1. प्रारंभिक जीवन और संन्यास
स्वामी सहजानंद सरस्वती का जन्म 1889 ई. में गाजीपुर जिले के देवा गाँव में हुआ। उनका मूल नाम नवरंग राय था। 1907 में उन्होंने संन्यास ग्रहण किया और स्वामी सहजानंद सरस्वती नाम धारण किया। प्रारंभिक चरण में वे सामाजिक और जाति-सुधार के कार्यों से जुड़े रहे।
उनकी राजनीतिक-सामाजिक कर्मभूमि बिहार बनी। 1928 में पटना जिले के बिहटा में स्थापित सीताराम आश्रम आगे किसान आंदोलन का वैचारिक और संगठनात्मक केंद्र बना।
2. बिहार में किसान चेतना और बिहार प्रांतीय किसान सभा
स्थायी बंदोबस्त के बाद बिहार में जमींदारी उत्पीड़न, ऊँचा लगान, बेगारी, बेदखली और अवैध उपकर किसान असंतोष के प्रमुख आधार बने।
| चरण | मुख्य तथ्य |
|---|---|
| मुंगेर किसान सभा, 1922–23 | शाह मोहम्मद जुबैर अध्यक्ष; डॉ. श्रीकृष्ण सिंह उपाध्यक्ष। |
| बिहटा, 1928 | स्वामी सहजानंद ने स्थानीय किसानों के प्रश्नों पर संगठन को पुनर्गठित किया। |
| बिहार प्रांतीय किसान सभा, 1929 | सोनपुर मेले के अवसर पर स्थापना; अध्यक्ष स्वामी सहजानंद, सचिव डॉ. श्रीकृष्ण सिंह। |
BPKS की प्रमुख मांगों में जमींदारी उत्पीड़न से सुरक्षा, लगान में कमी, सिंचाई कर और अवैध अबवाबों का विरोध तथा जोतदारों के अधिकार शामिल थे।
3. बकाश्त आंदोलन, 1937–1939
महामंदी के दौरान कृषि कीमतों में गिरावट और लगान न चुका पाने के कारण किसानों की रैयती जमीनें जमींदारों के कब्जे में चली गईं। ऐसी जमीनों को अध्ययन सामग्री में बकाश्त भूमि के रूप में समझाया गया है।
1937 में कांग्रेस सरकार बनने के बाद किसान अपेक्षाओं और वास्तविक नीतियों के बीच दूरी ने स्वामी सहजानंद और किसान सभा को अधिक प्रत्यक्ष संघर्ष की ओर धकेला।
| केंद्र | नेतृत्व/विशेषता |
|---|---|
| बड़हिया टाल | कार्यनंद शर्मा; लंबा और उग्र बकाश्त संघर्ष। |
| रेवड़ा, गया | यदुनंदन शर्मा; संगठित किसान सत्याग्रह। |
| अंबारी/छपरा | राहुल सांकृत्यायन; जमींदार लठैतों से टकराव और गिरफ्तारी। |
| मझियावां/अनवां | यमुना कार्यी और पंचानन शर्मा। |
4. अखिल भारतीय किसान सभा, 1936
11 अप्रैल 1936 को लखनऊ में अखिल भारतीय किसान सभा (AIKS) की स्थापना हुई। स्वामी सहजानंद इसके प्रथम अध्यक्ष बने और प्रो. एन. जी. रंगा प्रथम महासचिव। संगठन ने जमींदारी उन्मूलन, लगान में बड़ी कटौती, कृषक ऋण राहत और खेतिहर मजदूरों के हित जैसे प्रश्न राष्ट्रीय स्तर पर उठाए।
5. ‘हुंकार’ और प्रचार तंत्र
1940 में पटना से प्रकाशित हिंदी साप्ताहिक ‘हुंकार’ किसान आंदोलन और वामपंथी चेतना का प्रमुख मंच बना। नोट्स के अनुसार इसके संपादन/संचालन में स्वामी सहजानंद, राहुल सांकृत्यायन, यमुना कार्यी और कार्यनंद शर्मा जैसे नाम जुड़े थे। ब्रिटिश सरकार ने इसकी सामग्री पर कई बार दमनात्मक कार्रवाई की।
