अर्थव्यवस्था • UPSC

औद्योगिक क्षेत्र, MSME एवं अवसंरचना

Industrial Sector, MSME & Infrastructure

औद्योगिक क्षेत्रक, IIP, 8 कोर उद्योग, MSME, औद्योगिक नीतियाँ, विनिर्माण पहलें, सार्वजनिक उपक्रम और अवसंरचना वित्तपोषण का अध्यायवार अध्ययन।

औद्योगिक क्षेत्रकMSMEऔद्योगिक नीतिअवसंरचना
इस अध्याय में
1. औद्योगिक क्षेत्रक का अवलोकन एवं जीडीपी में योगदान (Overview & Economic Role)2. सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME Sector)3. भारत की ऐतिहासिक औद्योगिक नीतियाँ (Historical Industrial Policies)4. विनिर्माण एवं आधुनिक पहलें (Manufacturing Initiatives)5. सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (PSUs) एवं विनिवेश नीति6. अवसंरचना विकास एवं वित्तपोषण (Infrastructure & Financing)7. UPSC परीक्षा विशेष मॉड्यूल (Exam Special Module)

1. औद्योगिक क्षेत्रक का अवलोकन एवं जीडीपी में योगदान (Overview & Economic Role)

भारतीय अर्थव्यवस्था में औद्योगिक क्षेत्रक (Industrial Sector) न केवल सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगभग 28-30% का योगदान देता है, बल्कि यह कृषि क्षेत्र से अतिरिक्त श्रम शक्ति को खपाने तथा सेवा क्षेत्रक को बैकवर्ड व फॉरवर्ड लिंकेज (Backward & Forward Linkages) प्रदान करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

                  [ औद्योगिक क्षेत्रक का आर्थिक चक्र ]
                                  │
       ┌──────────────────────────┴──────────────────────────┐
       ▼                                                     ▼
[कृषि के लिए इनपुट]                                [सेवा क्षेत्रक हेतु माँग]
 (ट्रैक्टर, उर्वरक, प्रसंस्करण)                     (परिवहन, बैंकिंग, लॉजिस्टिक्स)

(A) औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (Index of Industrial Production - IIP)

IIP भारत में औद्योगिक गतिविधियों के अल्पकालिक परिवर्तनों का मापन करने वाला एक प्रमुख समग्र संकेतक है।

संकलनकर्ता: राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO), सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI)।
आधार वर्ष (Base Year): 2011-12
मुख्य क्षेत्रक विभाजन (Sectoral Classification):
1.
खनन (Mining): भारांश ~14.37%
2.
विनिर्माण (Manufacturing): भारांश ~77.63% (सर्वोच्च भारांश)
3.
विद्युत (Electricity): भारांश ~7.99%

(B) 8 कोर बुनियादी उद्योग (8 Core Infrastructure Industries)

IIP में शामिल कुल औद्योगिक उत्पादन का 40.27% भारांश केवल इन 8 कोर उद्योगों का है। इनका भारांश क्रम (भारिता के घटते क्रम में) UPSC प्रीलिम्स हेतु अत्यंत महत्वपूर्ण है:

क्रमकोर उद्योग (Core Industry)भारांश (Weightage %)मुख्य विशेषताएँ व उपयोग
1रिफाइनरी उत्पाद (Refinery Products)28.04%सर्वोच्च भारांश; पेट्रोकेमिकल्स एवं ईंधन आधार।
2बिजली (Electricity)19.85%औद्योगिक संचालन हेतु प्राथमिक ऊर्जा घटक।
3इस्पात / स्टील (Steel)17.92%अवसंरचना एवं निर्माण का आधार।
4कोयला (Coal)10.33%तापीय विद्युत उत्पादन का प्रमुख स्रोत।
5कच्चा तेल (Crude Oil)8.98%ऊर्जा सुरक्षा एवं आयात निर्भरता।
6प्राकृतिक गैस (Natural Gas)6.88%स्वच्छ ऊर्जा एवं उर्वरक उद्योग का कच्चा माल।
7सीमेंट (Cement)5.37%रियल एस्टेट व अवसंरचना विकास का सूचकांक।
8उर्वरक (Fertilizers)2.63%न्यूनतम भारांश; कृषि उत्पादकता हेतु आवश्यक।

2. सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME Sector)

MSME क्षेत्रक को भारतीय अर्थव्यवस्था का 'विकास इंजन' (Engine of Growth) कहा जाता है। यह भारत के कुल विनिर्माण उत्पादन का लगभग 45%, निर्यात का 40% से अधिक और लगभग 11 करोड़ लोगों को रोजगार प्रदान करता है।

