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महत्वपूर्ण अधिनियम • 1833

चार्टर एक्ट, 1833

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कंपनी की व्यापारिक पहचान को समाप्त कर उसे शुद्ध प्रशासनिक संस्था बनाने, ‘भारत के गवर्नर-जनरल’ का पद सृजित करने और पूरे ब्रिटिश भारत की विधायी शक्ति को केंद्र में समेटने वाला ऐतिहासिक अधिनियम।

1833सेंट हेलेना एक्टविलियम बेंटिकमैकालेUPSC • BPSC
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त्वरित तथ्य

पारित1833; लागू 1834
अन्य नामसेंट हेलेना अधिनियम (Saint Helena Act)
भारत के प्रथम गवर्नर-जनरललॉर्ड विलियम बेंटिक
प्रथम विधि सदस्यलॉर्ड टी. बी. मैकाले
प्रथम विधि आयोग1834, मैकाले की अध्यक्षता
कंपनी की नई स्थितिसभी व्यापारिक गतिविधियों से बाहर; शुद्ध प्रशासनिक निकाय

1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उद्देश्य

1830 के दशक में ब्रिटेन में ह्विग राजनीति, 1832 का संसदीय सुधार अधिनियम, उपयोगितावादी विचार और औद्योगिक पूँजी का प्रभाव बढ़ रहा था। भारत में लॉर्ड विलियम बेंटिक के प्रशासनिक-सामाजिक सुधारों और एक समान संहिताबद्ध कानून की मांग ने अधिक केंद्रीकृत शासन की दिशा मजबूत की। 1813 के बाद भी चाय और चीन व्यापार पर कंपनी का एकाधिकार बचा था, जिसे ब्रिटिश व्यापारी समाप्त कराना चाहते थे।

अधिनियम के चार प्रमुख लक्ष्य थे—कंपनी के शेष व्यापार का अंत, पूरे ब्रिटिश भारत का प्रशासनिक-विधायी केंद्रीकरण, एक समान संहिताबद्ध विधिक व्यवस्था और सेवाओं में नस्लीय भेदभाव को समाप्त करने का सैद्धांतिक आधार।

2. ‘भारत के गवर्नर-जनरल’ का सृजन

‘बंगाल के गवर्नर-जनरल’ के पदनाम को बदलकर ‘भारत का गवर्नर-जनरल’ किया गया। लॉर्ड विलियम बेंटिक इस पद पर प्रथम व्यक्ति बने। गवर्नर-जनरल को ब्रिटिश भारत के नागरिक और सैन्य प्रशासन पर सर्वोच्च केंद्रीय अधिकार दिया गया।

3. विधायी शक्तियों का पूर्ण केंद्रीकरण

  • मद्रास और बॉम्बे की विधायी शक्ति समाप्त: प्रांतीय गवर्नरों से कानून बनाने की शक्ति वापस ले ली गई।
  • केंद्रीय विधायिका: गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल को पूरे ब्रिटिश भारत के लिए कानून बनाने का अनन्य अधिकार मिला।
  • Regulations से Acts: 1833 के बाद केंद्रीय विधान को औपचारिक रूप से ‘Acts’ कहा जाने लगा।

4. विधि सदस्य और प्रथम विधि आयोग

4.1 चौथा विधि सदस्य

गवर्नर-जनरल की परिषद में कानून निर्माण के लिए एक चौथा सदस्य जोड़ा गया। लॉर्ड टी. बी. मैकाले प्रथम विधि सदस्य बने। स्रोत के अनुसार उन्हें सामान्य कार्यकारी मामलों में पूर्ण मताधिकार नहीं था; उनकी भूमिका मुख्यतः विधायी कार्य से जुड़ी थी।

4.2 प्रथम विधि आयोग, 1834

धारा 53 के आधार पर 1834 में मैकाले की अध्यक्षता में प्रथम विधि आयोग गठित किया गया। इसका उद्देश्य भारत में प्रचलित विभिन्न कानूनों को व्यवस्थित और संहिताबद्ध करना था। आगे इसी प्रक्रिया से दंड और प्रक्रिया संबंधी आधुनिक संहिताओं के निर्माण की दिशा बनी।

5. ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापार का पूर्ण अंत

1813 में बचा हुआ चाय और चीन व्यापार का एकाधिकार भी समाप्त कर दिया गया। कंपनी अब व्यापारिक संस्था नहीं रही; वह ब्रिटिश क्राउन की ओर से भारत का प्रशासन चलाने वाली राजनीतिक-प्रशासनिक ट्रस्टी के रूप में रह गई।

