UPSC भूगोल › भौतिक भूगोल › 1.2 पृथ्वी की उत्पत्ति और भूवैज्ञानिक विकास

भूवैज्ञानिक समय मापनी

पृथ्वी का इतिहास लगभग 4.54 अरब वर्ष लंबा है। इतने विशाल समय को सामान्य वर्षों में समझना कठिन है। इसलिए भूवैज्ञानिकों ने पृथ्वी के इतिहास को चट्टानों, जीवाश्मों, प्रमुख भूवैज्ञानिक घटनाओं तथा जीवन के विकास में हुए बड़े परिवर्तनों के आधार पर विभिन्न समय-खंडों में बाँटा है। इसी व्यवस्थित विभाजन को भूवैज्ञानिक समय मापनी कहा जाता है।

यह समय मापनी केवल तिथियों की सूची नहीं है। इसके माध्यम से यह समझा जाता है कि पृथ्वी की पर्पटी कब विकसित हुई, प्रारंभिक जीवन कब उत्पन्न हुआ, वायुमंडल में ऑक्सीजन कब बढ़ी, महाद्वीपों का विकास कैसे हुआ, समुद्री और स्थलीय जीवों का विस्तार कब हुआ तथा बड़ी सामूहिक विलुप्तियाँ कब हुईं।

भूवैज्ञानिक समय का सामान्य क्रम सबसे बड़े से छोटे समय-खंड की ओर इस प्रकार है—

महाकल्प → कल्प → काल → युग → आयु

अंतरराष्ट्रीय शब्दावली में इन्हें क्रमशः Eon, Era, Period, Epoch और Age कहा जाता है।

UPSC तथा BPSC के लिए प्रत्येक सूक्ष्म आयु का नाम याद करना आवश्यक नहीं है। मुख्य महाकल्प, कल्प, काल और उनसे जुड़ी प्रमुख घटनाएँ अधिक महत्वपूर्ण हैं।

पृथ्वी के प्रमुख महाकल्प

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कल्प का विस्तृत अध्ययन पढ़ें →

काल का विस्तृत अध्ययन पढ़ें →

प्रमुख भूवैज्ञानिक घटनाओं का विस्तृत अध्ययन पढ़ें →

1.2.2.5 जीवन का विकास और सामूहिक विलुप्तियाँ — विस्तृत अध्ययन पढ़ें →

पृथ्वी के पूरे इतिहास को चार बड़े महाकल्पों में समझा जा सकता है—

हैडियन

आर्कियन

प्रोटेरोजोइक

फैनेरोजोइक

इनमें पहले तीन महाकल्पों को सामूहिक रूप से प्रायः प्रीकैम्ब्रियन कहा जाता है।

ध्यान रहे कि प्रीकैम्ब्रियन कोई एक औपचारिक महाकल्प नहीं है। यह हैडियन, आर्कियन और प्रोटेरोजोइक को सम्मिलित करने वाला सुविधाजनक सामूहिक नाम है।

पृथ्वी के इतिहास का लगभग 88 प्रतिशत भाग प्रीकैम्ब्रियन में आता है। इसके बावजूद इस काल के जीवाश्म अपेक्षाकृत कम उपलब्ध हैं, क्योंकि उस समय जीवन मुख्यतः सूक्ष्म और मुलायम शरीर वाले जीवों तक सीमित था तथा अत्यंत पुरानी चट्टानों का बड़ा भाग बाद की भूवैज्ञानिक प्रक्रियाओं से परिवर्तित हो चुका है।


हैडियन महाकल्प

हैडियन पृथ्वी के इतिहास का सबसे प्रारंभिक चरण था। इसका आरंभ पृथ्वी के निर्माण के साथ लगभग 4.54 अरब वर्ष पहले हुआ और यह लगभग 4 अरब वर्ष पहले तक चला।

