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धर्म परिवर्तन और आरक्षण; लेह में उच्च न्यायालय की खंडपीठ

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आरक्षण की पात्रता, अनुच्छेद 16(4) और 341, अनुसूचित जाति आदेश तथा लद्दाख में न्याय तक पहुँच।

21 अक्टूबर 2026

चर्चा में क्यों?

सर्वोच्च न्यायालय ने 15 अक्टूबर 2026 को तमिलनाडु सरकार बनाम समीर अहमद से जुड़े मामले में मद्रास उच्च न्यायालय के निर्णय में हस्तक्षेप से इनकार किया। विवाद मार्च 2024 के उस शासनादेश से जुड़ा था, जिसके आधार पर हिंदू धर्म से इस्लाम में धर्मांतरित व्यक्ति को उसकी पूर्व सामाजिक स्थिति के सहारे अधिसूचित पिछड़ा वर्ग मुस्लिम समुदाय का प्रमाणपत्र दिया जा सकता था।

निर्णय का केंद्रीय प्रश्न यह है कि क्या धर्मांतरण से किसी व्यक्ति की पुरानी जातिगत स्थिति अपने आप दूसरे धर्म के किसी अधिसूचित पिछड़े समुदाय की सदस्यता में बदल जाती है। न्यायालय ने ऐसे स्वतः हस्तांतरण को स्वीकार नहीं किया; संबंधित समुदाय से वास्तविक सामाजिक और वैधानिक संबंध स्थापित करना आवश्यक है।

न्यायिक पहुँच से जुड़े दूसरे घटनाक्रम में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने 18 अक्टूबर को लेह के मेलोंगथांग में जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय की लद्दाख खंडपीठ का उद्घाटन किया। इसका कामकाज 21 अक्टूबर 2026 से आरंभ होना निर्धारित है।

आरक्षण: निर्णय के मुख्य बिंदु

  • धर्म परिवर्तन और समुदाय की सदस्यता अलग प्रश्न हैं। धर्मांतरण का प्रमाण अपने आप किसी अधिसूचित पिछड़े वर्ग की सदस्यता का अंतिम प्रमाण नहीं बनता।
  • निजी धार्मिक संस्था की सीमा: जमात जैसे निकाय का प्रमाणपत्र धर्मांतरण की पुष्टि कर सकता है; वैधानिक जाति या पिछड़ा वर्ग प्रमाणपत्र देने का अधिकार सक्षम सार्वजनिक प्राधिकारी के पास रहता है।
  • अनुसूचित जाति की धार्मिक शर्त: संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के पैरा 3 में हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म का उल्लेख है। सिखों को 1956 और बौद्धों को 1990 में इस प्रावधान में जोड़ा गया। केवल धर्म संबंधी शर्त पूरी करना पर्याप्त नहीं; संबंधित राज्य या संघ राज्यक्षेत्र की अधिसूचित जाति का सदस्य होना भी आवश्यक है।
  • अलग कानूनी आधार: अनुसूचित जाति की सूची और पिछड़े वर्ग की सूची एक ही व्यवस्था नहीं हैं। अनुसूचित जाति संबंधी नियम से यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि सभी मुस्लिम या ईसाई समुदाय अन्य पिछड़े वर्ग के आरक्षण से बाहर हैं।
  • निर्णय का दायरा: जन्म-पूर्व या धर्मांतरण-पूर्व पिछड़ेपन को बिना आवश्यक सामाजिक-वैधानिक संबंध के नए अधिसूचित समुदाय का दर्जा देने का आधार नहीं माना जा सकता।

एनसीईआरटी से संबंध

कक्षा 11, भारतीय संविधान: सिद्धांत और व्यवहार—मौलिक अधिकार तथा न्यायपालिका; कक्षा 12, भारतीय समाज—सामाजिक विषमता और बहिष्कार।

