पर्यावरण • UPSC 2027

पश्चिमी घाट पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र और कस्तूरीरंगन रिपोर्ट

कर्नाटक विधानसभा ने 22 सितंबर 2026 को कस्तूरीरंगन रिपोर्ट पर आपत्ति दर्ज करते हुए व्यापक भौतिक सर्वेक्षण और संशोधन की मांग वाला प्रस्ताव पारित किया। इसी समय पश्चिमी घाट के पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र संबंधी केंद्र की 27 जुलाई 2026 की मसौदा अधिसूचना पर प्रक्रिया जारी है।

स्रोत तिथि: 22 सितंबर 2026
प्रकाशित: 23 सितंबर 2026अंतिम अद्यतन: 23 सितंबर 2026पर्यावरणपरीक्षा: प्रारंभिक + मुख्यGS-IIIस्रोत-सत्यापित

पाठ्यक्रम से जुड़ाव

  • प्रारंभिक परीक्षा: पश्चिमी घाट, जैव विविधता हॉटस्पॉट, पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र, गाडगिल और कस्तूरीरंगन समितियाँ।
  • मुख्य परीक्षा GS-III: पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता, विकास–पर्यावरण संतुलन और पर्यावरणीय शासन।
  • संघीय आयाम: केंद्र–राज्य समन्वय, स्थानीय आजीविका और भू-उपयोग नियमन।

चर्चा में क्यों?

22 सितंबर 2026 को कर्नाटक विधानसभा ने पश्चिमी घाट पर कस्तूरीरंगन उच्च स्तरीय कार्य समूह की सिफारिशों को मौजूदा रूप में स्वीकार न करने का प्रस्ताव पारित किया। राज्य ने प्रभावित क्षेत्रों के भौतिक सर्वेक्षण और स्थानीय सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए पुनर्विचार की आवश्यकता बताई। दूसरी ओर पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की 27 जुलाई 2026 की मसौदा अधिसूचना पश्चिमी घाट के लगभग 56,825 वर्ग किमी क्षेत्र को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र के रूप में अधिसूचित करने की प्रक्रिया से जुड़ी है।

मुख्य बिंदु

  • पश्चिमी घाट गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में फैले हैं।
  • कस्तूरीरंगन उच्च स्तरीय कार्य समूह ने उपग्रह-आधारित भू-दृश्य विश्लेषण के आधार पर प्राकृतिक परिदृश्य के बड़े हिस्से को संरक्षण के लिए प्राथमिकता दी थी।
  • मसौदा ESA व्यवस्था का उद्देश्य अत्यधिक पर्यावरणीय प्रभाव वाली गतिविधियों को नियंत्रित या प्रतिबंधित करना है; इसका अर्थ सभी मानव गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं है।
  • राज्यों ने ग्राम-सीमा, बागान, कृषि भूमि, बस्तियों और आजीविका से जुड़ी व्यावहारिक समस्याएँ उठाई हैं।
  • केंद्र की प्रक्रिया में राज्यों द्वारा भौतिक सत्यापन और सीमा-संशोधन के प्रस्तावों पर विचार किया जाता रहा है।

पृष्ठभूमि और विस्तार

पश्चिमी घाट विश्व के प्रमुख जैव विविधता हॉटस्पॉटों में शामिल हैं और अनेक स्थानिक प्रजातियों, नदियों के उद्गम क्षेत्रों, वनों तथा जलागमों का आधार हैं। इनके पारिस्थितिक महत्व के कारण विकास गतिविधियों और संरक्षण के बीच संतुलन की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की गई।

माधव गाडगिल समिति: पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल ने 2011 में अधिक विकेंद्रीकृत और व्यापक पारिस्थितिक संवेदनशीलता दृष्टिकोण की सिफारिश की। इसमें स्थानीय निकायों और ग्राम स्तर की भूमिका पर अधिक बल था।

कस्तूरीरंगन उच्च स्तरीय कार्य समूह: बाद में गठित समूह ने प्राकृतिक परिदृश्य और सांस्कृतिक परिदृश्य के बीच अंतर करते हुए अपेक्षाकृत सीमित क्षेत्र को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील घोषित करने का सुझाव दिया। इसका दृष्टिकोण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन साधने का प्रयास था।

ESA और ESZ में अंतर: पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र व्यापक भू-दृश्य स्तर पर अधिसूचित हो सकता है, जबकि पारिस्थितिक संवेदनशील क्षेत्र/जोन सामान्यतः संरक्षित क्षेत्रों के आसपास नियामक बफर के रूप में प्रयुक्त होते हैं। दोनों को समान नहीं मानना चाहिए।

महत्व, प्रभाव और चुनौतियाँ

संरक्षण का पक्ष: पश्चिमी घाट जल सुरक्षा, कार्बन भंडारण, मृदा संरक्षण, जलवायु विनियमन और जैव विविधता के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। खनन, बड़े निर्माण और अत्यधिक भूमि-परिवर्तन से पारिस्थितिक तंत्र खंडित हो सकता है।

