काल

भूवैज्ञानिक समय मापनी में काल वह समय इकाई है जो कल्प से छोटी और युग से बड़ी होती है। पृथ्वी के इतिहास में प्रत्येक काल को चट्टानों, जीवाश्मों, जलवायु, महाद्वीपीय परिवर्तन और जीवन के विकास में हुए महत्वपूर्ण बदलावों के आधार पर पहचाना जाता है।

भूवैज्ञानिक समय का क्रम इस प्रकार है—

महाकल्प → कल्प → काल → युग → आयु

UPSC और BPSC की दृष्टि से मुख्य रूप से फैनेरोजोइक महाकल्प के काल सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि पृथ्वी पर जटिल जीवन का अधिकांश विकास, बड़ी सामूहिक विलुप्तियाँ, पैंजिया का निर्माण और विखंडन, डायनासोरों का विकास और विनाश, हिमालय का निर्माण तथा मानव-विकास इन्हीं से जुड़ा है।

फैनेरोजोइक के तीन कल्पों में कुल प्रमुख काल इस प्रकार आते हैं—

पुराजीवी कल्प — कैंब्रियन, ऑर्डोविशियन, सिल्यूरियन, डेवोनियन, कार्बोनिफेरस और पर्मियन।

मध्यजीवी कल्प — ट्रायसिक, जुरासिक और क्रिटेशियस।

नवजीवी कल्प — पैलियोजीन, नियोजीन और चतुर्थक।

इनसे पहले प्रोटेरोजोइक में भी औपचारिक काल मिलते हैं, जिनमें विशेष रूप से क्रायोजेनियन और एडियाकैरन परीक्षा की दृष्टि से उपयोगी हैं।


प्रोटेरोजोइक के महत्वपूर्ण काल

प्रोटेरोजोइक पृथ्वी के इतिहास का वह लंबा चरण था जिसमें वातावरण में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ी, जटिल कोशिकाएँ विकसित हुईं और अंततः बहुकोशिकीय जीवन सामने आया।

इसके सभी कालों के नाम प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण नहीं हैं। दो काल विशेष रूप से याद रखने योग्य हैं।

क्रायोजेनियन काल

क्रायोजेनियन लगभग 720 से 635 मिलियन वर्ष पूर्व तक रहा।

यह पृथ्वी के इतिहास में अत्यंत व्यापक हिमाच्छादन के लिए जाना जाता है। इसी समय से स्नोबॉल अर्थ की अवधारणा जुड़ी हुई है।

इस अवधारणा के अनुसार पृथ्वी के बड़े भाग, संभवतः निम्न अक्षांशों तक, लंबे समय के लिए बर्फ से ढक गए थे।

यह पूर्ण रूप से सामान्य आधुनिक हिमयुग जैसा नहीं था, बल्कि पृथ्वी के जलवायु इतिहास की अत्यंत चरम अवस्था थी।

एडियाकैरन काल

एडियाकैरन लगभग 635 से 538.8 मिलियन वर्ष पूर्व तक रहा।

इस समय बड़े और अपेक्षाकृत जटिल बहुकोशिकीय जीवों के महत्वपूर्ण प्रमाण मिलते हैं। इन्हें सामूहिक रूप से एडियाकैरन जीव-जगत कहा जाता है।

इनमें से अनेक जीव वर्तमान जीव-समूहों से बहुत अलग थे।

एडियाकैरन के बाद कैंब्रियन काल शुरू हुआ, जिसमें जटिल जीव-जगत का बहुत तेज विविधीकरण दिखाई देता है।


कैंब्रियन काल

कैंब्रियन लगभग 538.8 से 485.4 मिलियन वर्ष पूर्व तक रहा।

इस काल की सबसे प्रसिद्ध घटना कैंब्रियन विस्फोट है।

भूवैज्ञानिक दृष्टि से अपेक्षाकृत कम समय में अनेक जटिल समुद्री जीव-समूह जीवाश्म अभिलेख में स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे।

इस समय समुद्री अकशेरुकी जीवों की अत्यधिक विविधता विकसित हुई। ट्राइलोबाइट कैंब्रियन के प्रसिद्ध जीवों में से थे।

