ्वी का ऊष्मा बजट
पृथ्वी लगातार अंतरिक्ष में आंतरिक ऊष्मा खो रही है।
वैश्विक सतही ऊष्मा प्रवाह का अनुमान लगभग 47 टेरावाट के क्रम में दिया जाता है, यद्यपि अलग-अलग अध्ययनों में कुछ अंतर मिलता है।
इस कुल ऊष्मा का एक भाग रेडियोधर्मी क्षय से लगातार उत्पन्न होता है और शेष पृथ्वी के क्रमिक शीतलन तथा प्रारंभिक ऊष्मा से आता है।
परीक्षा की महत्वपूर्ण बात
पृथ्वी आज भी धीरे-धीरे ठंडी हो रही है।
लेकिन रेडियोधर्मी क्षय जैसे आंतरिक स्रोत इस शीतलन की गति को कम करते हैं।
यूरे अनुपात
पृथ्वी विज्ञान में यूरे अनुपात (Urey Ratio) उस अनुपात को कहते हैं जिसमें रेडियोधर्मी ऊष्मा उत्पादन की तुलना कुल आंतरिक ऊष्मा हानि से की जाती है।
सरल अर्थ में यह बताता है कि वर्तमान ऊष्मा प्रवाह का कितना भाग रेडियोधर्मी स्रोतों द्वारा भरा जा रहा है।
इसके सटीक मान पर अलग-अलग मॉडल हैं।
2026 की एक समीक्षा ने आधुनिक मैंटल तापीय मॉडलों में वर्तमान मैंटल यूरे अनुपात को लगभग 0.25 के क्रम में रखने वाले परिणामों पर चर्चा की।
यह एक उन्नत वैज्ञानिक अवधारणा है; प्रारंभिक परीक्षा के लिए इसकी संख्या से अधिक इसका अर्थ महत्वपूर्ण है।
भूतापीय ऊर्जा और पृथ्वी के ताप स्रोत
भूतापीय ऊर्जा पृथ्वी की इसी आंतरिक ऊष्मा का उपयोग करती है।
गरम जल, भाप या गर्म चट्टानों से ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है।
यह ऊर्जा सूर्य पर प्रत्यक्ष निर्भर नहीं होती और अनेक क्षेत्रों में दिन-रात उपलब्ध रह सकती है।
लेकिन संसाधन का व्यावसायिक उपयोग स्थानीय भूविज्ञान, तापमान, जल, गहराई और चट्टानी पारगम्यता पर निर्भर करता है।
भारत में भूतापीय ताप
भारत में भूतापीय गतिविधि कई विवर्तनिक क्षेत्रों से जुड़ी है।
प्रमुख उदाहरण—
- पुगा घाटी, लद्दाख,
- मणिकरण, हिमाचल प्रदेश,
- तत्तापानी, छत्तीसगढ़,
- बकरेश्वर, पश्चिम बंगाल,
- कैम्बे क्षेत्र, गुजरात।
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने 381 गरम जल स्रोतों का दस्तावेजीकरण किया है।
राष्ट्रीय भूतापीय ऊर्जा नीति, 2025
भारत सरकार ने सितंबर 2025 में राष्ट्रीय भूतापीय ऊर्जा नीति (National Policy on Geothermal Energy) अधिसूचित की।
नीति में—
- अन्वेषण,
- अनुसंधान,
- उन्नत ड्रिलिंग,
- बिजली उत्पादन,
- प्रत्यक्ष ताप उपयोग,
- परित्यक्त तेल और गैस कुओं का पुनः उपयोग,
- अंतरराष्ट्रीय सहयोग
को बढ़ावा देने की बात कही गई है।
भारत की सैद्धांतिक भूतापीय क्षमता लगभग 10,600 मेगावाट आँकी गई है।
पुगा घाटी, 2026
जुलाई 2026 में लद्दाख की पुगा घाटी में भारत के पहले 2 भूतापीय कुएँ चालू किए गए।
दोनों लगभग 1,000 मीटर गहरे हैं।
इनका उद्देश्य भविष्य की 1 मेगावाट प्रदर्शन परियोजना के लिए भूतापीय भंडार का मूल्यांकन करना है।