इस समय पृथ्वी अत्यंत गर्म और अस्थिर थी। ग्रहाणुओं तथा अन्य खगोलीय पिंडों की लगातार टक्करें हो रही थीं और पृथ्वी का आंतरिक भाग व्यापक रूप से गर्म था।

इसी प्रारंभिक समय में पृथ्वी का विभेदन हुआ। लोहा और निकेल जैसे भारी तत्व केंद्र की ओर गए और क्रोड के निर्माण का आधार बने, जबकि अपेक्षाकृत हल्के सिलिकेट पदार्थ ऊपर की ओर आए।

चंद्रमा की उत्पत्ति से संबंधित विशाल टक्कर भी पृथ्वी के इसी प्रारंभिक इतिहास से जुड़ी मानी जाती है।

हैडियन के अंतिम भाग तक पृथ्वी की बाहरी सतह ठंडी होकर प्रारंभिक पर्पटी बनाने लगी और तरल जल के अस्तित्व के लिए परिस्थितियाँ विकसित होने लगीं।

हैडियन की चट्टानें बहुत कम सुरक्षित बची हैं। हालांकि पृथ्वी पर पाए गए कुछ अत्यंत पुराने जिरकॉन खनिज लगभग 4.4 अरब वर्ष पुराने हैं और प्रारंभिक पृथ्वी के अध्ययन में महत्वपूर्ण हैं।


आर्कियन महाकल्प

आर्कियन महाकल्प लगभग 4 अरब वर्ष पहले से 2.5 अरब वर्ष पहले तक माना जाता है।

इस समय पृथ्वी की पर्पटी अधिक स्थिर होने लगी और प्राचीन महाद्वीपीय भूखंडों के प्रारंभिक भाग विकसित हुए। पृथ्वी का ताप प्रवाह आज की तुलना में अधिक था और ज्वालामुखीय तथा विवर्तनिक गतिविधियाँ तीव्र थीं।

पृथ्वी पर जीवन के सबसे पुराने व्यापक प्रमाण भी आर्कियन से जुड़े हैं।

प्रारंभिक जीवन अत्यंत सरल और एककोशिकीय था। बैक्टीरिया तथा अन्य सूक्ष्मजीव समुद्री पर्यावरण में विकसित हुए।

सायनोबैक्टीरिया विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहे क्योंकि उनमें प्रकाश संश्लेषण की क्षमता थी। इनके समुदायों द्वारा निर्मित स्तरित संरचनाएँ स्ट्रोमैटोलाइट कहलाती हैं। स्ट्रोमैटोलाइट प्रारंभिक जीवन के महत्वपूर्ण जीवाश्मीय प्रमाण हैं।

आर्कियन के दौरान मुक्त ऑक्सीजन वायुमंडल में बहुत कम थी। प्रकाश संश्लेषण से उत्पन्न अधिकांश ऑक्सीजन प्रारंभ में समुद्र में उपस्थित लोहे तथा अन्य पदार्थों के साथ प्रतिक्रिया करती रही।


प्रोटेरोजोइक महाकल्प

प्रोटेरोजोइक लगभग 2.5 अरब वर्ष पहले से 538.8 मिलियन वर्ष पहले तक फैला हुआ था।

पृथ्वी और जीवन के विकास की दृष्टि से यह अत्यंत महत्वपूर्ण समय था।

प्रोटेरोजोइक के प्रारंभिक भाग में वायुमंडल में मुक्त ऑक्सीजन की मात्रा तेजी से बढ़ने लगी। लगभग 2.4 अरब वर्ष पहले शुरू हुई इस महत्वपूर्ण परिवर्तन को सामान्यतः महान ऑक्सीकरण घटना कहा जाता है।

वायुमंडल में ऑक्सीजन बढ़ने से पृथ्वी के पर्यावरण में बड़ा परिवर्तन हुआ। आगे चलकर ऊपरी वायुमंडल में ओजोन के विकास और अधिक जटिल जीवन के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ बनीं।

इसी महाकल्प में सरल प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं के अतिरिक्त अधिक जटिल यूकैरियोटिक कोशिकाओं का विकास हुआ।