कैंब्रियन विस्फोट को जीवन की उत्पत्ति नहीं समझना चाहिए। जीवन पृथ्वी पर इससे अरबों वर्ष पहले मौजूद था। कैंब्रियन की विशेषता जटिल जीवों का तेजी से विविधीकरण है।

प्रीलिम्स में यह अंतर महत्वपूर्ण हो सकता है—

जीवन की उत्पत्ति ≠ कैंब्रियन विस्फोट


ऑर्डोविशियन काल

ऑर्डोविशियन लगभग 485.4 से 443.8 मिलियन वर्ष पूर्व तक रहा।

इस समय समुद्री जीवन में अत्यधिक विविधता आई। समुद्री अकशेरुकी जीवों के साथ प्रारंभिक मछलियों का विकास महत्वपूर्ण रहा।

स्थल पर सरल वनस्पतियों के प्रारंभिक प्रमाण भी इस व्यापक समय से जुड़े हैं।

ऑर्डोविशियन के अंत में पृथ्वी की पाँच प्रमुख सामूहिक विलुप्तियों में से एक हुई।

इस विलुप्ति को बड़े हिमाच्छादन, समुद्र स्तर में गिरावट और तीव्र जलवायु परिवर्तन से जोड़ा जाता है।

समुद्री जीव विशेष रूप से प्रभावित हुए।


सिल्यूरियन काल

सिल्यूरियन लगभग 443.8 से 419.2 मिलियन वर्ष पूर्व तक रहा।

ऑर्डोविशियन-अंत की विलुप्ति के बाद जीवन फिर विविध हुआ।

इस काल में जबड़े वाली मछलियों का विकास और विस्तार हुआ।

स्थल पर संवहनी पौधे अधिक व्यवस्थित रूप से विकसित होने लगे। इसका अर्थ था कि पौधे अब जल और पोषक तत्वों को अपने भीतर अधिक प्रभावी ढंग से स्थानांतरित कर सकते थे।

स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र के विकास की दिशा में सिल्यूरियन एक महत्वपूर्ण चरण था।


डेवोनियन काल

डेवोनियन लगभग 419.2 से 358.9 मिलियन वर्ष पूर्व तक रहा।

इसे सामान्यतः मछलियों का युग कहा जाता है।

इस काल में मछलियों की अनेक नई जातियाँ और समूह विकसित हुए।

स्थल पर बड़े पौधों और प्रारंभिक वनों का विकास हुआ।

कशेरुकी जीवों ने जल से स्थल की ओर अधिक महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया और प्रारंभिक चार-पाद वाले जीव विकसित हुए, जिनसे आगे उभयचरों का विकास हुआ।

डेवोनियन के उत्तरार्ध में कई चरणों में बड़ी विलुप्ति घटनाएँ हुईं। इन्हें सामान्यतः उत्तर-डेवोनियन सामूहिक विलुप्ति कहा जाता है।


कार्बोनिफेरस काल

कार्बोनिफेरस लगभग 358.9 से 298.9 मिलियन वर्ष पूर्व तक रहा।

इस समय विशेष रूप से विषुवतीय क्षेत्रों में विशाल दलदली वन विकसित हुए।

इन वनों में बड़ी मात्रा में जैविक पदार्थ जमा हुआ, जिससे विश्व के अनेक महत्वपूर्ण कोयला भंडार विकसित हुए। इसी कारण इसका नाम कार्बोनिफेरस पड़ा।

इस समय उभयचर बहुत व्यापक थे और प्रथम वास्तविक सरीसृपों का विकास हुआ।

वायुमंडल में ऑक्सीजन की मात्रा आज से अधिक होने के कारण कुछ कीट बहुत बड़े आकार तक विकसित हुए।

भारत के संदर्भ में महत्वपूर्ण सावधानी

विश्व के कार्बोनिफेरस काल को कोयले से जोड़ना सही है, लेकिन भारत के प्रमुख गोंडवाना कोयला भंडार मुख्यतः पर्मियन काल, विशेषकर गोंडवाना अवसादों से संबंधित हैं।

