पृथ्वी का आकार एवं मापन
पृथ्वी को सामान्यतः गोलाकार कहा जाता है, परंतु वैज्ञानिक दृष्टि से यह पूर्ण गोला नहीं है। पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है और इसी घूर्णन के कारण उसका विषुवतीय भाग थोड़ा बाहर की ओर उभरा हुआ तथा ध्रुवीय भाग कुछ चपटा है। इसलिए पृथ्वी का आकार सामान्य गोले की अपेक्षा चपटा गोलाभ माना जाता है।
पृथ्वी के वास्तविक आकार को समझने के लिए जियोइड की अवधारणा महत्वपूर्ण है। पृथ्वी की वास्तविक सतह पूरी तरह समतल अथवा नियमित नहीं है। कहीं ऊँचे पर्वत हैं, कहीं मैदान, घाटियाँ और गहरे महासागरीय गर्त। इसके साथ ही पृथ्वी के भीतर पदार्थों का घनत्व और वितरण भी सभी स्थानों पर समान नहीं है। इससे पृथ्वी के गुरुत्वीय क्षेत्र में सूक्ष्म अंतर उत्पन्न होते हैं।
पृथ्वी के गुरुत्व क्षेत्र की वह काल्पनिक समविभव सतह, जो औसत समुद्र तल के लगभग अनुरूप होती है, जियोइड कहलाती है। सरल भाषा में कहा जाए तो जियोइड पृथ्वी के वास्तविक गुरुत्वीय आकार का सबसे निकटतम प्रतिनिधित्व है।
यदि समुद्र से ज्वार-भाटा, समुद्री धाराएँ, लहरें और पवनों का प्रभाव हटा दिया जाए तथा समुद्री जल को पूर्णतः शांत माना जाए, तो प्राप्त औसत समुद्र तल को महाद्वीपों के नीचे भी काल्पनिक रूप से विस्तारित करने पर जो सतह प्राप्त होगी, वह जियोइड के लगभग अनुरूप होगी।
इस प्रकार पृथ्वी के आकार को तीन स्तरों पर समझा जा सकता है। सामान्य अध्ययन में पृथ्वी को लगभग गोलाकार माना जाता है, गणितीय रूप से इसे चपटा गोलाभ माना जाता है, जबकि गुरुत्वीय दृष्टि से इसका अधिक वास्तविक रूप जियोइड है।
पृथ्वी का विषुवतीय उभार और ध्रुवीय चपटीकरण
पृथ्वी पश्चिम से पूर्व दिशा में अपने अक्ष पर घूमती है। घूर्णन के कारण विषुवतीय क्षेत्र में बाहर की ओर प्रभाव अधिक होता है। परिणामस्वरूप विषुवत रेखा के आसपास पृथ्वी कुछ उभर जाती है। इसके विपरीत ध्रुवों के निकट यह प्रभाव अत्यंत कम होता है, इसलिए पृथ्वी का ध्रुवीय भाग अपेक्षाकृत चपटा है।
यही कारण है कि पृथ्वी की विषुवतीय त्रिज्या ध्रुवीय त्रिज्या से अधिक है।
विषुवतीय त्रिज्या लगभग 6378 किमी है, जबकि ध्रुवीय त्रिज्या लगभग 6357 किमी है। दोनों के बीच लगभग 21 किमी का अंतर है। पृथ्वी की औसत त्रिज्या लगभग 6371 किमी मानी जाती है।
इस अंतर से स्पष्ट होता है कि पृथ्वी पूर्ण गोला नहीं है।
पृथ्वी का व्यास
व्यास पृथ्वी के एक किनारे से केंद्र होकर दूसरे किनारे तक की दूरी है।
पृथ्वी का विषुवतीय व्यास लगभग 12,756 किमी है, जबकि ध्रुवीय व्यास लगभग 12,714 किमी है।
इस प्रकार विषुवतीय व्यास ध्रुवीय व्यास से लगभग 43 किमी अधिक है।
परीक्षा की दृष्टि से यह संबंध विशेष रूप से याद रखना चाहिए—
इन दोनों का मूल कारण पृथ्वी का घूर्णन है।
पृथ्वी की परिधि
