पृथ्वी की गतियाँ

पृथ्वी स्थिर नहीं है। वह अंतरिक्ष में निरंतर गतिशील रहती है। पृथ्वी की अनेक गतियाँ हैं, किंतु भूगोल की दृष्टि से दो गतियाँ सबसे महत्वपूर्ण हैं—घूर्णन और परिक्रमण। पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है, जिसे घूर्णन कहते हैं, जबकि वह सूर्य के चारों ओर अपनी कक्षा में घूमती है, जिसे परिक्रमण कहा जाता है।

पृथ्वी की इन दोनों गतियों तथा उसकी धुरी के झुकाव के संयुक्त प्रभाव से दिन और रात, ऋतुओं का परिवर्तन, दिन-रात की अवधि में परिवर्तन, विषुव और अयनांत जैसी महत्वपूर्ण घटनाएँ उत्पन्न होती हैं।

पृथ्वी का घूर्णन

पृथ्वी का अपने काल्पनिक अक्ष पर घूमना घूर्णन कहलाता है। पृथ्वी का अक्ष उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव को मिलाने वाली एक काल्पनिक रेखा है जो पृथ्वी के केंद्र से होकर गुजरती है।

पृथ्वी पश्चिम से पूर्व दिशा में घूमती है। इसी कारण हमें सूर्य, चंद्रमा और तारों की दैनिक आभासी गति पूर्व से पश्चिम की ओर दिखाई देती है। वास्तव में सूर्य पृथ्वी के चारों ओर प्रतिदिन नहीं घूमता, बल्कि पृथ्वी के पश्चिम से पूर्व घूर्णन के कारण सूर्य पूर्व में उगता और पश्चिम में अस्त होता हुआ दिखाई देता है।

पृथ्वी एक सौर दिन में लगभग 24 घंटे में एक घूर्णन पूरा करती है। तारों के संदर्भ में एक वास्तविक घूर्णन की अवधि लगभग 23 घंटे 56 मिनट 4 सेकंड होती है, जिसे नाक्षत्र दिवस कहा जाता है। सामान्य दैनिक जीवन और समय की गणना के लिए लगभग 24 घंटे का सौर दिवस उपयोग किया जाता है।

पृथ्वी 24 घंटे में लगभग 360° घूमती है। इसलिए वह एक घंटे में लगभग 15° और चार मिनट में लगभग देशांतर घूमती है। स्थानीय समय और देशांतर के बीच संबंध का आधार यही घूर्णन है।

पृथ्वी के घूर्णन की रैखिक गति सभी अक्षांशों पर समान नहीं होती। विषुवत रेखा पर पृथ्वी की परिधि सबसे अधिक होने के कारण यहाँ घूर्णन की रैखिक गति लगभग 1670 किमी प्रति घंटा है। ध्रुवों की ओर यह गति धीरे-धीरे कम होती जाती है और भौगोलिक ध्रुवों पर लगभग शून्य हो जाती है।

घूर्णन के प्रमुख प्रभाव

पृथ्वी के घूर्णन का सबसे स्पष्ट परिणाम दिन और रात का होना है। पृथ्वी का जो भाग सूर्य की ओर रहता है वहाँ दिन होता है, जबकि विपरीत भाग में रात होती है। पृथ्वी के लगातार घूमते रहने से प्रत्येक स्थान बारी-बारी से प्रकाश और अंधकार वाले भाग में प्रवेश करता रहता है।

दिन और रात को अलग करने वाली काल्पनिक रेखा को प्रदीप्ति वृत्त कहा जाता है। यह पृथ्वी को प्रकाशित और अंधकारमय भागों में बाँटता है।

घूर्णन के कारण पृथ्वी विषुवत रेखा पर कुछ उभरी और ध्रुवों पर चपटी हो गई है। यही कारण है कि पृथ्वी की विषुवतीय त्रिज्या ध्रुवीय त्रिज्या से अधिक है।

