नीहारिका परिकल्पना

सौरमंडल की उत्पत्ति को समझाने के प्रारंभिक वैज्ञानिक प्रयासों में नीहारिका परिकल्पना का विशेष स्थान है। इस परिकल्पना के अनुसार सूर्य, ग्रह तथा सौरमंडल के अन्य पिंड किसी समय एक ही विशाल गैसीय और धूलयुक्त बादल का हिस्सा थे। इसी प्रारंभिक बादल को नीहारिका कहा गया।

नीहारिका परिकल्पना का प्रारंभिक रूप जर्मन दार्शनिक इमैनुएल कांट ने 1755 में प्रस्तुत किया। बाद में फ्रांसीसी गणितज्ञ और खगोलशास्त्री पियरे साइमन लाप्लास ने 1796 में इसे अधिक व्यवस्थित रूप दिया। इसलिए इसे सामान्यतः कांट-लाप्लास नीहारिका परिकल्पना भी कहा जाता है।

नीहारिका की प्रारंभिक अवस्था

इस परिकल्पना के अनुसार प्रारंभ में अंतरिक्ष में गैस और सूक्ष्म पदार्थों का एक विशाल बादल मौजूद था। यह बादल धीरे-धीरे घूम रहा था।

गुरुत्वाकर्षण के कारण बादल के पदार्थ एक-दूसरे की ओर आकर्षित होने लगे और नीहारिका सिकुड़ने लगी। जैसे-जैसे इसका आकार कम हुआ, इसकी घूर्णन गति बढ़ती गई।

इसे उसी प्रकार समझा जा सकता है जैसे कोई घूमता हुआ व्यक्ति अपने हाथों को शरीर के निकट लाता है तो उसकी घूमने की गति बढ़ जाती है।

संकुचन के कारण नीहारिका का अधिकांश पदार्थ केंद्र में एकत्र होने लगा और केंद्र का तापमान तथा दबाव लगातार बढ़ने लगा।

केंद्र में एकत्र विशाल पदार्थ से आगे चलकर सूर्य का निर्माण हुआ।

ग्रहों का निर्माण

लाप्लास के अनुसार तेजी से घूमती नीहारिका से उसके बाहरी भाग में पदार्थ के छल्ले अलग होते गए। इन छल्लों का पदार्थ संघनित होकर ग्रहों में बदल गया।

इस प्रकार—

केंद्रीय भाग से सूर्य

और

बाहरी पदार्थ से ग्रह

बने।

ग्रहों के आसपास बचे छोटे पदार्थों से आगे चलकर उनके उपग्रहों के निर्माण की व्याख्या की गई।

नीहारिका परिकल्पना का मूल विचार यह था कि सूर्य और ग्रह स्वतंत्र रूप से नहीं बने, बल्कि वे एक ही प्रारंभिक पदार्थ से उत्पन्न हुए।

कांट और लाप्लास के विचारों में अंतर

कांट ने प्रारंभिक पदार्थ को अपेक्षाकृत ठंडे और बिखरे हुए कणों के रूप में देखा, जो गुरुत्वाकर्षण के कारण धीरे-धीरे एकत्रित हुए।

लाप्लास ने प्रारंभिक नीहारिका को अत्यधिक गर्म और घूमते हुए गैसीय पिंड के रूप में समझाया।

परीक्षा में सामान्यतः दोनों के विस्तृत अंतर से अधिक यह याद रखना पर्याप्त है कि—

कांट — 1755

लाप्लास — 1796

और दोनों का संबंध सौरमंडल की नीहारिका परिकल्पना से है।

परिकल्पना की प्रमुख विशेषताएँ

नीहारिका परिकल्पना ने पहली बार सौरमंडल को किसी अलौकिक अथवा अचानक हुई घटना के बजाय प्राकृतिक भौतिक प्रक्रियाओं के माध्यम से समझाने का प्रयास किया।

इसने यह महत्वपूर्ण विचार दिया कि—

सूर्य और ग्रहों का स्रोत समान था।

सौरमंडल के निर्माण में गुरुत्वाकर्षण महत्वपूर्ण था।

घूर्णन ने ग्रहों की व्यवस्था को प्रभावित किया।

ग्रहों की कक्षाओं का लगभग एक ही तल में होना किसी साझा प्रारंभिक संरचना से जुड़ा हो सकता है।