आगे चलकर बहुकोशिकीय जीवन भी विकसित हुआ।

प्रोटेरोजोइक के अंतिम भाग में लगभग 635 से 538.8 मिलियन वर्ष पहले एडियाकैरन समय आता है, जिसमें बड़े और मुलायम शरीर वाले बहुकोशिकीय जीवों के महत्वपूर्ण प्रमाण पाए जाते हैं।

प्रोटेरोजोइक में पृथ्वी कई बड़े हिमाच्छादन चरणों से भी गुजरी। कुछ अत्यधिक हिमाच्छादन घटनाओं को स्नोबॉल अर्थ अवधारणा से समझाया जाता है।


फैनेरोजोइक महाकल्प

लगभग 538.8 मिलियन वर्ष पहले फैनेरोजोइक महाकल्प का आरंभ हुआ और यह आज तक जारी है।

फैनेरोजोइक का अर्थ मोटे तौर पर दृश्य या स्पष्ट जीवन से है। इस समय से जीवाश्म अभिलेख में विविध और जटिल जीव बड़ी संख्या में मिलने लगते हैं।

फैनेरोजोइक को तीन प्रमुख कल्पों में बाँटा जाता है—

पुराजीवी कल्प

मध्यजीवी कल्प

नवजीवी कल्प

जीवन के विकास तथा सामूहिक विलुप्तियों की दृष्टि से ये तीनों कल्प अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।


पुराजीवी कल्प

पुराजीवी कल्प लगभग 538.8 से 251.9 मिलियन वर्ष पहले तक रहा।

इसका अर्थ है—प्राचीन जीवन का युग

इस कल्प में समुद्री जीवन का अत्यधिक विस्तार हुआ, मछलियों का विकास हुआ, पौधों और जीवों ने स्थल पर प्रवेश किया तथा उभयचर और सरीसृप विकसित हुए।

पुराजीवी कल्प को छह प्रमुख कालों में बाँटा जाता है—

कैंब्रियन

ऑर्डोविशियन

सिल्यूरियन

डेवोनियन

कार्बोनिफेरस

पर्मियन

कैंब्रियन काल

कैंब्रियन काल लगभग 538.8 से 485.4 मिलियन वर्ष पहले तक रहा।

इस काल की सबसे महत्वपूर्ण घटना कैंब्रियन विस्फोट थी। भूवैज्ञानिक दृष्टि से अपेक्षाकृत कम समय में समुद्री जीवों के अनेक प्रमुख समूह जीवाश्म अभिलेख में दिखाई देने लगे।

ट्राइलोबाइट इस काल के प्रसिद्ध जीवों में थे।

यह समझना आवश्यक है कि जीवन की उत्पत्ति कैंब्रियन में नहीं हुई थी। जीवन इससे अरबों वर्ष पहले मौजूद था। कैंब्रियन की विशेषता जटिल जीवों के व्यापक विविधीकरण और बेहतर जीवाश्म रिकॉर्ड से संबंधित है।

ऑर्डोविशियन काल

यह लगभग 485.4 से 443.8 मिलियन वर्ष पहले तक रहा।

समुद्री जीवन में तीव्र विविधता आई। प्रारंभिक मछलियों का विकास हुआ और स्थल पर सरल पौधों के प्रारंभिक प्रमाण दिखाई देने लगे।

इस काल के अंत में पृथ्वी की पाँच बड़ी सामूहिक विलुप्तियों में से पहली बड़ी विलुप्ति हुई।

सिल्यूरियन काल

सिल्यूरियन लगभग 443.8 से 419.2 मिलियन वर्ष पहले तक रहा।

इस समय संवहनी पौधे स्थल पर अधिक स्थापित होने लगे। जबड़े वाली मछलियों का विकास महत्वपूर्ण रहा और स्थलीय पारिस्थितिक तंत्र का विस्तार शुरू हुआ।