घूर्णन पृथ्वी पर गतिशील वायु और महासागरीय जल की दिशा को भी प्रभावित करता है। इस विक्षेपण को कोरिओलिस प्रभाव कहा जाता है। उत्तरी गोलार्द्ध में गतिशील वस्तुएँ अपनी गति की दिशा के दाईं ओर तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में बाईं ओर विक्षेपित होती दिखाई देती हैं। विषुवत रेखा पर कोरिओलिस प्रभाव लगभग शून्य होता है और ध्रुवों की ओर बढ़ता जाता है।

इस प्रभाव का विस्तृत अध्ययन आगे पवन और महासागरीय धाराओं के साथ किया जाएगा।

पृथ्वी का परिक्रमण

पृथ्वी का सूर्य के चारों ओर अपनी निश्चित कक्षा में घूमना परिक्रमण कहलाता है।

पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा लगभग 365 दिन 5 घंटे 48 मिनट 46 सेकंड में पूरी करती है। सामान्य कैलेंडर में एक वर्ष 365 दिनों का माना जाता है। हर वर्ष बचने वाले लगभग 6 घंटे चार वर्षों में लगभग 24 घंटे अर्थात एक दिन के बराबर हो जाते हैं। इसी समायोजन के कारण सामान्यतः प्रत्येक चौथे वर्ष फरवरी में एक अतिरिक्त दिन जोड़कर 29 दिन किए जाते हैं और उस वर्ष को अधिवर्ष कहा जाता है।

कैलेंडर की अधिक सटीक व्यवस्था में शताब्दी वर्ष तभी अधिवर्ष माना जाता है जब वह 400 से पूर्णतः विभाजित हो। इसलिए 2000 अधिवर्ष था, जबकि 1900 अधिवर्ष नहीं था।

पृथ्वी सूर्य के चारों ओर औसतन लगभग 29.8 किमी प्रति सेकंड, अर्थात लगभग 1,07,000 किमी प्रति घंटा की गति से परिक्रमण करती है।

पृथ्वी की कक्षा

पृथ्वी की कक्षा पूर्ण वृत्ताकार न होकर थोड़ी दीर्घवृत्ताकार है। इसलिए पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी पूरे वर्ष समान नहीं रहती।

जब पृथ्वी सूर्य के सबसे निकट होती है, उस स्थिति को उपसौर कहा जाता है। यह सामान्यतः जनवरी के प्रारंभ, लगभग 3 जनवरी, के आसपास होता है। इस समय पृथ्वी और सूर्य के बीच दूरी लगभग 14.71 करोड़ किमी होती है।

जब पृथ्वी सूर्य से सर्वाधिक दूर होती है, उस स्थिति को अपसौर कहते हैं। यह सामान्यतः जुलाई के प्रारंभ, लगभग 4 जुलाई, के आसपास होती है। उस समय पृथ्वी और सूर्य के बीच दूरी लगभग 15.21 करोड़ किमी होती है।

पृथ्वी और सूर्य के बीच औसत दूरी लगभग 14.96 करोड़ किमी है। इस औसत दूरी को एक खगोलीय इकाई माना जाता है।

यह तथ्य विशेष रूप से महत्वपूर्ण है कि पृथ्वी पर ऋतुओं का मुख्य कारण सूर्य से दूरी में परिवर्तन नहीं है। यदि दूरी ही मुख्य कारण होती, तो जनवरी में सूर्य के सबसे निकट होने पर उत्तरी गोलार्द्ध में गर्मी होनी चाहिए थी, जबकि उस समय वहाँ शीत ऋतु होती है।

ऋतुओं का वास्तविक कारण पृथ्वी का अक्षीय झुकाव और परिक्रमण है।

पृथ्वी का अक्षीय झुकाव

पृथ्वी का अक्ष अपनी कक्षा के तल पर खींची गई लंबवत रेखा से लगभग 23½° झुका हुआ है। दूसरे शब्दों में पृथ्वी का अक्ष कक्षीय तल के साथ लगभग 66½° का कोण बनाता है।

यही झुकाव पृथ्वी पर ऋतुओं, सूर्य की किरणों के आपतन कोण और दिन-रात की लंबाई में परिवर्तन का मूल कारण है।