स्थिर आधार • सीधे पढ़ें

प्रावधानविषयक्या याद रखें?
अनुच्छेद 15(4)सामाजिक व शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग; अनुसूचित जाति/जनजातिइनकी उन्नति के लिए विशेष प्रावधान बनाने की अनुमति।
अनुच्छेद 16(4)सार्वजनिक सेवाओं में आरक्षणराज्य की राय में पर्याप्त प्रतिनिधित्व न रखने वाले नागरिकों के पिछड़े वर्ग के लिए सक्षमकारी प्रावधान।
अनुच्छेद 341(1)अनुसूचित जातियों की पहली अधिसूचनाराष्ट्रपति अधिसूचित करते हैं; राज्य के मामले में राज्यपाल से परामर्श होता है।
अनुच्छेद 341(2)अनुसूचित जाति सूची में समावेशन या अपवर्जनपरिवर्तन संसद कानून बनाकर करती है; राज्य कार्यपालिका अपने आदेश से सूची नहीं बदल सकती।
अनुच्छेद 25अंतःकरण व धर्म की स्वतंत्रताधर्म की स्वतंत्रता और किसी विशेष आरक्षण श्रेणी की पात्रता के अपने-अपने संवैधानिक परीक्षण हैं।
अनुच्छेद 39Aसमान न्याय व निःशुल्क विधिक सहायताआर्थिक या अन्य अक्षमताओं से न्याय का अवसर बाधित न हो।

इंद्रा साहनी वाद (1992) पिछड़े वर्ग की पहचान, आरक्षण और क्रीमी लेयर की बहस का प्रमुख निर्णय है। गैर-हिंदू समाजों में सामाजिक वंचना की वास्तविकता का आकलन संभव है; उसे केवल धार्मिक समानता के सैद्धांतिक दावे से समाप्त मान लेना उचित नहीं। पहचान का आधार लागू कानून, सूची और प्रमाण होते हैं।

लेह खंडपीठ: न्याय का भौगोलिक विकेंद्रीकरण

लगभग 3,500 मीटर की ऊँचाई पर स्थित यह खंडपीठ भारत की सबसे अधिक ऊँचाई पर स्थित उच्च न्यायालय खंडपीठ के रूप में चर्चित है। प्रारंभ में सप्ताह में दो दिन सुनवाई और लगभग 75 मामलों की सूची तैयार करने की व्यवस्था बताई गई है। उद्घाटन पीठ के लिए मुख्य न्यायाधीश पुष्पेंद्र सिंह भाटी और न्यायमूर्ति संजय परिहार के नाम घोषित किए गए।

लेह और कारगिल के लोगों को उच्च न्यायालय के काम के लिए जम्मू या श्रीनगर तक यात्रा करनी पड़ती थी। दूरी, मौसमी दर्रे, परिवहन और रहने का खर्च न्याय की वास्तविक लागत बढ़ाते हैं। स्थानीय खंडपीठ, ई-फाइलिंग, दस्तावेज प्रबंधन और वीडियो माध्यम से सुनवाई इन बाधाओं को घटा सकते हैं। हरित परिसर और डिजिटल भर्ती जैसी पहलें संस्थागत आधुनिकीकरण का भाग हैं।

संवैधानिक संबंध: अनुच्छेद 214 उच्च न्यायालयों तथा अनुच्छेद 231 साझा उच्च न्यायालय की व्यवस्था से संबंधित हैं। लेह की खंडपीठ उसी उच्च न्यायालय का भाग है; यह अलग नया उच्च न्यायालय नहीं है।

मुख्य परीक्षा: सामाजिक न्याय और संस्थागत क्षमता

महत्त्व: प्रमाण-आधारित पात्रता वास्तविक वंचितों तक लाभ पहुँचाने, प्रशासनिक विवेक को नियंत्रित करने और आरक्षण की संवैधानिक वैधता बनाए रखने में सहायक है। दूसरी ओर न्याय की स्थानीय उपलब्धता बताती है कि अधिकार तभी उपयोगी होते हैं जब नागरिक उन्हें व्यवहार में प्राप्त कर सके।

चुनौती: धर्म परिवर्तन से सामाजिक अपमान, पेशागत वंचना या गरीबी हर स्थिति में समाप्त नहीं होती। इसलिए कानूनी सूची की शर्तों और सामाजिक वास्तविकता का संतुलित अध्ययन जरूरी है। सच्चर समिति और रंगनाथ मिश्र आयोग के निष्कर्ष इस व्यापक विमर्श की पृष्ठभूमि देते हैं; उन्हें किसी विशेष मामले के अंतिम न्यायिक निष्कर्ष के समान नहीं माना जाना चाहिए।