इसलिए—

विश्व के प्रमुख प्राचीन कोयला वन → कार्बोनिफेरस

लेकिन

भारत का प्रमुख गोंडवाना कोयला → मुख्यतः पर्मियन

याद रखना चाहिए।


पर्मियन काल

पर्मियन लगभग 298.9 से 251.9 मिलियन वर्ष पूर्व तक रहा।

यह पुराजीवी कल्प का अंतिम काल था।

इस समय पृथ्वी के अधिकांश महाद्वीप एक विशाल महामहाद्वीप पैंजिया के रूप में एकत्रित थे। पैंजिया के चारों ओर विशाल महासागर पैंथालासा था।

महामहाद्वीप के आंतरिक भाग समुद्र से दूर होने के कारण कई क्षेत्रों में शुष्क तथा महाद्वीपीय जलवायु विकसित हुई।

सरीसृपों तथा स्तनधारी-जैसे सरीसृपों का विकास हुआ।

भारत की दृष्टि से पर्मियन अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि भारतीय प्रायद्वीप के अनेक गोंडवाना कोयला निक्षेप इसी समय से जुड़े हैं।

पर्मियन के अंत में लगभग 252 मिलियन वर्ष पूर्व पृथ्वी के इतिहास की सबसे बड़ी ज्ञात सामूहिक विलुप्ति हुई।

इसे पर्मियन-अंत सामूहिक विलुप्ति अथवा कभी-कभी महान मृत्यु कहा जाता है।

समुद्री जीव-जगत का बहुत बड़ा भाग और स्थलीय जीवों की अनेक वंशावलियाँ समाप्त हो गईं।

साइबेरिया में हुई विशाल साइबेरियन ट्रैप ज्वालामुखीय गतिविधि को इस घटना का प्रमुख कारण माना जाता है। इससे अत्यधिक ग्रीनहाउस गैसें निकलीं, वैश्विक तापमान बढ़ा, महासागरों में ऑक्सीजन की कमी हुई और समुद्री रसायन में बड़े परिवर्तन आए।

पर्मियन-अंत विलुप्ति के साथ पुराजीवी कल्प समाप्त हुआ।


ट्रायसिक काल

ट्रायसिक लगभग 251.9 से 201.4 मिलियन वर्ष पूर्व तक रहा।

यह मध्यजीवी कल्प का पहला काल था।

पर्मियन की विशाल विलुप्ति के बाद पृथ्वी के पारिस्थितिक तंत्रों का पुनर्गठन हुआ।

प्रारंभिक डायनासोर इसी काल में विकसित हुए।

प्रथम वास्तविक स्तनधारी भी ट्रायसिक से जुड़े हैं।

इस समय पैंजिया अभी एक विशाल महामहाद्वीप के रूप में मौजूद था, लेकिन इसके टूटने की प्रक्रिया शुरू होने लगी थी।

ट्रायसिक के अंत में एक बड़ी सामूहिक विलुप्ति हुई। इसके बाद जुरासिक में डायनासोरों को अनेक पारिस्थितिक स्थानों पर प्रभुत्व स्थापित करने का अवसर मिला।


जुरासिक काल

जुरासिक लगभग 201.4 से लगभग 143 मिलियन वर्ष पूर्व तक रहा।

इस काल में डायनासोरों का व्यापक विस्तार हुआ और अनेक विशाल प्रजातियाँ विकसित हुईं।

पैंजिया तेजी से टूटने लगा। उत्तरी और दक्षिणी बड़े भूखंड धीरे-धीरे अलग हुए और नए महासागरीय क्षेत्र विकसित होने लगे।

प्रारंभिक पक्षियों के विकास की दृष्टि से जुरासिक महत्वपूर्ण है।

आर्कियोप्टेरिक्स जुरासिक का प्रसिद्ध जीव है, जिसमें सरीसृप और पक्षी दोनों से संबंधित विशेषताएँ पाई जाती थीं।

स्तनधारी भी मौजूद थे, लेकिन वे सामान्यतः आकार में छोटे थे।


क्रिटेशियस काल

क्रिटेशियस लगभग 143 से 66 मिलियन वर्ष पूर्व तक रहा।

यह मध्यजीवी का अंतिम और लंबा काल था।

डायनासोरों का प्रभुत्व जारी रहा, लेकिन इस काल की सबसे महत्वपूर्ण वनस्पति घटना आवृतबीजी अर्थात पुष्पीय पौधों का तीव्र विकास और विस्तार थी।

