अर्थव्यवस्था • UPSCहरित अर्थव्यवस्था, जलवायु वित्त एवं सतत विकास
Green Economy, Climate Finance & Sustainable Development
हरित अर्थशास्त्र, सतत विकास, जलवायु वित्त, ग्रीन बॉन्ड, कार्बन बाजार, CBAM, सर्कुलर इकोनॉमी और न्यायसंगत हरित परिवर्तन का उन्नत अध्ययन।
हरित अर्थशास्त्रजलवायु वित्तकार्बन बाजारसतत विकास
1. हरित अर्थशास्त्र एवं सतत विकास की मूलभूत अवधारणाएँ (Foundations of Green Economics)
1.1 NCERT अंतर्संबंध एवं सैद्धांतिक पृष्ठभूमि
•NCERT लिंक (कक्षा 11वीं - भारतीय अर्थशास्त्र का विकास): पर्यावरण और सतत विकास अध्याय के अनुसार, पारंपरिक आर्थिक विकास मॉडल प्राकृतिक संसाधनों के अतिदोहन (Over-exploitation) और अपशिष्ट अवशोषण क्षमता (Absorbing Capacity) के उल्लंघन पर आधारित रहा है।
•पारंपरिक GDP बनाम हरित GDP (Green GDP):
•पारंपरिक GDP: केवल बाजार मूल्य पर उत्पादित अंतिम वस्तुओं व सेवाओं की गणना करता है। यह प्राकृतिक संसाधनों के ह्रास (Depreciation of Natural Capital) और पर्यावरण क्षति को लागत के रूप में नहीं घटाता।
\\text{Green GDP} = \\text{Traditional GDP} - \\text{Environmental Degradation Costs} - \\text{Depletion of Natural Capital}
•पर्यावरणीय कुज़नेट्स वक्र (Environmental Kuznets Curve - EKC):
•अवधारणा: प्रति व्यक्ति आय (Economic Growth) और पर्यावरणीय क्षरण (Environmental Degradation) के बीच एक 'उल्टा U-आकार' (Inverted U-shape) संबंध दर्शाता है।
•निष्कर्ष: विकास के शुरुआती चरणों में प्रदूषण बढ़ता है, किंतु एक निश्चित आय स्तर (Turning Point) के बाद हरित प्रौद्योगिकियों और सेवा क्षेत्रक के विस्तार से पर्यावरण गुणवत्ता में सुधार होता है।
पर्यावरणीय क्षरण
^
| /\\ (उल्टा U-आकार)
| / \\
| / \\
+------------------------> प्रति व्यक्ति आय
(विकास चरण) (हरित तकनीक चरण)
2. जलवायु वित्त एवं वित्तीय उपकरण (Climate Finance & Financial Instruments)
2.1 जलवायु वित्त की अवधारणा व अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताएँ
•परिभाषा: सार्वजनिक, निजी व वैकल्पिक स्रोतों से प्राप्त वह वित्त जो जलवायु परिवर्तन के शमन (Mitigation) और अनुकूलन (Adaptation) हेतु आवंटित किया जाता है।
•UNFCCC व पेरिस समझौता (100 Billion Target): विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों को प्रतिवर्ष 100 बिलियन प्रदान करने का वादा, जो व्यावहारिक रूप से अपर्याप्त और क्रियान्वयन में धीमा रहा है।
•Loss and Damage Fund (COP28): जलवायु आपदाओं से प्रभावित संवेदनशील देशों को क्षतिपूर्ति हेतु नया कोष।
2.2 सोवेरिन ग्रीन बॉन्ड्स (Sovereign Green Bonds - SGBs)
•भारत का फ्रेमवर्क (2022-23): भारत सरकार द्वारा जारी हरित बॉन्ड, जिससे प्राप्त राशि का उपयोग नवीकरणीय ऊर्जा, स्वच्छ परिवहन और हरित भवनों जैसी हरित परियोजनाओं में किया जाता है।
•ग्रीनवॉशिंग (Greenwashing):
•जोखिम: किसी संस्था/कंपनी द्वारा अपनी गतिविधियों को वास्तव में पर्यावरण-अनुकूल न होते हुए भी भ्रामक रूप से 'हरित' या 'सतत' प्रदर्शित करना।
•SEBI के दिशानिर्देश: SEBI ने ग्रीनवॉशिंग को रोकने हेतु ग्रीन डेट सिक्योरिटीज जारीकर्ताओं के लिए कड़े प्रकटीकरण नियम लागू किए हैं।
2.3 ESG और BRSR फ्रेमवर्क
•ESG (Environment, Social, Governance): निवेशकों द्वारा कंपनियों के दीर्घकालिक सतत प्रदर्शन का आकलन करने का वैश्विक मानदंड।
•BRSR (Business Responsibility and Sustainability Reporting): SEBI द्वारा भारत की शीर्ष 1000 सूचीबद्ध कंपनियों के लिए अनिवार्य हरित व सामाजिक रिपोर्टिंग मानदंड।