आजीविका का पक्ष: कई प्रस्तावित क्षेत्रों में पीढ़ियों से बसे किसान, बागान समुदाय और ग्राम आबादी रहते हैं। भूमि उपयोग पर अस्पष्ट या व्यापक प्रतिबंध आजीविका, आवास और स्थानीय अवसंरचना को प्रभावित कर सकते हैं।

डेटा की चुनौती: उपग्रह-आधारित वर्गीकरण ग्राम सीमा और वास्तविक भूमि उपयोग की जटिलता हमेशा पूरी तरह नहीं पकड़ता; इसलिए भौतिक सत्यापन महत्त्वपूर्ण है।

संघीय चुनौती: पर्यावरणीय संरक्षण राष्ट्रीय हित है, पर भूमि, स्थानीय प्रशासन और विकास परियोजनाओं में राज्यों की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। सहमति-आधारित सीमांकन अधिक टिकाऊ हो सकता है।

आपदा जोखिम: ढालों पर वनों की कटाई, खनन और अनियंत्रित निर्माण भूस्खलन तथा मिट्टी क्षरण का जोखिम बढ़ा सकते हैं; अतः ESA को आपदा जोखिम न्यूनीकरण से भी जोड़ना चाहिए।

मुख्य परीक्षा

पश्चिमी घाट विवाद पर्यावरण बनाम विकास का सरल द्वंद्व नहीं है। वास्तविक नीति-प्रश्न यह है कि उच्च पारिस्थितिक मूल्य वाले क्षेत्रों की वैज्ञानिक पहचान कैसे हो, स्थानीय समुदायों के वैध अधिकार और आजीविका कैसे सुरक्षित रहें, तथा अत्यधिक विनाशकारी गतिविधियों और सामान्य कृषि/आवास गतिविधियों के बीच स्पष्ट नियामक अंतर कैसे बनाया जाए। वैज्ञानिक मानचित्रण, ग्राम-स्तरीय सत्यापन, पारदर्शी सार्वजनिक परामर्श और जोखिम-आधारित गतिविधि नियमन इस संतुलन के प्रमुख उपकरण हैं।

आगे की राह

  • उपग्रह मानचित्रण के साथ ग्राम-स्तरीय भौतिक सत्यापन और अद्यतन भू-अभिलेख।
  • उच्च प्रभाव वाली गतिविधियों के लिए स्पष्ट निषेध; कम प्रभाव वाली आजीविका के लिए स्पष्ट अनुमति।
  • स्थानीय समुदायों और पंचायतों की औपचारिक भागीदारी।
  • जलागम, वन्यजीव गलियारे और भूस्खलन-संवेदनशील ढालों को प्राथमिक संरक्षण।
  • प्रभावित समुदायों के लिए हरित आजीविका, पारिस्थितिकी सेवा भुगतान और टिकाऊ पर्यटन के विकल्प।

संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य

  • पश्चिमी घाट लगभग 1,500 किमी लंबी पर्वतमाला है।
  • यह छह राज्यों से गुजरती है—गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु।
  • पश्चिमी घाट के कई घटक UNESCO विश्व धरोहर सूची में शामिल हैं।
  • WGEEP — पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल; अध्यक्ष: माधव गाडगिल।
  • HLWG — उच्च स्तरीय कार्य समूह; अध्यक्ष: के. कस्तूरीरंगन।
  • ESA का आधार पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के अंतर्गत अधिसूचना प्रक्रिया से जुड़ता है।

विगत वर्षों के प्रश्न और अपेक्षित प्रश्न

सत्यापित PYQ

प्रारंभिक परीक्षा 2016 — भावार्थ: गाडगिल समिति रिपोर्ट और कस्तूरीरंगन समिति रिपोर्ट किस विषय से संबंधित हैं? सही उत्तर—पश्चिमी घाट का संरक्षण।

मुख्य परीक्षा GS-I, 2021 — भावार्थ: हिमालयी क्षेत्र और पश्चिमी घाट में भूस्खलनों के कारणों में अंतर स्पष्ट कीजिए।

अपेक्षित प्रारंभिक प्रश्न

प्रश्न 1. निम्न युग्मों पर विचार कीजिए: (1) WGEEP—माधव गाडगिल (2) HLWG—के. कस्तूरीरंगन। सही कूट चुनिए।

उत्तर देखें

उत्तर: दोनों युग्म सही हैं।

प्रश्न 2. पश्चिमी घाट किन राज्यों में फैले हैं? गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में से सही समूह चुनिए।

उत्तर देखें

उत्तर: सभी छह राज्य।

अपेक्षित मुख्य प्रश्न

पश्चिमी घाट में पारिस्थितिक संरक्षण और स्थानीय आजीविका को परस्पर विरोधी मानना समस्या का अत्यधिक सरलीकरण है। वैज्ञानिक सीमांकन, ग्राम-स्तरीय सत्यापन और सहभागी शासन के संदर्भ में चर्चा कीजिए।

PYQ सत्यापन: UPSC प्रारंभिक परीक्षा 2016 तथा मुख्य परीक्षा 2021, GS-I।

स्रोतप्राथमिक तथा विश्वसनीय स्रोत

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