पृथ्वी परिक्रमण के दौरान अपनी धुरी की दिशा को लगभग समान बनाए रखती है। इसे अक्ष का समानांतर बने रहना कहा जा सकता है। इसी कारण वर्ष के एक भाग में उत्तरी गोलार्द्ध सूर्य की ओर झुका रहता है और दूसरे भाग में दक्षिणी गोलार्द्ध सूर्य की ओर झुक जाता है।

यदि पृथ्वी की धुरी झुकी हुई न होती, तो वर्षभर सूर्य की सीधी किरणों का वितरण लगभग समान रहता और वर्तमान रूप में स्पष्ट ऋतु परिवर्तन नहीं होता।

ऋतुओं का परिवर्तन

ऋतुओं का निर्माण केवल पृथ्वी के परिक्रमण से नहीं होता। इसके लिए पृथ्वी के परिक्रमण और 23½° अक्षीय झुकाव दोनों आवश्यक हैं।

जब उत्तरी गोलार्द्ध सूर्य की ओर झुका होता है, तब वहाँ सूर्य की किरणें अधिक सीधी पड़ती हैं और दिन लंबे होते हैं। इसलिए उत्तरी गोलार्द्ध में ग्रीष्म ऋतु होती है। उसी समय दक्षिणी गोलार्द्ध सूर्य से अपेक्षाकृत दूर झुका होता है, वहाँ किरणें अधिक तिरछी पड़ती हैं और दिन छोटे होते हैं। इसलिए दक्षिणी गोलार्द्ध में शीत ऋतु होती है।

लगभग छह महीने बाद स्थिति उलट जाती है। दक्षिणी गोलार्द्ध सूर्य की ओर झुक जाता है और वहाँ ग्रीष्म ऋतु होती है, जबकि उत्तरी गोलार्द्ध में शीत ऋतु होती है।

इस प्रकार उत्तरी और दक्षिणी गोलार्द्धों में ऋतुएँ एक-दूसरे के विपरीत होती हैं।

सूर्य की किरणें और ताप

सूर्य की किरणों का पृथ्वी की सतह पर पड़ने वाला कोण तापमान को प्रभावित करता है।

जब सूर्य की किरणें लगभग लंबवत पड़ती हैं, तो समान मात्रा में सौर ऊर्जा अपेक्षाकृत छोटे क्षेत्र में केंद्रित होती है। इसलिए वहाँ अधिक ऊष्मा प्राप्त होती है।

तिरछी किरणें समान ऊर्जा को बड़े क्षेत्र में फैला देती हैं और उन्हें वायुमंडल की अपेक्षाकृत अधिक मोटाई से होकर गुजरना पड़ता है। इसलिए उनकी ऊष्मा प्रभावशीलता कम होती है।

इसी कारण ऋतु परिवर्तन केवल दिन की अवधि पर निर्भर नहीं करता, बल्कि सूर्य की किरणों के आपतन कोण में परिवर्तन भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

ग्रीष्म अयनांत

लगभग 21 जून को उत्तरी गोलार्द्ध सूर्य की ओर अधिकतम झुका होता है। इस समय सूर्य की लंबवत किरणें कर्क रेखा, 23½° उत्तर अक्षांश, के आसपास पड़ती हैं।

इस स्थिति को उत्तरी गोलार्द्ध का ग्रीष्म अयनांत कहा जाता है।

इस समय उत्तरी गोलार्द्ध में वर्ष का सबसे लंबा दिन और सबसे छोटी रात होती है। दक्षिणी गोलार्द्ध में स्थिति इसके विपरीत होती है और वहाँ शीत ऋतु होती है।

उत्तरी ध्रुवीय क्षेत्र में इस समय बहुत लंबे दिन पाए जाते हैं। आर्कटिक वृत्त के उत्तर में कुछ क्षेत्रों में सूर्य 24 घंटे तक क्षितिज के ऊपर रह सकता है।

शीत अयनांत

लगभग 21 या 22 दिसंबर को दक्षिणी गोलार्द्ध सूर्य की ओर अधिकतम झुका होता है। इस समय सूर्य की लंबवत किरणें मकर रेखा, 23½° दक्षिण अक्षांश, पर पड़ती हैं।

