1.3.4 पृथ्वी का ताप और चुंबकत्व
पृथ्वी केवल एक ठोस ग्रह नहीं है; उसके भीतर निरंतर ऊष्मा प्रवाह और धात्विक द्रवों की गति जैसी सक्रिय प्रक्रियाएँ चलती रहती हैं। यही आंतरिक ऊष्मा प्लेट विवर्तनिकी, मैग्मा निर्माण, ज्वालामुखिता और पर्वतनिर्माण जैसी अंतर्जात प्रक्रियाओं को ऊर्जा देती है, जबकि द्रव बाह्य क्रोड की गति पृथ्वी के भू-चुंबकीय क्षेत्र (Geomagnetic Field) का निर्माण करती है।
इसलिए पृथ्वी का ताप और चुंबकत्व उसकी आंतरिक संरचना को समझने के दो प्रमुख भूभौतिकीय आधार हैं।
पृथ्वी के आंतरिक ताप का महत्व
गहराई बढ़ने के साथ सामान्यतः तापमान बढ़ता है। पर्पटी के ऊपरी भाग में तापमान वृद्धि की दर को भूतापीय प्रवणता (Geothermal Gradient) कहा जाता है।
पृथ्वी के भीतर ताप के प्रमुख स्रोत हैं—
- ग्रह निर्माण के समय बची प्रारंभिक ऊष्मा,
- रेडियोधर्मी तत्वों का क्षय,
- पृथ्वी के विभेदन से जुड़ी ऊष्मा,
- आंतरिक क्रोड के क्रिस्टलीकरण से मुक्त ऊष्मा।
पृथ्वी की आंतरिक ऊष्मा सतह की ओर मुख्यतः तीन प्रक्रियाओं से पहुँचती है—
चालन (Conduction)
ठोस चट्टानों से ऊष्मा का संचरण।
संवहन (Convection)
मैंटल और बाह्य क्रोड में पदार्थ की धीमी गति के साथ ऊष्मा का स्थानांतरण।
द्रव-प्रवाह आधारित ऊष्मा परिवहन (Advection)
मैग्मा या गरम जल जैसे गतिशील द्रवों द्वारा ऊष्मा का परिवहन।
भूतापीय प्रवणता
पर्पटी के ऊपरी हिस्से में औसत भूतापीय प्रवणता को सामान्यतः लगभग 25–30°C प्रति किमी के क्रम में समझाया जाता है, लेकिन यह पूरी पृथ्वी पर समान नहीं होती।
उच्च ज्वालामुखीय और सक्रिय विवर्तनिक क्षेत्रों में यह अधिक हो सकती है, जबकि स्थिर प्राचीन क्रेटोनिक क्षेत्रों में कम हो सकती है।
गहराई में तापमान का बढ़ना एक समान रैखिक दर से पृथ्वी के केंद्र तक जारी नहीं रहता।
परीक्षा-सावधानी
यदि 30°C प्रति किमी की दर को सीधे 6,371 किमी तक लागू कर दें, तो अवास्तविक तापमान मिलेगा।
अतः यह औसत मुख्यतः उथली पर्पटी के लिए उपयोगी है।
भू-तापीय प्रवाह
पृथ्वी के भीतर से सतह की ओर निकलने वाली ऊष्मा को भू-तापीय प्रवाह (Geothermal Heat Flow) कहा जाता है।
यह सामान्यतः—
- मध्य-महासागरीय कटकों,
- सक्रिय ज्वालामुखीय क्षेत्रों,
- रिफ्ट प्रदेशों
में अधिक होता है।
इसके विपरीत बहुत पुराने स्थिर महाद्वीपीय क्षेत्रों में अपेक्षाकृत कम हो सकता है।
भूतापीय ऊर्जा
जहाँ पृथ्वी की आंतरिक ऊष्मा सतह के निकट पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हो, वहाँ उसका उपयोग भूतापीय ऊर्जा (Geothermal Energy) के रूप में किया जा सकता है।
इसके उपयोग—
- विद्युत उत्पादन,
- भवनों का ताप नियंत्रण,
- हरितगृह,
- मत्स्यपालन,
- औद्योगिक ताप,
- गरम जल आधारित पर्यटन
में किए जा सकते हैं।
भारत में पुगा घाटी, मणिकरण, तत्तापानी और अन्य क्षेत्रों में भूतापीय संसाधनों की पहचान की गई है।
पृथ्वी का भू-चुंबकीय क्षेत्र
पृथ्वी के चारों ओर एक चुंबकीय क्षेत्र मौजूद है जिसे भू-चुंबकीय क्षेत्र (Geomagnetic Field) कहते हैं।
प्रथम अनुमान में यह एक बड़े द्विध्रुवीय चुंबक जैसा दिखाई देता है, लेकिन वास्तव में यह समय के साथ बदलने वाली जटिल प्रणाली है।
इसका मुख्य स्रोत पृथ्वी का द्रव बाह्य क्रोड है।
भू-डायनेमो
द्रव बाह्य क्रोड में लौह-समृद्ध विद्युत-चालक पदार्थ निरंतर गतिशील रहता है।
इस द्रव की संवहनीय गति, पृथ्वी का घूर्णन और विद्युत धाराएँ मिलकर भू-चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करती हैं।
इसे भू-डायनेमो (Geodynamo) कहा जाता है।