डेवोनियन काल

डेवोनियन लगभग 419.2 से 358.9 मिलियन वर्ष पहले तक रहा।

इसे प्रायः मछलियों का युग कहा जाता है क्योंकि इस समय मछलियों में अत्यधिक विविधता विकसित हुई।

प्रथम बड़े वन विकसित हुए तथा प्रारंभिक उभयचर जल से स्थल की ओर जीवन के संक्रमण में महत्वपूर्ण बने।

डेवोनियन के उत्तरार्ध में लंबी अवधि में कई विलुप्ति घटनाएँ हुईं, जिन्हें सामूहिक रूप से उत्तर-डेवोनियन विलुप्ति कहा जाता है।

कार्बोनिफेरस काल

कार्बोनिफेरस लगभग 358.9 से 298.9 मिलियन वर्ष पहले तक रहा।

इस समय विशाल दलदली वन व्यापक थे। विश्व के अनेक महत्वपूर्ण कोयला भंडार इसी काल के जैविक पदार्थ से जुड़े हैं; इसी कारण इसका नाम कार्बोनिफेरस पड़ा।

उभयचर व्यापक हुए तथा प्रारंभिक सरीसृपों का विकास हुआ।

वायुमंडल में ऑक्सीजन की मात्रा अधिक होने से कुछ कीट अत्यधिक बड़े आकार के भी विकसित हुए।

ध्यान रखें कि भारत के प्रमुख गोंडवाना कोयला भंडार मुख्यतः पर्मियन काल से जुड़े हैं, इसलिए विश्व के कार्बोनिफेरस कोयले और भारतीय गोंडवाना कोयले को एक ही बात नहीं मानना चाहिए।

पर्मियन काल

पर्मियन लगभग 298.9 से 251.9 मिलियन वर्ष पहले तक रहा।

इस समय पृथ्वी के अधिकांश महाद्वीपीय भूभाग एक विशाल महामहाद्वीप पैंजिया में जुड़े हुए थे।

स्थलीय सरीसृपों का विकास जारी रहा और शुष्क पर्यावरण से अनुकूलित जीवों का विस्तार हुआ।

पर्मियन के अंत में पृथ्वी के इतिहास की सबसे बड़ी ज्ञात सामूहिक विलुप्ति हुई। इसे कभी-कभी महान मृत्यु कहा जाता है।

इस घटना में समुद्री तथा स्थलीय दोनों प्रकार के जीवों की बहुत बड़ी संख्या समाप्त हो गई।

पर्मियन-अंत विलुप्ति के पीछे विशाल ज्वालामुखीय गतिविधियों, विशेषकर साइबेरियन ट्रैप, से उत्पन्न जलवायु तथा महासागरीय परिवर्तनों को प्रमुख कारणों में माना जाता है।


मध्यजीवी कल्प

मध्यजीवी कल्प लगभग 251.9 से 66 मिलियन वर्ष पहले तक रहा।

इसे सामान्यतः सरीसृपों का युग कहा जाता है क्योंकि डायनासोर सहित सरीसृपों का इस समय व्यापक प्रभुत्व था।

मध्यजीवी कल्प को तीन कालों में बाँटा जाता है—

ट्रायसिक

जुरासिक

क्रिटेशियस

इस कल्प के दौरान पैंजिया का विखंडन हुआ और वर्तमान महाद्वीपों की व्यवस्था विकसित होने लगी।

ट्रायसिक काल

ट्रायसिक लगभग 251.9 से 201.4 मिलियन वर्ष पहले तक रहा।

पर्मियन-अंत की विशाल विलुप्ति के बाद जीवन का पुनर्विकास हुआ।

प्रारंभिक डायनासोर तथा प्रथम वास्तविक स्तनधारी इसी काल में विकसित हुए।

पैंजिया अभी व्यापक रूप से जुड़ा हुआ था, लेकिन इसके विभाजन की प्रक्रियाएँ शुरू हो चुकी थीं।