उत्तरी गोलार्द्ध के लिए यह शीत अयनांत है।

इस समय उत्तरी गोलार्द्ध में वर्ष का सबसे छोटा दिन और सबसे लंबी रात होती है, जबकि दक्षिणी गोलार्द्ध में ग्रीष्म ऋतु तथा लंबे दिन पाए जाते हैं।

अंटार्कटिक वृत्त के दक्षिण में अनेक स्थानों पर इस समय 24 घंटे तक सूर्य दिखाई दे सकता है।

विषुव

वर्ष में दो अवसर ऐसे आते हैं जब सूर्य की लंबवत किरणें विषुवत रेखा पर पड़ती हैं और पृथ्वी के दोनों गोलार्द्ध सूर्य के संबंध में लगभग समान स्थिति में होते हैं। इन्हें विषुव कहा जाता है।

ये सामान्यतः लगभग 20 या 21 मार्च तथा 22 या 23 सितंबर को होते हैं।

मार्च के विषुव को उत्तरी गोलार्द्ध में वसंत विषुव तथा सितंबर के विषुव को शरद विषुव कहा जाता है। दक्षिणी गोलार्द्ध में ऋतुएँ इसके विपरीत होती हैं।

विषुव के समय प्रदीप्ति वृत्त दोनों ध्रुवों से होकर गुजरता है। पृथ्वी के अधिकांश स्थानों पर दिन और रात की अवधि लगभग समान होती है।

परीक्षा में यह ध्यान रखना चाहिए कि व्यावहारिक रूप से दिन और रात हमेशा ठीक 12-12 घंटे नहीं होते, क्योंकि वायुमंडलीय अपवर्तन और सूर्य के स्पष्ट आकार जैसे कारणों से थोड़ा अंतर हो सकता है। भौगोलिक सिद्धांत में इन्हें लगभग बराबर माना जाता है।

अयनांत और विषुव में अंतर

अयनांत के समय सूर्य की लंबवत किरणें कर्क या मकर रेखा पर पड़ती हैं और दिन-रात की लंबाई में अंतर अधिकतम होता है।

विषुव के समय सूर्य की लंबवत किरणें विषुवत रेखा पर पड़ती हैं और दिन तथा रात लगभग बराबर होते हैं।

इसलिए वर्ष में मुख्य खगोलीय स्थितियाँ इस क्रम से समझी जा सकती हैं:

लगभग समयसूर्य की लंबवत किरणेंउत्तरी गोलार्द्ध की स्थिति
20–21 मार्चविषुवत रेखावसंत विषुव
21 जूनकर्क रेखाग्रीष्म अयनांत
22–23 सितंबरविषुवत रेखाशरद विषुव
21–22 दिसंबरमकर रेखाशीत अयनांत

दिन और रात की लंबाई में परिवर्तन

विषुवत रेखा के निकट पूरे वर्ष दिन और रात की अवधि में बहुत कम अंतर होता है। यहाँ दोनों लगभग 12-12 घंटे के आसपास रहते हैं।

जैसे-जैसे विषुवत रेखा से ध्रुवों की ओर बढ़ते हैं, दिन और रात की मौसमी अवधि में अंतर बढ़ता जाता है।

मध्य अक्षांशों में गर्मियों में दिन लंबे और सर्दियों में छोटे होते हैं।

ध्रुवीय क्षेत्रों में यह अंतर अत्यधिक हो जाता है। आर्कटिक और अंटार्कटिक वृत्त के भीतर कुछ स्थानों पर वर्ष के किसी भाग में सूर्य लगातार 24 घंटे या उससे अधिक समय तक दिखाई दे सकता है, जिसे सामान्यतः मध्यरात्रि का सूर्य कहा जाता है। दूसरे मौसम में सूर्य लंबे समय तक क्षितिज के ऊपर नहीं आता और ध्रुवीय रात की स्थिति बनती है।

भौगोलिक ध्रुवों के बहुत निकट लगभग छह महीने तक दिन और लगभग छह महीने तक रात जैसी स्थिति पाई जाती है।