(A) MSME की संशोधित परिभाषा (MSME Revised Definition - 2020)

1 जुलाई 2020 से विनिर्माण (Manufacturing) तथा सेवा (Services) क्षेत्रक के बीच के अंतर को समाप्त कर दिया गया है। नई परिभाषा 'निवेश (Investment)' तथा 'वार्षिक टर्नओवर (Annual Turnover)' दोनों के संयुक्त मापदंडों पर आधारित है:

+------------------------------------------------------------------------+
|                     MSME का नया वर्गीकरण मापदंड                        |
+-------------------+----------------------------+-----------------------+
| उद्यम का प्रकार  | संयंत्र/मशीनरी में निवेश   | वार्षिक टर्नओवर       |
+-------------------+----------------------------+-----------------------+
| सूक्ष्म (Micro)   | <= ₹1 करोड़                | <= ₹5 करोड़            |
| लघु (Small)       | <= ₹10 करोड़               | <= ₹50 करोड़           |
| मध्यम (Medium)    | <= ₹50 करोड़               | <= ₹250 करोड़          |
+-------------------+----------------------------+-----------------------+

(B) MSME क्षेत्रक की प्रमुख पहलें

1.
उद्यम पोर्टल (Udyam Portal): MSMEs के त्वरित एवं नि:शुल्क ऑनलाइन पंजीकरण हेतु स्व-घोषणा आधारित सिंगल-विंडो सिस्टम।
2.
RAMP योजना (Raising and Accelerating MSME Performance): विश्व बैंक की सहायता से संचालित ₹6,000 करोड़ की योजना, जिसका उद्देश्य क्रेडिट पहुँच में सुधार करना और फर्मों का आधुनिकीकरण करना है।
3.
TReDS प्लेटफॉर्म (Trade Receivables Discounting System): MSME विक्रेताओं को कॉर्पोरेट खरीदारों से उनके व्यापारिक प्राप्य (Trade Receivables) को भुनाने हेतु RBI द्वारा विनियमित डिजिटल नीलामी तंत्र।

3. भारत की ऐतिहासिक औद्योगिक नीतियाँ (Historical Industrial Policies)

[1948 की नीति] ──> [1956 की नीति] ──> [1977/80 की नीति] ──> [1991 की नई औद्योगिक नीति]
(मिश्रित अर्थ.)    (महालनोबिस मॉडल)    (कुटीर उद्योग बल)     (LPG: डी-लाइसेंसिंग)

(A) 1948 की औद्योगिक नीति संकल्प (IPR 1948)

इसने भारत में 'मिश्रित अर्थव्यवस्था' (Mixed Economy) के मॉडल की आधारशिला रखी।
उद्योगों को 4 श्रेणियों में बाँटा गया: राज्य का पूर्ण एकाधिकार (रक्षा, परमाणु ऊर्जा, रेलवे), राज्य के नए उपक्रम, नियंत्रित निजी क्षेत्र, तथा निजी क्षेत्र हेतु खुला क्षेत्र।

(B) 1956 की औद्योगिक नीति संकल्प (IPR 1956 - औद्योगिक संविधान)

नेहरू-महालनोबिस मॉडल पर आधारित, जिसमें भारी एवं पूँजीगत उद्योगों (Capital Goods Industries) पर बल दिया गया।
सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) को अर्थव्यवस्था के "कमांडिंग हाइट्स" (Commanding Heights) की संज्ञा दी गई।
उद्योगों का अनुसूची A (17 उद्योग-पूर्णतः सरकारी), अनुसूची B (12 उद्योग-मिश्रित), और अनुसूची C (निजी क्षेत्र) में विभाजन।
लाइसेंस-परमिट-कोटा राज (Licensing Raj) की शुरुआत: नए उद्योग स्थापित करने या क्षमता विस्तार हेतु सरकारी अनुमति अनिवार्य बनाई गई।

(C) 1991 की नई औद्योगिक नीति (New Industrial Policy 1991)

एलपीजी (LPG - Liberalization, Privatization, Globalization) सुधारों के तहत भारतीय उद्योग जगत का क्रांतिकारी कायाकल्प किया गया:

1.
औद्योगिक डी-लाइसेंसिंग (Industrial De-licensing): केवल 5 अति-संवेदनशील उद्योगों (जैसे शराब, सिगरेट, खतरनाक रसायन, औद्योगिक विस्फोटक, एयरोस्पेस/रक्षा) को छोड़कर सभी के लिए लाइसेंस अनिवार्यता समाप्त।
2.
सार्वजनिक क्षेत्र का आरक्षण समाप्त (De-reservation): सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित उद्योगों की संख्या को घटकर केवल 2 कर दिया गया (परमाणु ऊर्जा और रेलवे परिचालन)।
3.
MRTP एक्ट में संशोधन: एकाधिकार एवं प्रतिबंधात्मक व्यापार व्यवहार (MRTP) अधिनियम के तहत परिसंपत्ति सीमा समाप्त की गई (बाद में 2002 में 'प्रतिस्पर्धा अधिनियम' लाया गया)।
4.
FDI का उदारीकरण: कई उद्योगों में स्वचालित मार्ग (Automatic Route) के तहत 51% तक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की स्वतः अनुमति।

4. विनिर्माण एवं आधुनिक पहलें (Manufacturing Initiatives)

(A) मेक इन इंडिया (Make in India 2.0)

प्रारंभ: सितम्बर 2014।
उद्देश्य: भारत को वैश्विक विनिर्माण हब बनाना, जीडीपी में विनिर्माण का हिस्सा बढ़ाकर 25% करना तथा 100 मिलियन नए रोजगार सृजित करना।
4 मुख्य स्तंभ: नई प्रक्रियाएँ (Ease of Doing Business), नई अवसंरचना (Industrial Corridors), नए क्षेत्रक (27 क्षेत्रक), तथा नई सोच (सरकार एक नियामक के स्थान पर सुगमकर्ता के रूप में)।

(B) उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना (PLI Scheme)

अवधारणा: भारत में घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने और आयात निर्भरता कम करने हेतु वृद्धिशील बिक्री (Incremental Sales) पर 4% से 6% का वित्तीय प्रोत्साहन।
कवरेज: 14 प्रमुख महत्वपूर्ण क्षेत्रक (जैसे- इलेक्ट्रॉनिक्स/मोबाइल, फार्मास्यूटिकल्स, ऑटोमोबाइल, सोलर पीवी मॉड्यूल, एडवांस केमिस्ट्री सेल बैटरी, और स्पेशलिटी स्टील)।
प्रभाव: इसने भारत को वैश्विक मोबाइल विनिर्माण में विश्व का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक बना दिया है।

(C) पीएम गतिशक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान (PM Gati Shakti Master Plan)

उद्देश्य: विभिन्न मंत्रालयों (रेलवे, सड़क, जलमार्ग, बिजली, दूरसंचार आदि) के बीच विभागीय साइलो (Silos) को तोड़कर एकीकृत अवसंरचना नियोजन (Multi-modal Connectivity) सुनिश्चित करना।
तकनीक: BISAG-N द्वारा विकसित GIS-आधारित स्थानिक योजना ढाँचा (Spatial Planning Tool)।

(D) राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नीति 2022 (National Logistics Policy - NLP)

लक्ष्य: भारत में लॉजिस्टिक्स लागत को वर्तमान जीडीपी के 13-14% से घटाकर वैश्विक मानकों (~8%) के अनुरूप लाना।
मुख्य घटक: ULIP (Unified Logistics Interface Platform), ELOG (Ease of Logistics Dashboard), तथा सिस्टम सुधार।

5. सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (PSUs) एवं विनिवेश नीति

(A) CPSEs का वर्गीकरण (Maharatna, Navratna, Miniratna)

                       [ CPSEs का वर्गीकरण ]
                                 │
     ┌───────────────────────────┼───────────────────────────┐
     ▼                           ▼                           ▼
[महारत्न (Maharatna)]     [नवरत्न (Navratna)]     [मिनीरत्न (Miniratna)]
 (विशाल स्वायत्तता)        (मध्यम स्वायत्तता)      (सीमित स्वायत्तता)
दर्जा (Status)मुख्य वित्तीय मानदंड (Financial Criteria)वित्तीय स्वायत्तता (Financial Autonomy)
महारत्न (Maharatna)• नवरत्न का दर्जा प्राप्त हो।<br>• पिछले 3 वर्षों में औसतन वार्षिक शुद्ध लाभ > ₹5,000 करोड़।<br>• औसतन टर्नओवर > ₹25,000 करोड़ या शुद्ध मूल्य (Net Worth) > ₹15,000 करोड़।बिना सरकारी पूर्व स्वीकृति के ₹5,000 करोड़ तक या परियोजना के मूल्य का 15% निवेश करने की स्वतंत्रता।
नवरत्न (Navratna)• मिनीरत्न Category-I हो।<br>• 6 चयनित वित्तीय संकेतकों में 100 में से कम से कम 60 अंक प्राप्त करे।बिना सरकारी स्वीकृति के ₹1,000 करोड़ तक या शुद्ध मूल्य का 15% निवेश करने की क्षमता।
मिनीरत्न (Miniratna)• Category-I: पिछले 3 वर्षों में निरंतर लाभ और शुद्ध लाभ ₹30 करोड़ या अधिक।Category-I: ₹500 करोड़ तक अथवा शुद्ध मूल्य के बराबर निवेश का अधिकार।