ट्रायसिक के अंत में एक और बड़ी सामूहिक विलुप्ति हुई, जिसके बाद जुरासिक में डायनासोरों का प्रभुत्व और बढ़ा।

जुरासिक काल

जुरासिक लगभग 201.4 से लगभग 143 मिलियन वर्ष पहले तक माना जाता है।

इस काल में डायनासोरों का व्यापक विस्तार हुआ।

प्रथम ज्ञात पक्षी-जैसे रूप, जिनमें आर्कियोप्टेरिक्स प्रसिद्ध है, इसी काल से जुड़े हैं।

पैंजिया का विखंडन आगे बढ़ा और महाद्वीपीय भूभाग अलग होने लगे।

क्रिटेशियस काल

क्रिटेशियस लगभग 143 से 66 मिलियन वर्ष पहले तक रहा।

इस काल में पुष्पीय पौधों अर्थात आवृतबीजी पौधों का व्यापक विकास और विस्तार हुआ।

डायनासोर अभी भी प्रमुख स्थलीय जीव थे।

क्रिटेशियस के अंत में लगभग 66 मिलियन वर्ष पहले एक विशाल सामूहिक विलुप्ति हुई। इससे गैर-पक्षी डायनासोर सहित अनेक जीव समूह समाप्त हो गए।

मेक्सिको के युकातान क्षेत्र में विशाल क्षुद्रग्रह प्रभाव से निर्मित चिक्सुलूब क्रेटर इस विलुप्ति से निकटता से जुड़ा है।

इसी समय के आसपास भारत में विशाल दक्कन ट्रैप ज्वालामुखीय गतिविधि भी हुई। इसलिए क्रिटेशियस-अंत की घटना को समझते समय क्षुद्रग्रह प्रभाव के साथ बड़े ज्वालामुखीय और जलवायु परिवर्तनों का अध्ययन भी महत्वपूर्ण है।


नवजीवी कल्प

नवजीवी कल्प 66 मिलियन वर्ष पहले से वर्तमान तक फैला है।

इसे सामान्यतः स्तनधारियों का युग कहा जाता है, क्योंकि डायनासोरों की समाप्ति के बाद स्तनधारियों का तेजी से विविधीकरण हुआ।

नवजीवी कल्प में वर्तमान महाद्वीप, पर्वत प्रणालियाँ, जलवायु व्यवस्था तथा आधुनिक वनस्पति और जीव-जगत का स्वरूप विकसित हुआ।

इसे तीन प्रमुख कालों में बाँटा जाता है—

पैलियोजीन

नियोजीन

चतुर्थक

पैलियोजीन काल

पैलियोजीन लगभग 66 से 23 मिलियन वर्ष पहले तक रहा।

इसमें पैलियोसीन, इओसीन और ओलिगोसीन युग शामिल हैं।

क्रिटेशियस-अंत विलुप्ति के बाद स्तनधारियों और पक्षियों में तेजी से विविधीकरण हुआ।

प्रारंभिक आधुनिक स्तनधारी समूहों का विकास हुआ।

भारत की प्लेट का यूरेशियन प्लेट से टकराव नवजीवी के प्रारंभिक भाग में हिमालय के निर्माण की प्रमुख प्रक्रिया से जुड़ा है। हिमालय का उत्थान आगे भी जारी रहा और आज भी भारतीय प्लेट की उत्तर दिशा में गति जारी है।

नियोजीन काल

नियोजीन लगभग 23 से 2.58 मिलियन वर्ष पहले तक रहा।

इसके दो प्रमुख युग हैं—

मायोसीन

और

प्लायोसीन।

इस समय आधुनिक स्तनधारी समूहों और घास के मैदानों का व्यापक विस्तार हुआ।

प्रारंभिक होमिनिन अर्थात मानव वंश से संबंधित जीवों का विकास भी नवजीवी के इसी व्यापक चरण में हुआ।

विश्व की वर्तमान पर्वत प्रणालियों तथा महासागरीय परिसंचरण के विकास में भी इस समय महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए।