कर्क और मकर रेखाओं का महत्व

पृथ्वी के अक्षीय झुकाव के कारण सूर्य की लंबवत किरणें वर्ष के दौरान विषुवत रेखा के उत्तर और दक्षिण की ओर स्थानांतरित होती दिखाई देती हैं।

लेकिन सूर्य की लंबवत किरणें 23½° उत्तर से आगे उत्तर की ओर और 23½° दक्षिण से आगे दक्षिण की ओर कभी नहीं पहुँचतीं।

इसलिए कर्क रेखा सूर्य की लंबवत किरणों की उत्तरी सीमा और मकर रेखा दक्षिणी सीमा है।

इसी कारण कर्क और मकर रेखाओं के बीच का क्षेत्र उष्ण कटिबंध कहलाता है।

आर्कटिक और अंटार्कटिक वृत्त का महत्व

पृथ्वी का अक्ष 23½° झुका हुआ है। इसी के पूरक कोण 66½° पर आर्कटिक और अंटार्कटिक वृत्त स्थित हैं।

इन वृत्तों के ध्रुवीय ओर कम से कम वर्ष के किसी समय 24 घंटे दिन या 24 घंटे रात की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।

इस प्रकार 23½° अक्षीय झुकाव का सीधा संबंध चार महत्वपूर्ण अक्षांशों से है—

कर्क रेखा 23½° उत्तर, मकर रेखा 23½° दक्षिण, आर्कटिक वृत्त 66½° उत्तर और अंटार्कटिक वृत्त 66½° दक्षिण।

पृथ्वी की गति से संबंधित आवश्यक तथ्य

पृथ्वी पश्चिम से पूर्व दिशा में घूर्णन करती है और सूर्य की परिक्रमा भी उसी सामान्य दिशा में करती है।

घूर्णन की अवधि लगभग 24 घंटे तथा परिक्रमण की अवधि लगभग 365¼ दिन है।

पृथ्वी के अक्ष का झुकाव लंबवत दिशा से लगभग 23½° और कक्षीय तल से लगभग 66½° है।

पृथ्वी की औसत परिक्रमण गति लगभग 29.8 किमी प्रति सेकंड है।

विषुवत रेखा पर घूर्णन की रैखिक गति लगभग 1670 किमी प्रति घंटा है।

घूर्णन से दिन-रात, स्थानीय समय, कोरिओलिस प्रभाव तथा विषुवतीय उभार जैसी घटनाएँ जुड़ी हैं।

ऋतु परिवर्तन का कारण केवल पृथ्वी-सूर्य दूरी नहीं, बल्कि अक्षीय झुकाव और परिक्रमण का संयुक्त प्रभाव है।

उत्तरी और दक्षिणी गोलार्द्धों में ऋतुएँ परस्पर विपरीत होती हैं।

लगभग 21 जून को सूर्य कर्क रेखा के ऊपर तथा लगभग 21–22 दिसंबर को मकर रेखा के ऊपर लंबवत होता है।

मार्च और सितंबर के विषुवों में सूर्य विषुवत रेखा के ऊपर लंबवत होता है।

पृथ्वी सूर्य के सबसे निकट जनवरी के प्रारंभ में और सबसे दूर जुलाई के प्रारंभ में होती है। इसलिए उत्तरी गोलार्द्ध में जनवरी की सर्दी पृथ्वी की सूर्य से अधिक दूरी के कारण नहीं होती।

निष्कर्ष

पृथ्वी की घूर्णन और परिक्रमण गतियाँ पृथ्वी पर समय और ऋतुओं की प्राकृतिक व्यवस्था का आधार हैं। घूर्णन दिन-रात, स्थानीय समय, पृथ्वी के विषुवतीय उभार और गतिशील वायु तथा जल के विक्षेपण को प्रभावित करता है। परिक्रमण स्वयं ऋतुओं के लिए पर्याप्त नहीं है; पृथ्वी की धुरी का 23½° झुकाव इसके साथ मिलकर सूर्य की किरणों के कोण और दिन-रात की अवधि को बदलता है। इसी संयुक्त प्रभाव से ग्रीष्म, शीत, विषुव और अयनांत जैसी वार्षिक घटनाएँ उत्पन्न होती हैं।