(प्रमुख महारत्न कंपनियाँ: NTPC, ONGC, IOCL, SAIL, BHEL, GAIL, HPCL, BPCL, POWERGRID, PFC, REC, OIL आदि)

(B) विनिवेश एवं रणनीतिक बिक्री (Disinvestment vs Strategic Disinvestment)

1.
साधारण विनिवेश (Minority Disinvestment): सरकार कंपनी में अपनी बहुलांश हिस्सेदारी (कम से कम 51%) और प्रबंधन नियंत्रण बनाए रखते हुए शेयर बाजार के माध्यम से छोटी हिस्सेदारी (जैसे 5-10%) बेचती है।
2.
रणनीतिक विनिवेश (Strategic Disinvestment): सरकार अपनी 50% या उससे अधिक हिस्सेदारी के साथ-साथ प्रबंधन नियंत्रण (Management Control) भी निजी क्रेता को हस्तांतरित कर देती है (उदाहरण: एयर इंडिया का टाटा समूह को हस्तांतरण)।
3.
कार्यान्वयन एजेंसी: DIPAM (निवेश और सार्वजनिक संपत्ति प्रबंधन विभाग), वित्त मंत्रालय।

(C) राष्ट्रीय परिसंपत्ति मुद्रीकरण पाइपलाइन (National Monetization Pipeline - NMP)

नीति आयोग द्वारा विकसित NMP का उद्देश्य 'ब्राउनफील्ड' (Brownfield) निष्प्रयोज्य/कम-उपयोग वाली सार्वजनिक संपत्तियों में निजी निवेश आकर्षित करना है।
इसमें संपत्ति का स्वामित्व (Ownership) सरकार के पास ही रहता है, केवल संचालन व सेवा अधिकार (Operational Rights) एक निश्चित अवधि हेतु लीज पर दिए जाते हैं।

6. अवसंरचना विकास एवं वित्तपोषण (Infrastructure & Financing)

(A) राष्ट्रीय अवसंरचना पाइपलाइन (National Infrastructure Pipeline - NIP)

अवधि: 2020-2025।
अनुमानित निवेश: ₹111 लाख करोड़
फंडिंग पैटर्न: केंद्र (39%), राज्य (40%), और निजी क्षेत्र (21%)।
प्रमुख क्षेत्रक: ऊर्जा (24%), सड़कें (19%), शहरी विकास (16%), और रेलवे (13%)।

(B) NaBFID (National Bank for Financing Infrastructure and Development)

दीर्घकालिक अवसंरचना वित्तपोषण की कमी को दूर करने हेतु स्थापित एक प्रमुख विकास वित्त संस्थान (DFI)
यह संस्थागत निवेशकों (जैसे पेंशन फंड, बीमा कंपनियों) से दीर्घकालिक पूँजी जुटाकर ढांचागत परियोजनाओं को कम ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराती है।

7. UPSC परीक्षा विशेष मॉड्यूल (Exam Special Module)

(A) प्रीलिम्स हेतु त्वरित पुनरीक्षण बिंदु (Quick Revision Points)

IIP में सर्वोच्च भारांश: विनिर्माण क्षेत्रक (~77.63%) का है।
8 कोर उद्योगों में सर्वोच्च भारांश: रिफाइनरी उत्पाद (28.04%) तथा न्यूनतम भारांश उर्वरक (2.63%) का है।
MSME की नई सीमा: मध्यम उद्योग हेतु निवेश ≤ ₹50 करोड़ और टर्नओवर ≤ ₹250 करोड़।
DIPAM: वित्त मंत्रालय के तहत कार्य करता है जो विनिवेश प्रक्रियाओं का प्रबंधन करता है।
NMP (National Monetization Pipeline): केवल ब्राउनफील्ड (विद्यमान) संपत्तियों का मुद्रीकरण करता है, ग्रीनफील्ड का नहीं।