चतुर्थक काल

चतुर्थक काल लगभग 2.58 मिलियन वर्ष पहले से वर्तमान तक फैला है।

इसके दो औपचारिक प्रमुख युग हैं—

प्लीस्टोसीन

और

होलोसीन।

प्लीस्टोसीन

प्लीस्टोसीन लगभग 2.58 मिलियन वर्ष पहले से लगभग 11,700 वर्ष पहले तक रहा।

इस समय पृथ्वी बार-बार हिमयुग और अंतर-हिमयुग स्थितियों से गुजरी।

उत्तरी अमेरिका और यूरेशिया के बड़े भागों पर विशाल हिमचादरें विकसित हुईं।

मानव विकास की अनेक महत्वपूर्ण अवस्थाएँ इसी युग से जुड़ी हैं।

आधुनिक मानव होमो सेपियन्स का उद्भव लगभग 3 लाख वर्ष पहले अफ्रीका में हुआ माना जाता है।

होलोसीन

लगभग 11,700 वर्ष पहले अंतिम प्रमुख हिमयुग के बाद वर्तमान गर्म अंतर-हिमयुग चरण शुरू हुआ, जिसे होलोसीन कहा जाता है।

कृषि, स्थायी बस्तियाँ, नगर, सभ्यताएँ और आधुनिक मानव समाज का अधिकांश विकास इसी युग में हुआ।

हम वर्तमान औपचारिक भूवैज्ञानिक समय मापनी में फैनेरोजोइक महाकल्प → नवजीवी कल्प → चतुर्थक काल → होलोसीन युग में रहते हैं।

होलोसीन का वर्तमान औपचारिक आयु-खंड मेघालयन है।

एंथ्रोपोसीन की स्थिति

मानव गतिविधियों द्वारा पृथ्वी की जलवायु, जैव विविधता, अवसादन, कार्बन चक्र तथा अन्य प्राकृतिक प्रणालियों में बड़े परिवर्तन के कारण एंथ्रोपोसीन शब्द का व्यापक उपयोग किया जाता है।

लेकिन परीक्षा में एक महत्वपूर्ण अंतर याद रखना चाहिए—

एंथ्रोपोसीन वर्तमान में औपचारिक भूवैज्ञानिक युग नहीं है।

अंतरराष्ट्रीय भूवैज्ञानिक व्यवस्था में इसे अलग औपचारिक युग बनाने का प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया गया है।

इसलिए वर्तमान औपचारिक युग अभी भी होलोसीन है।


जीवन के विकास का प्रमुख क्रम

पृथ्वी के इतिहास में जीवन का विकास बहुत लंबे समय में हुआ। परीक्षा के लिए इसका सामान्य क्रम महत्वपूर्ण है—

प्रारंभिक एककोशिकीय जीवन

प्रकाश संश्लेषी सूक्ष्मजीव

वायुमंडलीय ऑक्सीजन में वृद्धि

यूकैरियोटिक कोशिकाएँ

बहुकोशिकीय जीव

कैंब्रियन में जटिल समुद्री जीवों का व्यापक विविधीकरण

मछलियाँ

स्थलीय पौधे

उभयचर

सरीसृप

डायनासोर और प्रारंभिक स्तनधारी

पक्षी

पुष्पीय पौधे

स्तनधारियों का व्यापक विस्तार

प्राइमेट और होमिनिन

होमो सेपियन्स

यह क्रम प्रत्येक जीव की पहली सटीक तिथि याद करने से अधिक महत्वपूर्ण है।


पाँच प्रमुख सामूहिक विलुप्तियाँ

पृथ्वी के फैनेरोजोइक इतिहास में पाँच बड़ी सामूहिक विलुप्तियों को विशेष रूप से पहचाना जाता है।

ऑर्डोविशियन-अंत विलुप्ति

लगभग 444 मिलियन वर्ष पहले हुई।

समुद्री जीव विशेष रूप से प्रभावित हुए। तीव्र जलवायु परिवर्तन और हिमाच्छादन से इसे जोड़ा जाता है।