परीक्षा-फँद
पृथ्वी का मुख्य चुंबकीय क्षेत्र किसी स्थायी विशाल लौह चुंबक से नहीं बनता।
मुख्य स्रोत है—
द्रव बाह्य क्रोड की गतिशील विद्युत-चालक सामग्री।
चुंबकीय ध्रुव और भौगोलिक ध्रुव
भौगोलिक ध्रुव पृथ्वी के घूर्णन अक्ष से निर्धारित होते हैं।
चुंबकीय ध्रुव पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से संबंधित होते हैं।
दोनों एक ही स्थान पर नहीं हैं।
पृथ्वी का चुंबकीय अक्ष भौगोलिक अक्ष से लगभग 11° के क्रम में झुका है।
चुंबकीय नति और दिक्पात
चुंबकीय नति (Magnetic Inclination) वह कोण है जो पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र क्षैतिज तल के साथ बनाता है।
चुंबकीय विषुवत रेखा के पास नति लगभग 0° होती है और चुंबकीय ध्रुवों के पास लगभग 90° तक पहुँचती है।
चुंबकीय दिक्पात (Magnetic Declination) भौगोलिक उत्तर और चुंबकीय उत्तर के बीच क्षैतिज कोण है।
चुंबकीय विषुवत रेखा
चुंबकीय विषुवत रेखा वह क्षेत्र है जहाँ चुंबकीय नति लगभग शून्य होती है।
भारत का थुम्बा, केरल चुंबकीय विषुवत रेखा के निकट होने के कारण अंतरिक्ष अनुसंधान के इतिहास में विशेष महत्व रखता है।
पुराचुंबकत्व
जब लावा ठंडा होकर ठोस होता है, तो लौह-युक्त खनिज उस समय के पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र की दिशा को सुरक्षित कर सकते हैं।
प्राचीन चट्टानों में संरक्षित इस चुंबकीय अभिलेख के अध्ययन को पुराचुंबकत्व (Paleomagnetism) कहा जाता है।
पुराचुंबकीय प्रमाणों ने—
- महाद्वीपीय विस्थापन,
- समुद्रतल प्रसार,
- प्लेट विवर्तनिकी,
- चुंबकीय ध्रुवीय उलटाव
की पुष्टि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
ध्रुवीय उलटाव
भूवैज्ञानिक इतिहास में पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र की ध्रुवीयता अनेक बार उलटी है।
अर्थात वर्तमान चुंबकीय उत्तर और दक्षिण जैसी व्यवस्था अतीत में कई बार विपरीत हो चुकी है।
यह प्रक्रिया अनियमित है और निश्चित अंतराल पर नहीं होती।
महासागरीय तल पर मध्य-महासागरीय कटक के दोनों ओर समानांतर चुंबकीय धारियाँ ध्रुवीय उलटाव और समुद्रतल प्रसार के महत्वपूर्ण प्रमाण हैं।
2025–2026 समसामयिक अद्यतन — दक्षिण अटलांटिक विसंगति
यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के स्वॉर्म उपग्रह समूह (Swarm Satellite Constellation) के 2014–2025 आँकड़ों के अनुसार दक्षिण अमेरिका और दक्षिण अटलांटिक के ऊपर स्थित कमजोर चुंबकीय क्षेत्र, जिसे दक्षिण अटलांटिक विसंगति (South Atlantic Anomaly) कहा जाता है, का विस्तार हुआ है।
2014 से 2025 के बीच कमजोर क्षेत्र लगभग महाद्वीपीय यूरोप के आधे क्षेत्रफल के बराबर अतिरिक्त क्षेत्र तक बढ़ा। 2026 में प्रकाशित शोध ने इसके दूसरे न्यूनतम क्षेत्र की पूर्व की ओर गति और तीव्रता में परिवर्तन का भी अध्ययन किया।
यह क्षेत्र उपग्रहों के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहाँ उच्च-ऊर्जा कणों का प्रभाव बढ़ सकता है।
महत्वपूर्ण सावधानी
दक्षिण अटलांटिक विसंगति का बढ़ना अपने-आप यह सिद्ध नहीं करता कि पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र निकट भविष्य में उलटने वाला है।
2025–2026 भारत का भूतापीय अद्यतन
भारत सरकार ने सितंबर 2025 में राष्ट्रीय भूतापीय ऊर्जा नीति (National Policy on Geothermal Energy) अधिसूचित की।
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने भारत में लगभग 381 गरम जल स्रोतों का दस्तावेजीकरण किया है और लगभग 10,600 मेगावाट सैद्धांतिक भूतापीय क्षमता का अनुमान दिया है।