सौरमंडल के अधिकांश ग्रह सूर्य की परिक्रमा एक ही सामान्य दिशा में करते हैं, जिसे एक साझा घूमती हुई नीहारिका के विचार से समझने का प्रयास किया गया।

नीहारिका परिकल्पना की सीमाएँ

मूल कांट-लाप्लास परिकल्पना आधुनिक वैज्ञानिक ज्ञान के अनुसार पूर्णतः सही नहीं मानी जाती।

इसकी सबसे महत्वपूर्ण समस्या कोणीय संवेग से संबंधित थी। यदि सूर्य और ग्रह एक ही घूमती हुई नीहारिका से बने, तो वर्तमान सौरमंडल में कोणीय संवेग का वितरण मूल परिकल्पना द्वारा सरलता से समझाया नहीं जा सका।

लाप्लास द्वारा बताए गए गैसीय छल्लों के अलग होकर सीधे ग्रह बन जाने की प्रक्रिया भी आधुनिक भौतिकी के अनुसार पर्याप्त व्याख्या नहीं देती।

यह परिकल्पना ग्रहों की रासायनिक संरचना में पाए जाने वाले महत्वपूर्ण अंतर को भी पूरी तरह नहीं समझा सकी।

आंतरिक ग्रह चट्टानी और अधिक घनत्व वाले हैं, जबकि बाहरी ग्रह बहुत बड़े तथा गैस और बर्फीले पदार्थों से समृद्ध हैं। आधुनिक सिद्धांत इसे प्रारंभिक सौर चकती में तापमान के अंतर से अधिक प्रभावी रूप से समझाता है।

इसलिए मूल नीहारिका परिकल्पना को आज पूर्ण ग्रह-निर्माण सिद्धांत नहीं माना जाता।

आधुनिक विज्ञान में इसका महत्व

मूल कांट-लाप्लास मॉडल की अनेक बातें संशोधित हो चुकी हैं, फिर भी इसका केंद्रीय विचार आधुनिक विज्ञान में अत्यंत महत्वपूर्ण बना हुआ है—

सूर्य और ग्रह एक विशाल गैस एवं धूल के बादल से बने।

आधुनिक सौर नीहारिका सिद्धांत के अनुसार लगभग 4.6 अरब वर्ष पहले गैस और धूल का एक अंतरतारकीय बादल गुरुत्वाकर्षण के कारण सिकुड़ा।

केंद्र में अधिकांश पदार्थ एकत्र होकर सूर्य बना और उसके चारों ओर बचा पदार्थ एक चक्राकार प्रोटोप्लानेटरी चकती में व्यवस्थित हो गया।

इसी चकती के पदार्थ से छोटे कण बने। छोटे कण आपस में जुड़कर बड़े पिंडों में परिवर्तित हुए और आगे—

ग्रहाणु → प्रोटोग्रह → ग्रह

का निर्माण हुआ।

इस प्रक्रिया को अभिवृद्धि कहा जाता है।

इसलिए आधुनिक सिद्धांत को पुरानी नीहारिका परिकल्पना का बिल्कुल समान रूप नहीं, बल्कि उसके मूल विचार का विकसित और वैज्ञानिक रूप माना जा सकता है।

सौरमंडल चकती के रूप में क्यों है?

सौरमंडल के अधिकांश ग्रह सूर्य के चारों ओर लगभग एक ही तल में परिक्रमा करते हैं।

इसका कारण प्रारंभिक घूमती हुई नीहारिका का धीरे-धीरे चपटी चकती में बदलना माना जाता है।

घूमता हुआ पदार्थ केंद्र की ओर संकुचित हुआ तो टक्करों के कारण पदार्थ की अनियमित गतियाँ कम होती गईं और अधिकांश पदार्थ एक सामान्य घूर्णन तल में व्यवस्थित हो गया।

यही कारण है कि आज भी अधिकांश ग्रहों की कक्षाएँ लगभग एक ही तल के आसपास स्थित हैं।

अधिकांश ग्रह एक ही दिशा में क्यों घूमते हैं?