उत्तर-डेवोनियन विलुप्ति

लगभग 372 से 359 मिलियन वर्ष पहले कई चरणों में हुई।

समुद्री पारिस्थितिक तंत्र अत्यधिक प्रभावित हुए।

पर्मियन-अंत विलुप्ति

लगभग 252 मिलियन वर्ष पहले हुई।

यह पृथ्वी के इतिहास की सबसे बड़ी ज्ञात सामूहिक विलुप्ति थी।

विशाल साइबेरियन ट्रैप ज्वालामुखीय गतिविधि, तीव्र वैश्विक तापवृद्धि, महासागरीय ऑक्सीजन की कमी और महासागर अम्लीकरण जैसी प्रक्रियाएँ इससे जुड़ी मानी जाती हैं।

ट्रायसिक-अंत विलुप्ति

लगभग 201 मिलियन वर्ष पहले हुई।

इस विलुप्ति के बाद डायनासोरों को स्थलीय पारिस्थितिक तंत्र में अधिक व्यापक प्रभुत्व स्थापित करने का अवसर मिला।

क्रिटेशियस-अंत विलुप्ति

लगभग 66 मिलियन वर्ष पहले हुई।

इसमें गैर-पक्षी डायनासोर सहित अनेक जीव समूह समाप्त हुए।

चिक्सुलूब क्षुद्रग्रह प्रभाव इसका प्रमुख कारण माना जाता है। लगभग इसी समय दक्कन ट्रैप ज्वालामुखीय गतिविधि भी चल रही थी।


भारत से संबंधित महत्वपूर्ण भूवैज्ञानिक संबंध

भूवैज्ञानिक समय मापनी को भारत के भूगोल से जोड़ना परीक्षा के लिए विशेष रूप से उपयोगी है।

भारत की अत्यंत प्राचीन आर्कियन चट्टानें प्रायद्वीपीय भारत के भूवैज्ञानिक आधार का महत्वपूर्ण भाग हैं।

भारत के प्रमुख गोंडवाना कोयला भंडार मुख्यतः पुराजीवी कल्प के उत्तरार्ध, विशेषकर पर्मियन समय से जुड़े हैं।

गोंडवाना भूभाग का विखंडन मध्यजीवी कल्प में आगे बढ़ा और भारतीय प्लेट अलग होकर उत्तर दिशा में बढ़ी।

भारत में विशाल दक्कन ट्रैप ज्वालामुखीय गतिविधि लगभग 66 मिलियन वर्ष पहले क्रिटेशियस के अंतिम भाग से जुड़ी है।

भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट की टक्कर नवजीवी कल्प में हिमालय और तिब्बती क्षेत्र के उत्थान की प्रमुख प्रक्रिया बनी।

हिमालय भूवैज्ञानिक दृष्टि से अपेक्षाकृत युवा वलित पर्वत हैं और उनका उत्थान आज भी जारी है।


भूवैज्ञानिक समय मापनी का संक्षिप्त सार

प्रमुख समय-खंडलगभग अवधिप्रमुख विशेषता
हैडियन4.54–4.0 अरब वर्ष पूर्वपृथ्वी निर्माण, विभेदन, प्रारंभिक पर्पटी
आर्कियन4.0–2.5 अरब वर्ष पूर्वप्रारंभिक स्थिर पर्पटी, प्रारंभिक जीवन
प्रोटेरोजोइक2.5 अरब–538.8 मिलियन वर्ष पूर्वऑक्सीजन वृद्धि, यूकैरियोट, बहुकोशिकीय जीवन
पुराजीवी538.8–251.9 मिलियन वर्ष पूर्वसमुद्री विविधीकरण, मछली, पौधे, उभयचर, सरीसृप
मध्यजीवी251.9–66 मिलियन वर्ष पूर्वडायनासोर, पैंजिया विखंडन, पक्षी और पुष्पीय पौधे
नवजीवी66 मिलियन वर्ष पूर्व–वर्तमानस्तनधारियों का विस्तार, हिमालय, मानव विकास

परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य

प्रीकैम्ब्रियन कोई अकेला औपचारिक महाकल्प नहीं है; इसमें हैडियन, आर्कियन और प्रोटेरोजोइक सम्मिलित किए जाते हैं।

पृथ्वी के इतिहास का अधिकांश भाग प्रीकैम्ब्रियन में आता है।

प्रारंभिक जीवन के महत्वपूर्ण प्रमाण आर्कियन से जुड़े हैं।

सायनोबैक्टीरिया और स्ट्रोमैटोलाइट प्रारंभिक जीवन तथा प्रकाश संश्लेषण के अध्ययन में महत्वपूर्ण हैं।

वायुमंडल में ऑक्सीजन की बड़ी वृद्धि प्रोटेरोजोइक में हुई।

फैनेरोजोइक लगभग 538.8 मिलियन वर्ष पहले शुरू हुआ।

कैंब्रियन विस्फोट का अर्थ जीवन की पहली उत्पत्ति नहीं बल्कि जटिल जीवों का तेज विविधीकरण है।

डेवोनियन को सामान्यतः मछलियों का युग कहा जाता है।

कार्बोनिफेरस विश्व के विशाल कोयला वनों के लिए प्रसिद्ध है।

भारत के मुख्य गोंडवाना कोयले को केवल कार्बोनिफेरस से नहीं जोड़ना चाहिए; वे मुख्यतः पर्मियन क्रम से संबंधित हैं।

पर्मियन के अंत में पृथ्वी की सबसे बड़ी ज्ञात सामूहिक विलुप्ति हुई।

मध्यजीवी को सामान्यतः सरीसृपों का युग कहा जाता है।

डायनासोरों का विकास मध्यजीवी में हुआ।

प्रथम स्तनधारी ट्रायसिक काल में विकसित हुए।

पक्षियों के प्रारंभिक रूप जुरासिक से जुड़े हैं।

आवृतबीजी पौधों का बड़ा विस्तार क्रिटेशियस में हुआ।

गैर-पक्षी डायनासोर लगभग 66 मिलियन वर्ष पहले समाप्त हुए।

नवजीवी को सामान्यतः स्तनधारियों का युग कहा जाता है।

चतुर्थक काल में प्लीस्टोसीन और होलोसीन युग आते हैं।

प्लीस्टोसीन बार-बार हुए हिमयुगों के लिए महत्वपूर्ण है।

वर्तमान औपचारिक भूवैज्ञानिक युग होलोसीन है।

एंथ्रोपोसीन को अभी औपचारिक भूवैज्ञानिक युग का दर्जा प्राप्त नहीं है।

निष्कर्ष

भूवैज्ञानिक समय मापनी पृथ्वी के लगभग 4.54 अरब वर्ष लंबे इतिहास को समझने की आधारभूत व्यवस्था है। प्रारंभिक हैडियन पृथ्वी से लेकर आर्कियन के सरल जीवन, प्रोटेरोजोइक के ऑक्सीकरण, पुराजीवी में समुद्र से स्थल की ओर जीवन के विस्तार, मध्यजीवी में सरीसृपों के प्रभुत्व तथा नवजीवी में स्तनधारियों और मानव के विकास तक पृथ्वी लगातार परिवर्तित होती रही है। सामूहिक विलुप्तियों ने कई बार जीवन की दिशा बदली, जबकि प्लेट विवर्तनिकी, ज्वालामुखिता और जलवायु परिवर्तन ने पृथ्वी के भौतिक स्वरूप को निरंतर पुनर्गठित किया। इसी समय-क्रम को समझना आगे चट्टानों, जीवाश्मों, महाद्वीपीय विकास, हिमालय निर्माण और पृथ्वी के वर्तमान भूगोल को समझने की आधारशिला है।