पृथ्वी के चारों ओर की कुल दूरी को उसकी परिधि कहा जाता है। पृथ्वी पूर्ण गोला न होने के कारण विषुवतीय परिधि और ध्रुवों से होकर गुजरने वाली परिधि में थोड़ा अंतर पाया जाता है।
पृथ्वी की विषुवतीय परिधि लगभग 40,075 किमी है, जबकि ध्रुवों से होकर गुजरने वाली मेरिडियन परिधि लगभग 40,008 किमी है।
सामान्य परीक्षा-उपयोग के लिए पृथ्वी की परिधि लगभग 40,000 किमी याद रखी जा सकती है।
विषुवतीय परिधि का अधिक होना भी पृथ्वी के विषुवतीय उभार का परिणाम है।
पृथ्वी के आकार और गुरुत्व का संबंध
पृथ्वी का आकार गुरुत्व के वितरण को भी प्रभावित करता है। विषुवत रेखा पर पृथ्वी की सतह केंद्र से अपेक्षाकृत अधिक दूर है। इसके अतिरिक्त पृथ्वी के घूर्णन से उत्पन्न अपकेंद्रीय प्रभाव भी विषुवत रेखा पर अधिक होता है। इन दोनों कारणों से वहाँ प्रभावी गुरुत्व अपेक्षाकृत कम होता है।
इसके विपरीत ध्रुव पृथ्वी के केंद्र से अपेक्षाकृत निकट हैं और वहाँ घूर्णन से उत्पन्न अपकेंद्रीय प्रभाव लगभग न्यूनतम होता है। इसलिए ध्रुवों पर गुरुत्व विषुवत रेखा की तुलना में अधिक होता है।
औसतन गुरुत्वीय त्वरण विषुवत रेखा के पास लगभग 9.78 मीटर प्रति सेकंड² तथा ध्रुवों के पास लगभग 9.83 मीटर प्रति सेकंड² होता है।
इस कारण किसी वस्तु का द्रव्यमान स्थान बदलने पर नहीं बदलता, लेकिन उसका भार थोड़ा बदल सकता है। समान वस्तु का भार ध्रुवों पर विषुवत रेखा की तुलना में थोड़ा अधिक होगा।
पृथ्वी की परिधि का प्रारंभिक वैज्ञानिक मापन
पृथ्वी की परिधि के वैज्ञानिक मापन से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण नाम एराटोस्थनीज का है। उन्होंने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में सूर्य की किरणों, छाया और ज्यामिति की सहायता से पृथ्वी की परिधि का उल्लेखनीय अनुमान लगाया।
उन्होंने मिस्र के दो स्थानों—सायीन, जो वर्तमान अस्वान के निकट था, और अलेक्जेंड्रिया—का उपयोग किया।
ग्रीष्म अयनांत के दिन सायीन में दोपहर के समय सूर्य लगभग सीधे सिर के ऊपर था। वहाँ एक गहरे कुएँ के तल तक सूर्य का प्रकाश पहुँच रहा था और लगभग कोई छाया नहीं बन रही थी। उसी समय अलेक्जेंड्रिया में खड़ी वस्तु की छाया से लगभग 7.2° का कोण प्राप्त हुआ।
पूर्ण वृत्त 360° का होता है और 7.2°, 360° का लगभग 1/50 भाग है। इसका अर्थ था कि सायीन और अलेक्जेंड्रिया के बीच की दूरी पृथ्वी की कुल परिधि का लगभग पचासवाँ भाग थी।
दोनों स्थानों के बीच की दूरी को आधार बनाकर एराटोस्थनीज ने पृथ्वी की परिधि लगभग 40,000 किमी के आसपास निर्धारित की। आधुनिक मापन के अत्यंत निकट यह परिणाम उस समय की वैज्ञानिक उपलब्धियों में एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।
