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महत्वपूर्ण अधिनियम • 1784

पिट्स इंडिया एक्ट, 1784

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ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक कार्यों और भारतीय राजनीतिक प्रशासन को अलग करते हुए ब्रिटिश सरकार के प्रत्यक्ष राजनीतिक नियंत्रण की स्थायी दोहरी व्यवस्था स्थापित करने वाला निर्णायक अधिनियम।

1784विलियम पिटबोर्ड ऑफ कंट्रोलदोहरा नियंत्रणUPSC • BPSC
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त्वरित तथ्य

पारित वर्ष1784 (अगस्त 1784)
ब्रिटिश प्रधानमंत्रीविलियम पिट ‘द यंगर’
तत्कालीन गवर्नर-जनरलवारेन हेस्टिंग्स
नई प्रमुख संस्था6 सदस्यीय बोर्ड ऑफ कंट्रोल (Board of Control)
शासन का स्वरूपकोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स + बोर्ड ऑफ कंट्रोल का दोहरा नियंत्रण
संबद्ध पूरक कानून1786 का अधिनियम — कॉर्नवालिस को परिषद पर विशेष वीटो/ओवरराइड शक्ति और कमांडर-इन-चीफ पद

1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और आवश्यकता

1773 के रेगुलेटिंग एक्ट के बाद भी कंपनी शासन में कई समस्याएँ बनी रहीं। वारेन हेस्टिंग्स और उनकी चार सदस्यीय परिषद के विरोधी बहुमत के बीच लगातार संघर्ष से कार्यपालिका में गतिरोध पैदा हुआ। कलकत्ता सुप्रीम कोर्ट और गवर्नर-जनरल की परिषद के अधिकार-क्षेत्र का विवाद भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था, यद्यपि 1781 के संशोधनात्मक अधिनियम ने कुछ सीमाएँ स्पष्ट की थीं।

1783 में लॉर्ड नॉर्थ और चार्ल्स जेम्स फॉक्स की गठबंधन सरकार ने ‘फॉक्स ईस्ट इंडिया बिल’ पेश किया। वह हाउस ऑफ कॉमन्स में पारित हुआ, पर हाउस ऑफ लॉर्ड्स में गिर गया और सरकार भी गिर गई। इसके बाद विलियम पिट ‘द यंगर’ सत्ता में आए और 1784 में नया कानून पारित कराया।

2. अधिनियम के मूल उद्देश्य

1.
1773 की प्रशासनिक कमियों का सुधार: गवर्नर-जनरल की कार्यपालिका को अधिक निर्णयक्षम बनाना।
2.
व्यापार और राजनीति का पृथक्करण: कंपनी के वाणिज्यिक काम और भारतीय राजनीतिक-प्रशासनिक कार्यों को अलग-अलग नियंत्रण में रखना।
3.
ब्रिटिश क्राउन की सर्वोच्चता: कंपनी के भारतीय प्रदेशों पर ब्रिटिश सरकार की अंतिम राजनीतिक संप्रभुता को स्पष्ट करना।
4.
प्रेसीडेंसियों पर केंद्रीय नियंत्रण: मद्रास और बॉम्बे द्वारा स्वतंत्र युद्ध और संधियों पर रोक लगाना।

3. दोहरे नियंत्रण की प्रणाली

अधिनियम ने कंपनी के काम को दो श्रेणियों में बाँटा—वाणिज्यिक और राजनीतिक। इससे ब्रिटेन में एक ऐसी दोहरी शासन व्यवस्था बनी जो 1858 तक चली।

निकायसंरचनामुख्य दायित्व
कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्सकंपनी के शेयरधारकों द्वारा चुने गए 24 निदेशकव्यापारिक और वाणिज्यिक मामलों का प्रबंधन
बोर्ड ऑफ कंट्रोल6 कमिश्नर—ब्रिटिश वित्त मंत्री, एक राज्य सचिव और 4 प्रिवी काउंसिल सदस्यभारत के नागरिक, सैन्य और राजस्व/राजनीतिक मामलों का पर्यवेक्षण और नियंत्रण

बोर्ड ऑफ कंट्रोल को भारत भेजे जाने वाले राजनीतिक आदेशों और पत्रों को अनुमोदित, संशोधित या निरस्त करने की शक्ति थी। इस प्रकार व्यापार कंपनी के पास रहा, लेकिन भारतीय शासन का राजनीतिक नियंत्रण ब्रिटिश सरकार के हाथ में अधिक स्पष्ट रूप से चला गया।

4. अन्य प्रमुख वैधानिक एवं प्रशासनिक प्रावधान

4.1 “British Possessions in India”

कंपनी के अधीन भारतीय क्षेत्रों के लिए पहली बार आधिकारिक रूप से “भारत में ब्रिटिश आधिपत्य का क्षेत्र” (British Possessions in India) पद का प्रयोग किया गया।

4.2 गवर्नर-जनरल की परिषद का पुनर्गठन

कार्यकारी परिषद के सदस्यों की संख्या 4 से घटाकर 3 कर दी गई। इससे गवर्नर-जनरल के लिए निर्णायक मत के सहारे बहुमत बनाना अपेक्षाकृत आसान हुआ और 1773 के बाद पैदा हुए लगातार गतिरोध को कम करने का प्रयास किया गया।