आगे की राह: पिछड़ा वर्ग आयोगों के विश्वसनीय सर्वेक्षण, स्पष्ट प्रमाणपत्र प्रक्रिया, कारण-सहित आदेश और प्रभावी अपील प्रणाली विकसित हों। लद्दाख जैसे दुर्गम क्षेत्रों में खंडपीठ के साथ पर्याप्त कर्मचारी, स्थानीय भाषाई सहायता, विधिक सहायता और टिकाऊ डिजिटल संपर्क भी उपलब्ध कराया जाए।

विगत वर्ष के वास्तविक प्रश्न

UPSC 2022 • प्रारंभिक परीक्षा • सामान्य अध्ययन-I

प्रश्न 73 • प्रश्नपुस्तिका A

यदि किसी विशिष्ट क्षेत्र को भारत के संविधान की पाँचवीं अनुसूची के अधीन लाया जाए, तो निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा एक इसके परिणाम को सर्वोत्तम रूप से प्रतिबिंबित करता है?

मूल अंग्रेज़ी प्रश्न

If a particular area is brought under the Fifth Schedule of the Constitution of India, which one of the following statements best reflects the consequence of it?

  • (a) This would prevent the transfer of land of tribal people to non-tribal people.
  • (b) This would create a local self-governing body in that area.
  • (c) This would convert that area into a Union Territory.
  • (d) The State having such areas would be declared a Special Category State.
  • (a) इससे जनजातीय लोगों की जमीनों का गैर-जनजातीय लोगों को अंतरण रुकेगा।
  • (b) इससे उस क्षेत्र में एक स्थानीय स्वशासी निकाय का सृजन होगा।
  • (c) इससे वह क्षेत्र एक संघ राज्यक्षेत्र में बदल जाएगा।
  • (d) जिस राज्य के पास ऐसे क्षेत्र होंगे, उसे विशेष कोटि का राज्य घोषित किया जाएगा।
सही उत्तर और विस्तृत व्याख्या

सही उत्तर: (a) इससे जनजातीय लोगों की जमीनों का गैर-जनजातीय लोगों को अंतरण रुकेगा।

पाँचवीं अनुसूची अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन तथा संरक्षण की विशेष व्यवस्था है। इसके पैरा 5 के अंतर्गत राज्यपाल जनजातीय भूमि के हस्तांतरण को प्रतिबंधित या सीमित करने और भूमि आवंटन को नियंत्रित करने के विनियम बना सकते हैं। अतः विकल्प (a) सही है। केवल अनुसूची लागू होने से क्षेत्र संघ राज्यक्षेत्र या राज्य विशेष श्रेणी का राज्य नहीं बनता। अनुसूचित जाति की सूची का अनुच्छेद 341 और अनुसूचित क्षेत्रों की पाँचवीं अनुसूची अलग संवैधानिक विषय हैं।

प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास

अनुसूचित जातियों और पिछड़े वर्गों के आरक्षण के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. अनुच्छेद 341 के अंतर्गत अधिसूचित अनुसूचित जाति सूची में समावेशन या अपवर्जन का अधिकार संबंधित राज्य के विधानमंडल को है।
  2. संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के पैरा 3 में हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म का उल्लेख है।
  3. धर्मांतरण का निजी धार्मिक प्रमाणपत्र अपने आप किसी अधिसूचित पिछड़े वर्ग मुस्लिम समुदाय की सदस्यता का निर्णायक प्रमाण है।

उपर्युक्त में से सही विकल्प चुनिए।

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2
  • (c) केवल 2 और 3
  • (d) 1, 2 और 3
सही उत्तर और विस्तृत व्याख्या

सही उत्तर: (b) केवल 2

कथन 1 गलत है: अनुच्छेद 341(2) के अंतर्गत सूची बदलने के लिए संसद का कानून आवश्यक है। कथन 2 सही है; फिर भी व्यक्ति का संबंधित अधिसूचित जाति का सदस्य होना जरूरी रहता है। कथन 3 गलत है: धर्मांतरण की पुष्टि और वैधानिक पिछड़ा वर्ग दर्जे का निर्धारण अलग प्रक्रियाएँ हैं।

मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न

“धर्म परिवर्तन के पश्चात आरक्षण की पात्रता का निर्धारण धर्मांतरण-पूर्व जातिगत पहचान के स्वतः हस्तांतरण से नहीं, बल्कि अनुभवजन्य साक्ष्य और संवैधानिक मापदंडों से होना चाहिए।” अनुच्छेद 16(4) तथा 341 के संदर्भ में परीक्षण कीजिए।

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स्रोत और संदर्भ