3. कार्बन बाजार एवं कर तंत्र (Carbon Market & Tax Mechanisms)
3.1 कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (CCTS - भारत)
•ऊर्जा संरक्षण अधिनियम (संशोधन) 2022: भारत में एक राष्ट्रीय कार्बन बाजार (National Carbon Market) की स्थापना का कानूनी आधार प्रदान करता है।
•Bureau of Energy Efficiency (BEE) प्रशासक की भूमिका में।
•गैर-अनुपालन वाली संस्थाओं (Obligated Entities) के लिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन तीव्रता लक्ष्य निर्धारित किए जाते हैं।
•लक्ष्य से बेहतर प्रदर्शन करने वाली कंपनियाँ कार्बन क्रेडिट प्रमाणपत्र (CCCs) बेच सकती हैं।
3.2 यूरोपीय संघ का CBAM और भारत पर प्रभाव
•CBAM (Carbon Border Adjustment Mechanism):
•अवधारणा: यूरोपीय संघ (EU) द्वारा आयातित इस्पात, एल्युमीनियम, सीमेंट, उर्वरक और बिजली पर लगाया जाने वाला 'कार्बन बॉर्डर टैक्स'।
•उद्देश्य: 'कार्बन लीकेज' (Carbon Leakage) को रोकना—अर्थात कंपनियों को ढीले पर्यावरणीय नियमों वाले देशों में उत्पादन स्थानांतरित करने से रोकना।
•भारत पर प्रभाव: भारतीय इस्पात व एल्युमीनियम निर्यातकों की लागत में 20-35% तक वृद्धि हो सकती है।
•भारत की रणनीति: अंतर्राष्ट्रीय मंचों (WTO) पर इसका विरोध तथा घरेलू उद्योगों का हरित डिकार्बोनाइजेशन।
4. सर्कुलर इकोनॉमी एवं संसाधनों की दक्षता (Circular Economy)
4.1 रेखीय बनाम चक्रीय अर्थशास्त्र (Linear vs Circular Economy)
| पैरामीटर | रेखीय अर्थशास्त्र (Linear Economy) | चक्रीय अर्थशास्त्र (Circular Economy) |
|---|
| मॉडल | लो -> बनाओ -> फेंको (Take -> Make -> Dispose) | पुनः चक्रण -> मरम्मत -> पुनः उपयोग (Reduce -> Reuse -> Recycle) |
| अपशिष्ट | उच्च कचरा उत्पादन | शून्य अपशिष्ट संकल्पना (Zero Waste) |
| संसाधन दक्षता | निम्न | अत्यधिक उच्च |
4.2 विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (Extended Producer Responsibility - EPR)
•नियम: निर्माताओं/ब्रांड मालिकों पर उनके उत्पादों के अंतिम जीवन (End-of-life) संग्रह और पुनर्चक्रण की कानूनी जिम्मेदारी।
•कवरेज: प्लास्टिक कचरा प्रबंधन, ई-कचरा, बैटरियाँ और अपशिष्ट टायर नियम।
4.3 LiFE आंदोलन (Lifestyle for Environment)
•COP26 में प्रधानमंत्री द्वारा घोषित: व्यक्तिगत और सामुदायिक स्तर पर विवेकहीन उपभोग के स्थान पर सचेत उपभोग को बढ़ावा देना।
•P3 दृष्टिकोण: 'Pro-Planet People' का वैश्विक नेटवर्क तैयार करना।
5. हरित परिवर्तन के आर्थिक पहलू (Economic Aspects of Green Transition)
5.1 राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन (National Green Hydrogen Mission)
•लक्ष्य: 2030 तक प्रतिवर्ष कम से कम 5 MMT (मिलियन मीट्रिक टन) ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता का विकास।
•₹8 लाख करोड़ से अधिक का कुल निवेश।
•₹1 लाख करोड़ से अधिक मूल्य के जीवाश्म ईंधन आयात में कमी।
•6 लाख से अधिक स्वच्छ नौकरियों का सृजन।
5.2 जस्ट ट्रांजिशन (Just Transition - न्यायसंगत परिवर्तन)
•अवधारणा: कोयला/जीवाश्म ईंधन आधारित अर्थव्यवस्था से स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ते समय प्रभावित श्रमिकों, समुदायों और क्षेत्रों की सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करना।
•भारत का परिदृश्य: झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में कोयला खदानों के बंद होने से प्रभावित कार्यबल का पुनर्कौशलन (Reskilling)।
