डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना: साइबर भरोसा, भाषाई समावेशन और खुले मानक
भारत की डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना की वैश्विक उपयोगिता, साइबर भरोसे, भाषाई समावेशन और खुले अंतःसंचालनीय मानकों पर 15 अंक/250 शब्द का आदर्श उत्तर।
प्रश्न
अभ्यास प्रश्न
भारत के डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) की वैश्विक उपयोगिता उसके पैमाने से आती है, जबकि उसकी टिकाऊ विश्वसनीयता साइबर भरोसे, भाषाई समावेशन और खुले अंतःसंचालनीय मानकों पर निर्भर है। चर्चा कीजिए।
प्रश्न की मांग
- UPI, DBT आदि के पैमाने और सार्वजनिक मूल्य को बताना है।
- eMudhra प्रकरण से डिजिटल भरोसे और प्रमाणपत्र-श्रृंखला की संवेदनशीलता समझानी है।
- BHASHINI जैसे प्रयासों से भाषाई समावेशन और खुले मानकों को जोड़ना है।
आदर्श उत्तर
भूमिका: डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) ऐसी साझा डिजिटल प्रणालियाँ हैं जिन पर सरकार, निजी क्षेत्र और नागरिक अनेक सेवाएँ विकसित कर सकते हैं। भारत में UPI, डिजिटल पहचान और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण ने बड़े पैमाने पर इसकी उपयोगिता सिद्ध की है।
पैमाने का लाभ: UPI ने कम लागत वाले त्वरित भुगतान को जनसुलभ बनाया, जबकि DBT ने कल्याणकारी हस्तांतरण को लक्षित और प्रत्यक्ष किया। साझा rails पर नवाचार से नए वित्तीय और शासन-आधारित अनुप्रयोग तेजी से बनते हैं।
साइबर भरोसा: eMudhra intermediate CA से जुड़ी कमजोरियों ने दिखाया कि सार्वजनिक-कुंजी अवसंरचना में एक कमजोर कड़ी भी व्यापक भरोसे को प्रभावित कर सकती है। इसलिए मजबूत cryptography, key-generation audit, certificate revocation, incident disclosure और स्वतंत्र सुरक्षा परीक्षण आवश्यक हैं।
भाषाई समावेशन: BHASHINI–IISc का सौराष्ट्र वाक् मॉडल बताता है कि DPI तभी समावेशी होगा जब कम-संसाधन भाषाओं और स्थानीय लिपियों में भी सेवाएँ उपलब्ध हों।
खुले मानक: अंतःसंचालनीय प्रोटोकॉल vendor lock-in घटाते हैं, प्रतिस्पर्धा बढ़ाते हैं और विभिन्न प्रणालियों को जोड़ते हैं। लेकिन गोपनीयता, सहमति, बहिष्करण और डिजिटल साक्षरता पर समान ध्यान चाहिए।
निष्कर्ष: भारत का DPI मॉडल तभी वैश्विक सार्वजनिक डिजिटल वस्तु बन सकता है जब पैमाना + सुरक्षा + समावेशन + अंतःसंचालनीयता एक साथ सुनिश्चित हों।
मूल्यवर्धन
- DPI की सफलता केवल transaction volume नहीं; trust, accessibility और portability भी मापदंड हैं।
- Cybersecurity को बाद की परत नहीं, design principle मानें।