यह पृथ्वी की आंतरिक ऊष्मा के व्यावहारिक उपयोग का भारत का महत्वपूर्ण समसामयिक उदाहरण है।
2026 का वैज्ञानिक अद्यतन
जून 2026 में प्रकाशित पृथ्वी के मैंटल के तापीय इतिहास की समीक्षा ने आधुनिक तापीय बजट, प्राथमिक मैग्मा और भू-रासायनिक आँकड़ों को एक साथ जोड़कर पृथ्वी के क्रमिक शीतलन का विश्लेषण किया।
अध्ययन का मुख्य संदेश यह है कि—
पृथ्वी का वर्तमान ताप केवल रेडियोधर्मी ऊष्मा से नहीं, बल्कि दीर्घकालीन अवशिष्ट ऊष्मा और निरंतर शीतलन से भी नियंत्रित होता है।
यह पृथ्वी के ताप स्रोतों की मिश्रित प्रकृति को पुष्ट करता है।
सत्यापित UPSC प्रारंभिक परीक्षा PYQ
UPSC प्रारंभिक परीक्षा, 2013
प्रश्न में निम्न कारकों में से पृथ्वी की सतह पर गतिशील परिवर्तन लाने वाले कारक पूछे गए थे—
- विद्युतचुंबकीय विकिरण,
- भूतापीय ऊर्जा,
- गुरुत्वीय बल,
- प्लेट गतियाँ,
- पृथ्वी का घूर्णन,
- पृथ्वी का परिक्रमण।
सही उत्तर: सभी।
यह भूतापीय ऊर्जा को पृथ्वी की गतिशील प्रक्रियाओं के कारक के रूप में पहचानने वाला प्रत्यक्ष प्रश्न है।
सत्यापित UPSC मुख्य परीक्षा PYQ
पृथ्वी के आंतरिक ताप के स्रोतों को अकेले पूछने वाला प्रत्यक्ष UPSC सामान्य अध्ययन मुख्य परीक्षा प्रश्न सत्यापित नहीं मिला।
इसलिए कोई अभ्यास प्रश्न PYQ के रूप में नहीं जोड़ा गया है।
सत्यापित BPSC प्रारंभिक परीक्षा PYQ
BPSC संयुक्त प्रतियोगिता प्रारंभिक परीक्षा में पृथ्वी के आंतरिक ताप स्रोतों पर प्रत्यक्ष, वर्ष-सहित सत्यापित प्रश्न नहीं मिला।
इसलिए कोई अनुमानित प्रश्न नहीं जोड़ा गया है।
सत्यापित BPSC मुख्य परीक्षा PYQ
71वीं BPSC मुख्य परीक्षा, 2026 — सामान्य अध्ययन-II
प्रश्न:
“उपयुक्त उदाहरणों सहित भारत में भूतापीय ऊर्जा के पर्यावरणीय और सामाजिक लाभों का विवरण दीजिए।”
यह पृथ्वी की आंतरिक ऊष्मा के उपयोग पर प्रत्यक्ष और अत्यंत प्रासंगिक मुख्य परीक्षा प्रश्न है।
प्रारंभिक परीक्षा के अंतिम तथ्य
पृथ्वी के ताप के 2 सबसे महत्वपूर्ण दीर्घकालीन स्रोत—आदिम ऊष्मा और रेडियोधर्मी क्षय।
यूरेनियम, थोरियम और पोटैशियम प्रमुख रेडियोधर्मी ऊष्मा स्रोत हैं।
विभेदन ने प्रारंभिक पृथ्वी में ऊष्मा उत्पन्न की।
आंतरिक क्रोड के क्रिस्टलीकरण से गुप्त ऊष्मा मुक्त होती है।
बाह्य क्रोड संवहन को संरचनात्मक उछाल से भी ऊर्जा मिलती है।
स्थलमंडल में चालन और मैंटल में संवहन महत्वपूर्ण हैं।
पृथ्वी आज भी धीरे-धीरे ठंडी हो रही है।
निष्कर्ष
पृथ्वी की आंतरिक ऊष्मा निर्माणकालीन अवशिष्ट ऊर्जा, रेडियोधर्मी क्षय, विभेदन और क्रोड क्रिस्टलीकरण की संयुक्त देन है। यह ऊष्मा पृथ्वी को भूवैज्ञानिक रूप से सक्रिय बनाए रखती है और प्लेट विवर्तनिकी से लेकर भू-चुंबकीय क्षेत्र तक अनेक प्रक्रियाओं को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ऊर्जा देती है।