समुद्री सुरक्षा, नौसैनिक रसद एवं स्वदेशी जहाज निर्माण • संघ लोक सेवा आयोग 2027

भारतीय नौसेना का पहला बेड़ा सहायता पोत FSS-1: समुद्री रसद और ब्लू-वॉटर क्षमता

रक्षा मंत्रालय ने 6 अक्टूबर 2026 को FSS-1 के जलावतरण का कार्यक्रम घोषित किया; 43,500 टन का यह पोत समुद्र में युद्धपोतों की पुनःपूर्ति और परिचालन पहुँच बढ़ाने के लिए बनाया जा रहा है।

समाचार स्रोत तिथि: 5 अक्टूबर 2026 • अध्ययन तिथि: 6 अक्टूबर 2026
प्रकाशित: 6 अक्टूबर 2026अंतिम अद्यतन: 6 अक्टूबर 2026परीक्षा: प्रारंभिक + मुख्यसामान्य अध्ययन–III

पाठ्यक्रम से सीधा संबंध

  • प्रारंभिक परीक्षा: भारतीय नौसेना, स्वदेशी जहाज निर्माण और समुद्री रसद।
  • मुख्य सामान्य अध्ययन–III: रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता, समुद्री सुरक्षा और हिंद महासागर क्षेत्र।

चर्चा में क्यों?

रक्षा मंत्रालय ने 6 अक्टूबर 2026 को विशाखापत्तनम स्थित हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड में भारतीय नौसेना के पहले बेड़ा सहायता पोत (Fleet Support Ship—FSS-1) के जलावतरण का कार्यक्रम घोषित किया है। इसी कार्यक्रम में पाँचवें पोत की कील रखने तथा उन्नत स्लिपवे-4 और 300 टन गोलियथ क्रेन के उद्घाटन की योजना है।

समय-संदर्भ: यह पृष्ठ 6 अक्टूबर की सुबह प्रकाशित है; 5 अक्टूबर की आधिकारिक सूचना में जलावतरण को आज होने वाला कार्यक्रम बताया गया था, इसलिए इसे यहाँ पहले से पूर्ण घटना के रूप में नहीं लिखा गया है।

FSS-1 के प्रमुख तथ्य

  • भारतीय नौसेना के लिए बन रहे 5 बेड़ा सहायता पोतों में पहला।
  • आधिकारिक सूचना के अनुसार विस्थापन लगभग 43,500 टन।
  • समुद्र में युद्धपोतों को ईंधन, रसद और आवश्यक आपूर्ति देकर उनकी परिचालन अवधि बढ़ाना मुख्य भूमिका।
  • स्टील कटिंग के लगभग 18 महीने बाद जलावतरण चरण तक पहुँचा।

समुद्र में पुनःपूर्ति क्यों महत्वपूर्ण है?

चलते हुए युद्धपोतों को ईंधन, पानी और भंडार देना समुद्र में पुनःपूर्ति (Underway Replenishment—UNREP) कहलाता है। इससे जहाजों को बार-बार बंदरगाह लौटने की जरूरत घटती है और नौसेना दूरस्थ समुद्री क्षेत्रों में लंबे समय तक उपस्थित रह सकती है।

ब्लू-वॉटर क्षमता से संबंध

तटों से दूर खुले समुद्र में लंबे समय तक स्वतंत्र अभियान चलाने की क्षमता को सामान्यतः ब्लू-वॉटर क्षमता कहा जाता है। विमानवाहक पोत और लड़ाकू जहाज तभी लंबी तैनाती बनाए रख सकते हैं जब रसद पोत उन्हें लगातार समर्थन दें।

हिंद महासागर में सामरिक महत्त्व

  • मलक्का जलडमरूमध्य से अदन की खाड़ी तक लंबी तैनाती का समर्थन।
  • विदेशी बंदरगाहों पर निर्भरता घटाकर सामरिक स्वायत्तता में वृद्धि।
  • मानवीय सहायता और आपदा राहत अभियानों में बड़े रसद मंच की उपयोगिता।
  • स्वदेशी भारी जहाज निर्माण और समुद्री औद्योगिक आधार को मजबूती।

अवसंरचना का समानांतर विस्तार

उन्नत स्लिपवे-4 और 300 टन गोलियथ क्रेन से हिंदुस्तान शिपयार्ड की क्षमता 45,000 डेडवेट टन तक के बड़े एवं जटिल पोतों के निर्माण और जलावतरण के लिए बढ़ेगी।

चुनौतियाँ

  • बड़े गैर-लड़ाकू रसद पोत मिसाइल, पनडुब्बी और ड्रोन हमलों के प्रति संवेदनशील हो सकते हैं।
  • एस्कॉर्ट, वायु रक्षा और पनडुब्बी-रोधी सुरक्षा आवश्यक।
  • समयबद्ध डिलीवरी, रखरखाव और स्वदेशी उप-प्रणालियों की विश्वसनीयता महत्वपूर्ण।

प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास

प्रश्न: बेड़ा सहायता पोत का प्राथमिक कार्य क्या है?

उत्तर: समुद्र में तैनात युद्धपोतों को ईंधन, रसद और आवश्यक सामग्री की पुनःपूर्ति कर उनकी पहुँच और परिचालन अवधि बढ़ाना।

मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न

“समुद्री शक्ति केवल लड़ाकू जहाजों की संख्या से नहीं, बल्कि दूरस्थ अभियानों को बनाए रखने वाली रसद क्षमता से भी निर्धारित होती है।” भारत के बेड़ा सहायता पोत कार्यक्रम के संदर्भ में टिप्पणी कीजिए।

त्वरित पुनरावृत्ति

  • FSS-1 → पाँच पोतों में पहला
  • विस्थापन → लगभग 43,500 टन
  • भूमिका → समुद्र में पुनःपूर्ति
  • स्थान → हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड, विशाखापत्तनम

स्रोत