4.3 मद्रास और बॉम्बे की अधीनता

प्रांतीय परिषदों की सदस्य संख्या भी घटाई गई और मद्रास तथा बॉम्बे के गवर्नरों को बंगाल के गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल के अधीन किया गया। बंगाल की पूर्व अनुमति के बिना युद्ध या शांति-संधि करने की स्वतंत्रता सीमित कर दी गई।

4.4 विस्तारवादी युद्धों के विरुद्ध नीतिगत घोषणा

अधिनियम की प्रस्तावना में विजय और साम्राज्य विस्तार की नीति को ब्रिटिश राष्ट्र की इच्छा और सम्मान के विरुद्ध बताया गया। व्यवहार में बाद के गवर्नर-जनरलों ने विस्तारवादी नीति अपनाई, इसलिए यह प्रावधान एक महत्वपूर्ण सैद्धांतिक घोषणा होकर रह गया।

4.5 गुप्त समिति

कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के भीतर 3 सदस्यों की Committee of Secrecy बनाई गई, जिसके माध्यम से अत्यंत गोपनीय रणनीतिक आदेश भारत भेजे जा सकते थे।

4.6 भ्रष्टाचार-नियंत्रण

कंपनी के सिविल और सैन्य अधिकारियों के लिए संपत्ति की घोषणा तथा इंग्लैंड में दुराचार से संबंधित मुकदमों के लिए विशेष न्यायालय की व्यवस्था का प्रावधान किया गया।

5. 1786 का पूरक अधिनियम

लॉर्ड कॉर्नवालिस ने गवर्नर-जनरल का पद स्वीकार करने से पहले दो प्रमुख शर्तें रखीं—विशेष परिस्थितियों में परिषद के निर्णयों को ओवरराइड करने की शक्ति और गवर्नर-जनरल के साथ कमांडर-इन-चीफ का पद। 1786 के अधिनियम ने इन मांगों को स्वीकार किया और केंद्रीय कार्यपालिका को और मजबूत बनाया।

6. संवैधानिक एवं प्रशासनिक महत्व

1.
ब्रिटिश सरकार का राजनीतिक प्रभुत्व: कंपनी की भारतीय विदेश, सैन्य और राजस्व नीति पर ब्रिटिश सरकार का औपचारिक प्रभाव बढ़ा।
2.
केंद्रीकरण: बंगाल की मद्रास और बॉम्बे पर वास्तविक राजनीतिक सर्वोच्चता अधिक मजबूत हुई।
3.
सुदृढ़ कार्यपालिका: परिषद की सदस्य संख्या में कमी और 1786 की ओवरराइड शक्ति ने गवर्नर-जनरल की स्थिति मजबूत की।
4.
दीर्घकालिक संस्थागत ढाँचा: यह दोहरी नियंत्रण व्यवस्था 1858 तक कंपनी शासन की मूल संरचना बनी रही।

7. कमियाँ और सीमाएँ

  • दोहरा नियंत्रण: बोर्ड ऑफ कंट्रोल और कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के अधिकारों की सीमा पर खींचतान बनी रही।
  • दो स्वामियों की समस्या: भारत में गवर्नर-जनरल को लंदन की दो संस्थाओं से निर्देश मिल सकते थे, जिससे प्रशासनिक भ्रम पैदा होता था।
  • विस्तारवाद पर रोक असफल: बाद में वेलेजली और अन्य प्रशासकों के समय ब्रिटिश साम्राज्य विस्तार जारी रहा।

8. परीक्षा अभ्यास

प्रारंभिक अभ्यास

कथन: (1) बोर्ड ऑफ कंट्रोल कंपनी के वाणिज्यिक मामलों के प्रबंधन के लिए बना था। (2) गवर्नर-जनरल की परिषद 4 से घटाकर 3 की गई। (3) मद्रास और बॉम्बे को युद्ध और शांति के मामलों में बंगाल के अधीन किया गया।

सही उत्तर: केवल 2 और 3। वाणिज्यिक मामले कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के पास रहे, जबकि बोर्ड ऑफ कंट्रोल राजनीतिक, नागरिक, सैन्य और राजस्व मामलों से जुड़ा था।

मुख्य परीक्षा

प्रश्न: “1784 का पिट्स इंडिया एक्ट 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट के दोषों का तार्किक समाधान था, जिसने ब्रिटिश प्रशासनिक केंद्रीकरण को संस्थागत आधार दिया।” परीक्षण कीजिए।

9. त्वरित पुनरावृत्ति

  • 1784 = विलियम पिट ‘द यंगर’
  • दोहरा नियंत्रण = Court of Directors + Board of Control
  • Board of Control = 6 सदस्य
  • पहली बार “British Possessions in India”
  • गवर्नर-जनरल की परिषद = 4 से 3
  • 1786 = कॉर्नवालिस की ओवरराइड/वीटो शक्ति + कमांडर-इन-चीफ
  • व्यवस्था का अंत = 1858 में कंपनी शासन समाप्त होने के साथ