इससे स्थलीय पारिस्थितिक तंत्रों में बड़ा परिवर्तन हुआ और कीटों तथा पुष्पीय पौधों के बीच सह-विकास बढ़ा।

इस समय पैंजिया का विखंडन काफी आगे बढ़ चुका था और महाद्वीप वर्तमान स्थिति की ओर बढ़ रहे थे।

भारत और क्रिटेशियस

भारत इस समय गोंडवाना से अलग हो चुका था और एक स्वतंत्र प्लेट के रूप में उत्तर की ओर बढ़ रहा था।

क्रिटेशियस के अंतिम भाग में लगभग 66 मिलियन वर्ष पूर्व भारत के पश्चिम-मध्य क्षेत्र में अत्यंत विशाल बेसाल्टिक ज्वालामुखीय उद्गार हुए।

इनसे दक्कन ट्रैप का निर्माण हुआ।

दक्कन ट्रैप आज विशेष रूप से महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात तथा आसपास के क्षेत्रों की भूवैज्ञानिक संरचना में दिखाई देता है।

इसी ज्वालामुखीय पदार्थ के अपक्षय से आगे चलकर भारत की प्रसिद्ध काली मिट्टी के विकास के लिए मूल शैलों का आधार मिला।

क्रिटेशियस-अंत सामूहिक विलुप्ति

लगभग 66 मिलियन वर्ष पूर्व पृथ्वी पर एक और बड़ी सामूहिक विलुप्ति हुई।

मेक्सिको के युकातान प्रायद्वीप के निकट विशाल क्षुद्रग्रह के प्रभाव से चिक्सुलूब क्रेटर बना।

इस प्रभाव से वायुमंडल में बड़ी मात्रा में धूल और अन्य पदार्थ पहुँचे, जिससे वैश्विक जलवायु में अत्यंत तीव्र परिवर्तन हुए।

इस विलुप्ति में गैर-पक्षी डायनासोर समाप्त हो गए।

दक्कन ट्रैप की विशाल ज्वालामुखीय गतिविधि भी उसी व्यापक समय में हो रही थी और पृथ्वी की जलवायु पर दबाव डाल रही थी।

क्रिटेशियस-अंत विलुप्ति के साथ मध्यजीवी कल्प समाप्त हुआ और नवजीवी प्रारंभ हुआ।


पैलियोजीन काल

पैलियोजीन लगभग 66 से 23 मिलियन वर्ष पूर्व तक रहा।

गैर-पक्षी डायनासोरों की समाप्ति के बाद स्तनधारियों और पक्षियों को अनेक खाली पारिस्थितिक स्थान मिले। इससे उनका तेजी से विविधीकरण हुआ।

आधुनिक स्तनधारियों के अनेक प्रमुख समूह विकसित हुए।

पैलियोजीन को आगे पैलियोसीन, इओसीन और ओलिगोसीन युगों में बाँटा जाता है।

भारत और पैलियोजीन

यह भारत के भूगोल की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण समय है।

भारतीय प्लेट गोंडवाना से अलग होने के बाद तेज गति से उत्तर की ओर बढ़ी और अंततः यूरेशियन प्लेट से टकराई।

इस महाद्वीपीय टक्कर से टैथिस सागर के अवसाद मुड़कर ऊपर उठे और हिमालय निर्माण की प्रक्रिया प्रारंभ हुई।

यह एक बार में हुई घटना नहीं थी। हिमालय का उत्थान विभिन्न चरणों में हुआ और आज भी भारतीय प्लेट उत्तर की ओर बढ़ रही है।

हिमालय का निर्माण केवल पर्वत निर्माण की घटना नहीं था। इसने—

एशिया की जलवायु,

भारतीय मानसून,

नदी प्रणालियों,

अपरदन और अवसादन

पर गहरा प्रभाव डाला।


नियोजीन काल

नियोजीन लगभग 23 से 2.58 मिलियन वर्ष पूर्व तक रहा।

इसके प्रमुख युग मायोसीन और प्लायोसीन हैं।

इस समय घास के मैदानों का बड़े पैमाने पर विस्तार हुआ।

आधुनिक स्तनधारियों के अनेक समूह विकसित और विस्तारित हुए।

अफ्रीका में मानव वंश से जुड़े प्रारंभिक होमिनिन विकसित हुए।

हिमालय तथा तिब्बती पठार का उत्थान जारी रहा, जिससे एशियाई वायुमंडलीय परिसंचरण और मानसूनी व्यवस्था पर प्रभाव पड़ा।