(B) यूपीएससी प्रारम्भिक परीक्षा अभ्यास प्रश्न (Prelims Practice MCQs)

प्रश्न 1. औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) के अंतर्गत शामिल '8 कोर उद्योगों' (Core Industries) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

1.
IIP में 8 कोर उद्योगों का कुल भारांश 50% से अधिक है।
2.
8 कोर उद्योगों में सर्वाधिक भारांश 'बिजली' क्षेत्रक का है।
3.
कोर उद्योगों में न्यूनतम भारांश 'उर्वरक' उद्योग का है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (A) केवल 1 और 2 (B) केवल 3 (C) केवल 2 और 3 (D) 1, 2 और 3

उत्तर: (B) व्याख्या: कथन 1 गलत है (IIP में कोर उद्योगों का भारांश 40.27% है)। कथन 2 गलत है (सर्वोच्च भारांश 'रिफाइनरी उत्पाद' का 28.04% है, जबकि बिजली दूसरे स्थान पर 19.85% है)। कथन 3 सही है (उर्वरक का भारांश न्यूनतम 2.63% है)।


(C) मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन ढाँचा (Mains Answer Blueprint)

प्रश्न: "क्या भारत ने प्राथमिक (कृषि) क्षेत्रक से सीधे तृतीयक (सेवा) क्षेत्रक में छलांग लगाकर विनिर्माण चरण को पीछे छोड़ दिया है? भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसके प्रभावों की विवेचना कीजिए तथा 'मेक इन इंडिया' व 'PLI योजना' की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए।" (250 शब्द, 15 अंक)

                      [ मेन्स उत्तर-लेखन संरचना ]
                                  │
     ┌────────────────────────────┼────────────────────────────┐
     ▼                            ▼                            ▼
[भूमिका (Introduction)]    [मुख्य भाग (Body Content)]     [निष्कर्ष (Conclusion)]
 • समयपूर्व विमुद्रीकरण      • छलांग के दुष्परिणाम          • PLI/गतिशक्ति से समाधान
   (Premature                 • रोजगारहीन संवृद्धि         • 'असेंबल इन इंडिया' से
    Deindustrialization)      • PLI व लॉजिस्टिक्स प्रभाव      'मेक इन इंडिया'

उत्तर ढाँचा (Drafting Blueprint):

1.
भूमिका (Introduction - 30 शब्द):
कुजनेट्स (Kuznets) के पारंपरिक विकास मॉडल (कृषि ➔ उद्योग ➔ सेवा) के विपरीत भारत का विकास पथ "समयपूर्व विऔद्योगीकरण" (Premature Deindustrialization) को दर्शाता है, जहाँ विनिर्माण का योगदान लगभग 16-17% पर स्थिर बना हुआ है।
2.
मुख्य भाग (Body Content - 170 शब्द):
विनिर्माण चरण को छोड़ने के दुष्परिणाम:
रोजगार विसंगति: कृषि में 45% आबादी कार्यरत है जबकि जीडीपी में हिस्सा केवल 18% है। सेवा क्षेत्र कुशल श्रम की माँग करता है, जिससे अकुशल/अर्द्ध-कुशल श्रमिकों के लिए 'रोजगारहीन संवृद्धि' (Jobless Growth) की स्थिति बनी।
बाह्य क्षेत्र पर दबाव: इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों व पूँजीगत सामानों के भारी आयात के कारण चालू खाता घाटा (CAD) बढ़ता है।
सुधारात्मक पहलें (PLI एवं मेक इन इंडिया 2.0 की भूमिका):
PLI योजना: 14 प्रमुख क्षेत्रों में वृद्धिशील बिक्री पर वित्तीय प्रोत्साहन देकर घरेलू मूल्य संवर्धन (Domestic Value Addition) और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (GVC) में भारत को स्थापित कर रही है।
पीएम गतिशक्ति व NLP: लॉजिस्टिक्स लागत को घटाकर भारतीय विनिर्माण को वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धी बना रहे हैं।
3.
निष्कर्ष (Conclusion - 50 शब्द):
केवल सेवा क्षेत्र के बल पर 2047 तक 'विकसित भारत' का लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता। भारत को 'असेंबल इन इंडिया' को 'मेक इन इंडिया' के साथ एकीकृत करते हुए विनिर्माण क्षेत्रक में 25% जीडीपी योगदान का लक्ष्य प्राप्त करना होगा।