6. वैचारिक विकास और कांग्रेस से अलगाव
- गांधीवादी चरण: 1920 के असहयोग आंदोलन में भागीदारी और जेल-यात्रा।
- वर्ग-संघर्ष की ओर: 1930 के दशक में ट्रस्टीशिप और जमींदार-किसान “सहयोग” की धारणा से बढ़ता असंतोष।
- सुभाष बोस से संयुक्त मोर्चा: मार्च 1940, रामगढ़ में अखिल भारतीय समझौता-विरोधी सम्मेलन।
- वामपंथी निकटता: द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान किसान हितों को वर्गीय राजनीति से जोड़ने का प्रयास।
7. प्रमुख कृतियाँ
| कृति | महत्त्व |
|---|---|
| मेरा जीवन संघर्ष | आत्मकथात्मक लेखन; बिहार के किसान और सामाजिक इतिहास के अध्ययन में महत्वपूर्ण। |
| किसान कैसे लड़ते हैं? | किसान सत्याग्रह और व्यावहारिक संघर्ष की मार्गदर्शिका। |
| झारखंड के किसान | छोटानागपुर क्षेत्र के रैयत प्रश्नों पर केंद्रित। |
| गया के किसानों की करुण कहानी | जमींदारी शोषण का विवरण। |
8. ऐतिहासिक मूल्यांकन
स्वामी सहजानंद ने किसान राजनीति को स्थानीय शिकायतों से उठाकर प्रांतीय और राष्ट्रीय संगठन में बदला। 1929 की बिहार प्रांतीय किसान सभा, 1936 की AIKS और 1937–39 के बकाश्त संघर्ष के बीच एक स्पष्ट संगठनात्मक निरंतरता दिखाई देती है।
26 जून 1950 को मुजफ्फरपुर में उनका निधन हुआ। उपलब्ध नोट्स उनके दीर्घ किसान संघर्ष को स्वतंत्रता के बाद जमींदारी उन्मूलन की राजनीतिक पृष्ठभूमि से जोड़ते हैं।
9. पिछले वर्षों के प्रश्न
67वीं BPSC प्रारंभिक परीक्षा
प्रश्न: स्वामी सहजानंद सरस्वती ने किस पत्रिका का प्रकाशन किया?
उत्तर: हुंकार।
65वीं BPSC प्रारंभिक परीक्षा
प्रश्न: बिहार प्रांतीय किसान सभा का गठन किसने किया?
उत्तर: स्वामी सहजानंद सरस्वती।
64वीं BPSC प्रारंभिक परीक्षा
प्रश्न: अखिल भारतीय किसान सभा के प्रथम सत्र की अध्यक्षता किसने की?
उत्तर: स्वामी सहजानंद सरस्वती।
56वीं–59वीं BPSC
प्रश्न: बड़हिया टाल विरोध का उद्देश्य क्या था?
उत्तर: बकाश्त भूमि की वापसी की मांग।
10. मुख्य परीक्षा उत्तर-ढाँचा
- भूमिका: स्थायी बंदोबस्त, किसान शोषण और बिहटा आश्रम।
- संगठन: 1929 BPKS और ग्राम स्तर तक किसान नेटवर्क।
- राष्ट्रीय विस्तार: 1936 AIKS के प्रथम अध्यक्ष।
- प्रत्यक्ष संघर्ष: बकाश्त आंदोलन—बड़हिया, रेवड़ा, अंबारी।
- वैचारिक विकास: गांधीवादी प्रारंभ से वर्गीय किसान राजनीति और समझौता-विरोधी मोर्चे तक।
- बौद्धिक योगदान: ‘हुंकार’, आत्मकथा और किसान साहित्य।
- निष्कर्ष: बिहार के किसान प्रश्न को राष्ट्रीय राजनीतिक एजेंडा बनाने में केंद्रीय भूमिका।