BNSS की धारा 163, निवारक हिरासत और विरोध का अधिकार
दिल्ली में हालिया विरोध प्रदर्शनों, निवारक कार्रवाई और जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल के रूप में हटाए जाने के बाद एक पुराना संवैधानिक सवाल फिर सामने है—शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार कहाँ तक जाता है और लोक व्यवस्था बनाए रखने की राज्य की शक्ति कहाँ से शुरू होती है?
पाठ्यक्रम से सीधा संबंध
- प्रारंभिक: अनुच्छेद 19, 21 और 22; भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023; जंतर-मंतर का इतिहास।
- मुख्य GS-II: मौलिक अधिकार बनाम लोक व्यवस्था, निषेधाज्ञा शक्तियाँ, कार्यपालिका की जवाबदेही और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय।
चर्चा में क्यों?
नई दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों के दौरान BNSS, 2023 की धारा 163 (पूर्ववर्ती CrPC धारा 144) और निवारक कार्रवाई के इस्तेमाल पर बहस तेज हुई है। इसी बीच दिल्ली पुलिस ने 12 अक्टूबर 2026 को जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थल के रूप में हटा दिया और रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान तथा CBD ग्राउंड को वैकल्पिक स्थल बताया। इस पूरे घटनाक्रम ने विरोध के अधिकार और लोक व्यवस्था के बीच संवैधानिक संतुलन को फिर चर्चा में ला दिया है।
प्रारंभिक परीक्षा के मुख्य तथ्य
BNSS की धारा 163
- कार्यकारी मजिस्ट्रेट को लोक शांति भंग होने, दंगे या मानव जीवन को आसन्न खतरे जैसी परिस्थितियों में त्वरित निषेधाज्ञा जारी करने की शक्ति देती है।
- ऐसा आदेश सामान्यतः अधिकतम दो महीने तक प्रभावी रह सकता है; राज्य सरकार इसे अधिकतम छह महीने तक बढ़ा सकती है।
- पाँच या अधिक व्यक्तियों का जमाव अपने-आप अवैध नहीं हो जाता; विधि-विरुद्ध जमाव का संदर्भ BNS की धारा 189 से जुड़ता है।
धारा 170 और 172
- धारा 170: संज्ञेय अपराध को रोकने के लिए पुलिस को बिना वारंट निवारक गिरफ्तारी की शक्ति देती है; ऐसी हिरासत 24 घंटे से आगे केवल अन्य वैधानिक आधार पर ही जारी रह सकती है।
- धारा 172: वैध पुलिस निर्देशों का पालन न करने वाले व्यक्ति को हटाने या रोकने की शक्ति से संबंधित है।
जंतर-मंतर
1724 में जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय द्वारा निर्मित यह खगोलीय वेधशाला सम्राट यंत्र, जय प्रकाश यंत्र और राम यंत्र जैसे उपकरणों के लिए प्रसिद्ध है। 1993 के बाद यह दिल्ली में विरोध-प्रदर्शनों के प्रमुख स्थलों में शामिल हो गया।
स्थैतिक एवं संवैधानिक पृष्ठभूमि
- अनुच्छेद 19(1)(a): वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता।
- अनुच्छेद 19(1)(b): बिना हथियार शांतिपूर्वक एकत्र होने का अधिकार।
- अनुच्छेद 19(2) और 19(3): संप्रभुता, अखंडता और लोक व्यवस्था सहित निर्धारित आधारों पर युक्तियुक्त प्रतिबंध संभव हैं।
- अनुच्छेद 21 और 22: जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा गिरफ्तारी/निरोध से जुड़े संवैधानिक संरक्षण।
राम मनोहर लोहिया वाद (1966) से जुड़ी प्रसिद्ध अवधारणा में ‘कानून और व्यवस्था’ सबसे व्यापक वृत्त है, उसके भीतर ‘लोक व्यवस्था’ और सबसे भीतर ‘राज्य की सुरक्षा’ को समझाया जाता है। हर कानून-व्यवस्था की समस्या लोक व्यवस्था का संकट नहीं होती।
मुख्य परीक्षा के लिए विश्लेषण
प्रमुख न्यायिक सिद्धांत
- मजदूर किसान शक्ति संगठन वाद (2018): विरोध पर पूर्ण और अनिश्चितकालीन प्रतिबंध के बजाय विनियमन और संतुलन पर जोर।
- अनुराधा भसीन वाद (2020): प्रतिबंध आनुपातिक होने चाहिए; बार-बार निषेधाज्ञा को सामान्य प्रशासनिक उपाय की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
- अमित साहनी वाद (2020): विरोध का अधिकार सार्वजनिक रास्तों को अनिश्चितकाल तक अवरुद्ध करने का निरपेक्ष अधिकार नहीं देता; अन्य नागरिकों के आवागमन के अधिकार को भी ध्यान में रखना होगा।
आगे की राह
निषेधाज्ञा को अपवाद के रूप में रखना, आदेशों के कारण स्पष्ट करना, समयबद्ध समीक्षा, शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए व्यवहारिक वैकल्पिक स्थल उपलब्ध कराना, भीड़ नियंत्रण में न्यूनतम आवश्यक बल और पुलिस कार्रवाई की जवाबदेही—ये संतुलित व्यवस्था के मुख्य तत्व हैं।
PYQ से संबंध
इस विषय को अनुच्छेद 19 के अधिकारों, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, सार्वजनिक व्यवस्था और न्यायिक आनुपातिकता की उन UPSC थीमों से जोड़कर पढ़ें जिन पर प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा में बार-बार प्रश्न बनते हैं।
अभ्यास प्रश्न
प्रारंभिक प्रश्न
BNSS, 2023 की धारा 163 के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- इस धारा के तहत आदेश जारी करने की प्राथमिक शक्ति केवल उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के पास होती है।
- कार्यकारी मजिस्ट्रेट द्वारा जारी निषेधाज्ञा आदेश सामान्यतः अधिकतम दो महीने तक प्रभावी रह सकता है।
- ऐसी निषेधाज्ञाओं को आनुपातिकता के सिद्धांत पर खरा उतरना चाहिए।
उत्तर: केवल 2 और 3। कथन 1 गलत है, क्योंकि शक्ति कार्यकारी मजिस्ट्रेट के पास है।
मुख्य परीक्षा प्रश्न
“निवारक निरोध और आपातकालीन निषेधाज्ञा शक्तियाँ व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामूहिक सुरक्षा के बीच निरंतर संवैधानिक तनाव का प्रतिनिधित्व करती हैं।” भारत में असहमति के अधिकार और लोक व्यवस्था के बीच संतुलन के लिए आवश्यक संस्थागत उपायों की विवेचना कीजिए। (250 शब्द, 15 अंक)
त्वरित पुनरावृत्ति
- धारा 163 → पूर्ववर्ती CrPC धारा 144 से संबंधित निषेधाज्ञा शक्ति
- सामान्य अवधि → 2 महीने; राज्य सरकार द्वारा अधिकतम 6 महीने तक विस्तार
- अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b) → अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण सभा
- प्रतिबंध → लोक व्यवस्था सहित संवैधानिक आधारों पर युक्तियुक्त और आनुपातिक
- जंतर-मंतर → 12 अक्टूबर 2026 से निर्धारित प्रदर्शन स्थल नहीं