वर्तमान महाद्वीपीय और महासागरीय विन्यास आधुनिक स्थिति के काफी निकट पहुँच चुका था।


चतुर्थक काल

चतुर्थक लगभग 2.58 मिलियन वर्ष पूर्व से वर्तमान तक फैला है।

यह पृथ्वी के सबसे नवीन भूवैज्ञानिक इतिहास का प्रतिनिधित्व करता है।

इसके दो प्रमुख औपचारिक युग हैं—

प्लीस्टोसीन

और

होलोसीन।

प्लीस्टोसीन

प्लीस्टोसीन में पृथ्वी बार-बार हिमनद और अंतर-हिमनद अवस्थाओं से गुजरी।

उत्तरी अमेरिका और यूरेशिया के विशाल भागों पर हिमचादरें विकसित हुईं।

हिमनदों में जल के संग्रह के कारण समुद्र तल कम हुआ और हिमनद पिघलने पर फिर बढ़ा।

मानव विकास का बड़ा भाग इसी युग से जुड़ा है।

आधुनिक मानव होमो सेपियन्स लगभग 3 लाख वर्ष पूर्व अफ्रीका में विकसित हुआ माना जाता है।

होलोसीन

लगभग 11,700 वर्ष पहले वर्तमान गर्म अंतर-हिमनद अवस्था प्रारंभ हुई, जिसे होलोसीन कहते हैं।

मानव कृषि, स्थायी बस्तियों, नगरों और सभ्यताओं का व्यापक विकास इसी समय हुआ।

वर्तमान औपचारिक भूवैज्ञानिक समय में हम अभी भी होलोसीन में रहते हैं।


कालों को जीवन-विकास से जोड़कर याद रखें

कैंब्रियन — जटिल समुद्री जीवन का तीव्र विविधीकरण

ऑर्डोविशियन — समुद्री विविधता, प्रारंभिक मछलियाँ

सिल्यूरियन — स्थल पौधों का विस्तार

डेवोनियन — मछलियों का युग

कार्बोनिफेरस — विशाल कोयला वन

पर्मियन — पैंजिया और सबसे बड़ी सामूहिक विलुप्ति

ट्रायसिक — प्रारंभिक डायनासोर और प्रथम स्तनधारी

जुरासिक — डायनासोरों का प्रभुत्व और प्रारंभिक पक्षी

क्रिटेशियस — पुष्पीय पौधों का विस्तार, दक्कन ट्रैप, डायनासोरों का अंत

पैलियोजीन — स्तनधारियों का विस्तार और भारत-यूरेशिया टक्कर

नियोजीन — घास के मैदान, आधुनिक स्तनधारी और प्रारंभिक होमिनिन

चतुर्थक — हिमयुग और मानव विकास


भारत के लिए विशेष कालक्रम

भारत के भूगोल में कालों को इस क्रम से जोड़कर याद रखना उपयोगी है—

पर्मियन

→ गोंडवाना कोयला

मध्यजीवी

→ गोंडवाना का विखंडन

क्रिटेशियस अंत

→ दक्कन ट्रैप

पैलियोजीन

→ भारतीय और यूरेशियन प्लेट की टक्कर, हिमालय निर्माण की शुरुआत

नियोजीन

→ हिमालय और तिब्बत का आगे उत्थान, मानसून के विकास पर प्रभाव

चतुर्थक

→ हिमयुग, आधुनिक नदी और जलोढ़ प्रक्रियाएँ, मानव विकास

यह भारत के भौतिक भूगोल में बार-बार उपयोग होने वाला क्रम है।


पाँच बड़ी सामूहिक विलुप्तियाँ और संबंधित काल

पृथ्वी के इतिहास की पाँच प्रमुख सामूहिक विलुप्तियाँ भी कालों के साथ जोड़कर याद करनी चाहिए—