6. UPSC परीक्षा विशेष अभ्यास मॉड्यूल (Exam Special Module)
6.1 प्रीलिम्स के लिए त्वरित पुनरीक्षण बिंदु (Quick Revision Points)
1.पर्यावरणीय कुज़नेट्स वक्र (EKC): यह आय वृद्धि और पर्यावरणीय क्षरण के बीच उल्टा U-आकार संबंध दर्शाता है।
2.सोवेरिन ग्रीन बॉन्ड: इनसे प्राप्त राशि का उपयोग परमाणु ऊर्जा या बड़े हाइड्रो प्रोजेक्ट्स (30MW+) में नहीं किया जा सकता (भारत के ग्रीन बॉन्ड फ्रेमवर्क के अनुसार)।
3.CBAM: यह EU का कार्बन बॉर्डर टैक्स है जो भारत के धातु निर्यात को प्रभावित करता है।
4.ग्रीनवॉशिंग: पर्यावरण-अनुकूलता का झूठा या भ्रामक दावा।
6.2 उत्तर-व्याख्या सहित अभ्यास प्रश्न (Prelims Practice Questions)
प्रश्न 1. 'पर्यावरणीय कुज़नेट्स वक्र' (Environmental Kuznets Curve) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1.यह प्रदर्शित करता है कि आर्थिक संवृद्धि के प्रत्येक स्तर पर पर्यावरणीय क्षरण में निरंतर वृद्धि होती है।
2.यह प्रति व्यक्ति आय और पर्यावरणीय क्षरण के बीच एक उल्टा U-आकार का संबंध दर्शाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (a) केवल 1 (b) केवल 2 (c) 1 और 2 दोनों (d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (b) व्याख्या: कथन 1 गलत है क्योंकि एक निश्चित आय स्तर (Turning Point) के बाद तकनीकी प्रगति और सेवा क्षेत्र के विस्तार से पर्यावरणीय क्षरण घटने लगता है। कथन 2 बिल्कुल सही है।
6.3 मेन्स उत्तर-लेखन ढाँचा (Mains Answer Blueprint)
प्रश्न: "भारत का वर्ष 2070 तक 'नेट-जीरो' उत्सर्जन हासिल करने का लक्ष्य केवल एक पर्यावरणीय आवश्यकता नहीं है, बल्कि एक आर्थिक अवसर भी है।" इस कथन का परीक्षण करते हुए बताइए कि जलवायु वित्त की कमी इस लक्ष्य के मार्ग में मुख्य बाधा कैसे है? (250 शब्द)
🎯 उत्तर का संरचनात्मक ढाँचा (Structure):
1.भूमिका (Introduction - 30 शब्द):
•COP26 में भारत के 'पंचामृत' संकल्पों एवं वर्ष 2070 तक 'नेट-जीरो' (Net-Zero Emissions) लक्ष्य का उल्लेख करते हुए शुरुआत करें।
2.मुख्य भाग (Body Paragraphs - 150 शब्द):
•आर्थिक अवसर के रूप में नेट-जीरो लक्ष्य (Economic Opportunities):
•नवीकरणीय ऊर्जा व ग्रीन हाइड्रोजन: निर्यात केंद्र के रूप में भारत का उभरना (राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन)।
•हरित रोजगार (Green Jobs): ई-वाहन, सौर ऊर्जा अवसंरचना व पुनर्चक्रण उद्योग में लाखों नई नौकरियों का सृजन।
•आयात बिल में कमी: कच्चे तेल व कोयले के आयात पर विदेशी मुद्रा बचत (~$100-150 बिलियन प्रतिवर्ष)।
•तकनीकी नवाचार व DPI: स्मार्ट ग्रिड व डिजिटल ऊर्जा प्रबंधन में भारत का नेतृत्व।
•जलवायु वित्त की बाधाएँ एवं चुनौतियाँ (Climate Finance Bottlenecks):
•विकसित देशों द्वारा $100 बिलियन वार्षिक प्रतिबद्धता का अधूरा रहना।
•भारत के परिवर्तन हेतु अनुमानित विशाल वित्त आवश्यकता (2070 तक ~$10 ट्रिलियन)।
•उच्च पूँजीगत लागत (Cost of Capital) एवं निजी निवेश हेतु जोखिम-गठबंधन (Risk De-risking) की कमी।
•ग्रीनवॉशिंग और अंतर्राष्ट्रीय मानकों की जटिलता।
3.आगे की राह / निष्कर्ष (Way Forward & Conclusion - 40 शब्द):
•घरेलू स्तर पर सोवेरिन ग्रीन बॉन्ड्स, कार्बन ट्रेडिंग (CCTS) और Blended Finance का विस्तार।
•अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर 'जस्ट ट्रांजिशन' एवं रियायती दर पर जलवायु वित्त हस्तांतरण हेतु वैश्विक कूटनीति की आवश्यकता पर बल देते हुए सकारात्मक समापन करें।