क्षेत्र1833 से पहले1833 के बाद
सर्वोच्च पदबंगाल का गवर्नर-जनरलभारत का गवर्नर-जनरल
प्रांतीय विधायी शक्तिमद्रास और बॉम्बे को कानून बनाने की शक्तिप्रांतीय विधायी शक्ति समाप्त; केंद्र में समेकित
कंपनी का व्यापारचाय और चीन व्यापार पर एकाधिकारव्यापारिक गतिविधियाँ पूर्णतः समाप्त
परिषदगवर्नर-जनरल + 3 सदस्यविधायी कार्य के लिए चौथा विधि सदस्य

6. अन्य महत्वपूर्ण प्रावधान

6.1 धारा 87 — गैर-भेदभाव

अधिनियम ने सिद्धांततः कहा कि भारतीय प्रजा को केवल धर्म, जन्मस्थान, वंश या रंग के आधार पर कंपनी की सेवा या पद से अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा। स्रोत इसे समान अवसर के सिद्धांत का प्रारंभिक वैधानिक बीज मानता है।

6.2 सिविल सेवाओं में खुली प्रतियोगिता का प्रयास

योग्यता-आधारित खुली प्रतियोगिता की दिशा में प्रयास किया गया, लेकिन कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के विरोध से यह व्यवस्था प्रभावी रूप से लागू नहीं हो सकी। स्रोत के अनुसार वास्तविक खुली प्रतियोगिता का निर्णायक चरण 1853 के चार्टर एक्ट में आया।

6.3 दास प्रथा समाप्त करने का निर्देश

गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल को भारत में दास प्रथा समाप्त करने के उपाय करने का निर्देश दिया गया। आगे 1843 के अधिनियम V ने दासता को गैरकानूनी घोषित किया।

7. संवैधानिक एवं प्रशासनिक महत्व

1.
अखिल भारतीय केंद्रीय शासन: पूरे ब्रिटिश भारत पर एक केंद्रीय कार्यपालिका और विधायिका की सर्वोच्चता स्थापित हुई।
2.
आधुनिक विधिक व्यवस्था: विधि आयोग और संहिताबद्ध कानूनों की दिशा ने आधुनिक औपनिवेशिक न्यायशास्त्र की नींव मजबूत की।
3.
कंपनी का रूपांतरण: व्यापारिक निगम से राजनीतिक-प्रशासनिक एजेंसी में पूर्ण परिवर्तन हुआ।
4.
समानता का वैधानिक सिद्धांत: धारा 87 ने सार्वजनिक सेवाओं में गैर-भेदभाव की महत्वपूर्ण सैद्धांतिक घोषणा की।

8. कमियाँ और सीमाएँ

  • अति-केंद्रीकरण: पूरे उपमहाद्वीप के लिए कलकत्ता से कानून बनाना स्थानीय आवश्यकताओं की उपेक्षा कर सकता था।
  • भारतीय प्रतिनिधित्व का अभाव: केंद्रीय विधायी संरचना में भारतीयों को प्रतिनिधित्व नहीं मिला।
  • धारा 87 का सीमित प्रभाव: संरक्षण-आधारित नियुक्ति व्यवस्था के कारण उच्च सेवाओं में भारतीयों का प्रवेश व्यावहारिक रूप से बहुत सीमित रहा।

9. परीक्षा अभ्यास

प्रारंभिक

कथन: (1) मद्रास और बॉम्बे की विधायी शक्ति समाप्त की गई; (2) विधि सदस्य को सामान्य कार्यकारी मामलों में पूर्ण मताधिकार मिला; (3) धारा 87 में गैर-भेदभाव का सिद्धांत था। सही: केवल 1 और 3।

मुख्य परीक्षा

प्रश्न: “1833 का चार्टर अधिनियम भारत में ब्रिटिश विधायी एवं प्रशासनिक केंद्रीकरण का चरम बिंदु था।” प्रमुख प्रावधानों और प्रभावों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए।

10. त्वरित पुनरावृत्ति

  • 1833 = Saint Helena Act
  • लॉर्ड विलियम बेंटिक = भारत के प्रथम गवर्नर-जनरल
  • मैकाले = प्रथम विधि सदस्य
  • 1834 = प्रथम विधि आयोग
  • मद्रास और बॉम्बे की विधायी शक्तियाँ समाप्त
  • कंपनी का चाय + चीन व्यापार भी समाप्त
  • धारा 87 = सेवाओं में गैर-भेदभाव का सिद्धांत
  • अगला प्रमुख चार्टर सुधार = 1853