ऑर्डोविशियन-अंत

उत्तर-डेवोनियन

पर्मियन-अंत

ट्रायसिक-अंत

क्रिटेशियस-अंत

इनमें—

पर्मियन-अंत → सबसे बड़ी ज्ञात सामूहिक विलुप्ति

और

क्रिटेशियस-अंत → गैर-पक्षी डायनासोरों का अंत

सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं।


परीक्षा के लिए आवश्यक तथ्य

कैंब्रियन विस्फोट जीवन की उत्पत्ति नहीं था।

ट्राइलोबाइट कैंब्रियन के प्रसिद्ध जीव हैं।

डेवोनियन को मछलियों का युग कहा जाता है।

कार्बोनिफेरस को विशाल कोयला वनों से जोड़ा जाता है।

भारत का प्रमुख गोंडवाना कोयला मुख्यतः पर्मियन से संबंधित है।

पैंजिया पर्मियन में व्यापक रूप से एकीकृत महामहाद्वीप था।

पर्मियन के अंत में सबसे बड़ी ज्ञात सामूहिक विलुप्ति हुई।

ट्रायसिक में प्रारंभिक डायनासोर और प्रथम वास्तविक स्तनधारी विकसित हुए।

जुरासिक में डायनासोरों का व्यापक प्रभुत्व रहा।

आर्कियोप्टेरिक्स जुरासिक से संबंधित है।

क्रिटेशियस में पुष्पीय पौधों का महत्वपूर्ण विस्तार हुआ।

दक्कन ट्रैप मुख्यतः क्रिटेशियस के अंतिम भाग के विशाल ज्वालामुखीय उद्गारों से संबंधित है।

गैर-पक्षी डायनासोर लगभग 66 मिलियन वर्ष पूर्व समाप्त हुए।

पैलियोजीन में भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट की टक्कर हिमालय निर्माण से जुड़ी है।

नियोजीन में घास के मैदानों तथा आधुनिक स्तनधारी समूहों का व्यापक विस्तार हुआ।

चतुर्थक मानव विकास और हिमयुगों की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

वर्तमान काल चतुर्थक है और वर्तमान औपचारिक युग होलोसीन है।


समसामयिक भूगोल संबंध

भूवैज्ञानिक समय-सीमाएँ वैज्ञानिक अनुसंधान के साथ और अधिक सटीक होती रहती हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तरिकी आयोग ने जून 2026 के नवीन भूवैज्ञानिक चार्ट में ट्रायसिक के कुछ छोटे स्तरों तथा पर्मियन की एक सीमा की संख्यात्मक आयु को नए रेडियोमेट्रिक अध्ययनों के आधार पर संशोधित किया है।

इससे बड़े कालों—जैसे पर्मियन, ट्रायसिक या जुरासिक—का मूल क्रम नहीं बदला है, लेकिन यह दर्शाता है कि भूवैज्ञानिक समय मापनी एक वैज्ञानिक रूप से लगातार परिष्कृत होने वाली व्यवस्था है।

इसीलिए परीक्षा की तैयारी में मुख्य कालों के क्रम, प्रमुख घटनाएँ और भारत से संबंध अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं; प्रत्येक सूक्ष्म सीमा की दशमलव आयु रटना आवश्यक नहीं है।


अगला अध्ययन-विषय

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निष्कर्ष

भूवैज्ञानिक काल पृथ्वी के इतिहास को ऐसी इकाइयों में बाँटते हैं जिनसे भौतिक तथा जैविक विकास को स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। कैंब्रियन में जटिल समुद्री जीवन के विस्तार से लेकर पर्मियन की विशाल विलुप्ति, मध्यजीवी के डायनासोर, क्रिटेशियस के दक्कन ट्रैप और नवजीवी में हिमालय तथा मानव के विकास तक प्रत्येक काल पृथ्वी के वर्तमान स्वरूप की कहानी का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। भारत के कोयला संसाधनों, दक्कन ट्रैप, हिमालय और आधुनिक स्थलरूपों को समझने के लिए भी इन कालों का सही क्रम विशेष महत्व रखता है।