सौर नीहारिका एक निश्चित दिशा में घूम रही थी। उससे बने पदार्थ ने उसी सामान्य कोणीय गति को बनाए रखा।

इसलिए अधिकांश ग्रह सूर्य की परिक्रमा एक ही सामान्य दिशा में करते हैं।

हालाँकि सौरमंडल में कुछ अपवाद भी हैं। ग्रहों के अक्षीय घूर्णन तथा उपग्रहों की कुछ गतियों में बाद की टक्करों और अन्य घटनाओं के कारण भिन्नताएँ विकसित हुईं।

इसलिए यह नहीं मानना चाहिए कि सौरमंडल की प्रत्येक गति बिल्कुल एक जैसी है।

आंतरिक और बाहरी ग्रहों से संबंध

आधुनिक नीहारिका मॉडल में सूर्य के निकट का भाग अत्यधिक गर्म था।

इस क्षेत्र में केवल उच्च गलनांक वाले धात्विक और चट्टानी पदार्थ ठोस रह सके। इसलिए यहाँ बने बुध, शुक्र, पृथ्वी और मंगल मुख्यतः चट्टानी ग्रह हैं।

सूर्य से दूर तापमान कम था। यहाँ जल, मीथेन और अमोनिया जैसे पदार्थ भी ठोस अथवा बर्फीले रूप में उपलब्ध हो सके।

इससे बड़ी मात्रा में पदार्थ एकत्रित हुआ और विशाल बाहरी ग्रहों के निर्माण के लिए बड़े ग्रह-कोर विकसित हो सके।

इस प्रकार प्रारंभिक सौर नीहारिका में तापमान का अंतर ग्रहों की संरचना में अंतर समझने की कुंजी है।

परीक्षा की दृष्टि से आवश्यक तथ्य

नीहारिका परिकल्पना का संबंध सौरमंडल की उत्पत्ति से है।

इमैनुएल कांट ने 1755 में नीहारिका संबंधी विचार प्रस्तुत किया।

लाप्लास ने 1796 में इसका विकसित रूप प्रस्तुत किया।

मूल परिकल्पना में सूर्य और ग्रहों की उत्पत्ति एक ही घूमती हुई गैसीय नीहारिका से मानी गई।

गुरुत्वीय संकुचन के कारण नीहारिका का आकार घटा और घूर्णन गति बढ़ी।

केंद्र में पदार्थ के एकत्र होने से सूर्य का निर्माण माना गया।

मूल लाप्लास मॉडल में बाहरी पदार्थ के छल्लों से ग्रह बनने का विचार दिया गया था।

मूल नीहारिका परिकल्पना की एक प्रमुख समस्या कोणीय संवेग के वितरण की व्याख्या थी।

आधुनिक सौर नीहारिका सिद्धांत में ग्रह सीधे गैसीय छल्लों से नहीं बनते, बल्कि अभिवृद्धि की प्रक्रिया से छोटे कणों, ग्रहाणुओं और प्रोटोग्रहों के माध्यम से बनते हैं।

आधुनिक मॉडल के अनुसार सौरमंडल का निर्माण लगभग 4.6 अरब वर्ष पहले हुआ।

आंतरिक और बाहरी ग्रहों की संरचना में अंतर प्रारंभिक सौर चकती के तापमान में अंतर से संबंधित है।

निष्कर्ष

नीहारिका परिकल्पना सौरमंडल की उत्पत्ति को प्राकृतिक प्रक्रियाओं द्वारा समझाने वाला प्रारंभिक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक प्रयास था। कांट और लाप्लास के मूल मॉडल में कई सीमाएँ थीं, इसलिए उसे आधुनिक विज्ञान ने संशोधित कर दिया। फिर भी इसका मूल विचार—कि सूर्य और ग्रह एक ही विशाल गैस और धूल के बादल से विकसित हुए—आधुनिक सौर नीहारिका सिद्धांत का आधार बना हुआ है। आधुनिक व्याख्या ग्रहों के निर्माण को अभिवृद्धि, ग्रहाणुओं और प्रोटोग्रहों की क्रमिक प्रक्रिया के माध्यम से समझाती है।