जुलाई 2026 में लद्दाख की पुगा घाटी में भारत के पहले 2 भूतापीय कुएँ चालू किए गए। दोनों लगभग 1,000 मीटर गहरे हैं और प्रस्तावित 1 मेगावाट प्रदर्शन परियोजना के लिए संसाधन मूल्यांकन में उपयोगी होंगे।
सत्यापित UPSC Prelims PYQ
UPSC प्रारंभिक परीक्षा, 2013
प्रश्न में निम्न कारकों को पृथ्वी की सतह पर गतिशील परिवर्तन लाने वाला बताया गया था—
- विद्युतचुंबकीय विकिरण
- भूतापीय ऊर्जा
- गुरुत्वीय बल
- प्लेट गतियाँ
- पृथ्वी का घूर्णन
- पृथ्वी का परिक्रमण
सही उत्तर: सभी 6।
यह पृथ्वी की आंतरिक ऊष्मा और भू-गतिशीलता के संबंध पर महत्वपूर्ण प्रश्न है।
UPSC प्रारंभिक परीक्षा, 2005
पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से संबंधित कथनों में चुंबकीय ध्रुव, चुंबकीय अक्ष और थुम्बा की स्थिति पूछी गई थी।
सही निष्कर्ष में—
- उत्तरी गोलार्ध का चुंबकीय ध्रुव उत्तरी कनाडा क्षेत्र से संबंधित था,
- थुम्बा चुंबकीय विषुवत रेखा के निकट था,
- चुंबकीय अक्ष को 23° झुका बताने वाला कथन गलत था।
UPSC प्रारंभिक परीक्षा, 2012
अंतरिक्ष से आने वाले तीव्र गति के आवेशित कणों को पृथ्वी की सतह तक पहुँचने से मुख्यतः कौन रोकता है?
सही उत्तर: पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र उन्हें ध्रुवीय क्षेत्रों की ओर मोड़ देता है।
UPSC प्रारंभिक परीक्षा, 2018
पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र के ध्रुवीय उलटाव से संबंधित कथन पूछा गया था।
प्रश्न में यह तथ्य सही माना गया कि पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र भूवैज्ञानिक अतीत में अनेक बार उलटा है।
सत्यापित UPSC Mains PYQ
UPSC Geography Optional, 2011
प्रश्न:
“भू-चुंबकत्व और पुराचुंबकत्व पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।”
यह इस विषय का प्रत्यक्ष Geography Optional प्रश्न है।
सत्यापित BPSC Prelims PYQ
70वीं BPSC संयुक्त प्रतियोगिता पुनर्परीक्षा, 2025
प्रश्न:
“चुंबकीय क्षेत्र की माप की इकाई क्या है?”
सही उत्तर:
टेस्ला (Tesla)।
यह सामान्य चुंबकत्व का प्रश्न है; इसे पृथ्वी के भू-चुंबकीय क्षेत्र की इकाई समझने के लिए उपयोगी पूरक PYQ के रूप में रखें।
सत्यापित BPSC Mains PYQ
71वीं BPSC मुख्य परीक्षा, 2026 — सामान्य अध्ययन-II
प्रश्न:
“उपयुक्त उदाहरणों सहित भारत में भूतापीय ऊर्जा के पर्यावरणीय और सामाजिक लाभों का विवरण दीजिए।”
यह भूतापीय ऊर्जा पर प्रत्यक्ष BPSC Mains प्रश्न है।
Prelims के लिए अंतिम तथ्य
भूतापीय प्रवणता पर्पटी के ऊपरी भाग में तापमान वृद्धि की दर है।
औसत उथला मान लगभग 25–30°C प्रति किमी के क्रम का माना जाता है।
पृथ्वी के ताप के प्रमुख स्रोत—प्रारंभिक ऊष्मा, रेडियोधर्मी क्षय और क्रोड क्रिस्टलीकरण।
भू-चुंबकीय क्षेत्र का मुख्य स्रोत द्रव बाह्य क्रोड है।
भू-डायनेमो विद्युत-चालक द्रव के संवहन और पृथ्वी के घूर्णन से जुड़ा है।
पुराचुंबकत्व प्लेट विवर्तनिकी का महत्वपूर्ण प्रमाण है।
चुंबकीय ध्रुवीय उलटाव अनियमित होते हैं।
दक्षिण अटलांटिक विसंगति कमजोर चुंबकीय क्षेत्र का क्षेत्र है।
निष्कर्ष
पृथ्वी की आंतरिक ऊष्मा और भू-चुंबकीय क्षेत्र ग्रह की गहरी गतिशीलता के दो प्रमुख संकेत हैं। आंतरिक ऊष्मा पृथ्वी की भू-गतिशील प्रक्रियाओं को ऊर्जा देती है, जबकि द्रव बाह्य क्रोड का भू-डायनेमो पृथ्वी का चुंबकीय सुरक्षा कवच बनाता है। आधुनिक उपग्रह और भूकंपीय अध्ययन इन दोनों प्रणालियों की जटिलता को लगातार अधिक स्पष्ट कर रहे हैं।