एराटोस्थनीज की उपलब्धि को सही रूप में समझना आवश्यक है। उन्होंने पहली बार यह सिद्ध नहीं किया था कि पृथ्वी गोल है; पृथ्वी के गोलाकार होने का विचार उनसे पहले भी विद्यमान था। उनकी प्रमुख उपलब्धि पृथ्वी की परिधि का ज्यामितीय और वैज्ञानिक मापन थी।
पृथ्वी के गोलाकार होने के प्रमुख प्रमाण
पृथ्वी के आकार की जानकारी आधुनिक उपग्रह चित्रों से प्रत्यक्ष रूप से प्राप्त की जा सकती है, लेकिन वैज्ञानिक इतिहास में इसके कई पारंपरिक प्रमाण भी महत्वपूर्ण रहे हैं।
चंद्र ग्रहण के समय चंद्रमा पर पृथ्वी की छाया गोलाकार दिखाई देती है। इससे पृथ्वी की गोलाकार प्रकृति का संकेत मिलता है।
समुद्र में दूर जाता जहाज एक साथ अदृश्य नहीं होता। पहले उसका निचला भाग और बाद में ऊपरी भाग क्षितिज के नीचे गायब होता है। यह पृथ्वी की वक्रता का परिणाम है।
उत्तर या दक्षिण की ओर यात्रा करने पर आकाश में दिखाई देने वाले तारों की स्थिति बदलती है। यदि पृथ्वी समतल होती तो ऐसा परिवर्तन इस प्रकार नहीं दिखाई देता।
विश्व की परिक्रमा करके पुनः प्रारंभिक स्थान पर लौटना भी पृथ्वी की गोलाकार प्रकृति का महत्वपूर्ण प्रमाण है।
आज कृत्रिम उपग्रहों और अंतरिक्ष अभियानों से पृथ्वी के आकार का प्रत्यक्ष और अत्यंत सटीक मापन संभव है।
जियोइड और चपटा गोलाभ में अंतर
पृथ्वी के आकार को समझते समय जियोइड और चपटा गोलाभ को एक ही नहीं मानना चाहिए।
चपटा गोलाभ पृथ्वी का एक नियमित गणितीय मॉडल है। इसमें पृथ्वी को विषुवत रेखा पर उभरी तथा ध्रुवों पर चपटी चिकनी आकृति के रूप में माना जाता है।
इसके विपरीत जियोइड पृथ्वी के वास्तविक गुरुत्वीय क्षेत्र पर आधारित है। पृथ्वी के भीतर द्रव्यमान का वितरण सभी स्थानों पर समान न होने के कारण जियोइड पूरी तरह नियमित नहीं होता।
औसत समुद्र तल का महत्व
पृथ्वी की सतह पर ऊँचाई मापने के लिए एक सामान्य संदर्भ स्तर की आवश्यकता होती है। इसके लिए औसत समुद्र तल का उपयोग किया जाता है।
इसी कारण किसी पर्वत की ऊँचाई सामान्यतः यह नहीं बताती कि उसका शिखर आसपास की भूमि से कितना ऊँचा है, बल्कि यह बताती है कि उसका शिखर औसत समुद्र तल से कितनी ऊँचाई पर स्थित है।
जियोइड और औसत समुद्र तल का संबंध भू-सर्वेक्षण, मानचित्र निर्माण और ऊँचाई निर्धारण में विशेष महत्व रखता है।
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
- पृथ्वी पूर्ण गोला नहीं है। यह विषुवत रेखा पर कुछ उभरी तथा ध्रुवों पर थोड़ी चपटी है।
- पृथ्वी का सरल गणितीय आकार चपटा गोलाभ है, जबकि उसका गुरुत्वीय संदर्भ आकार जियोइड कहलाता है।
- पृथ्वी की औसत त्रिज्या लगभग 6371 किमी है।
- विषुवतीय त्रिज्या लगभग 6378 किमी तथा ध्रुवीय त्रिज्या लगभग 6357 किमी है।
- विषुवतीय और ध्रुवीय त्रिज्या में लगभग 21 किमी का अंतर है।
- विषुवतीय व्यास लगभग 12,756 किमी तथा ध्रुवीय व्यास लगभग 12,714 किमी है।
- विषुवतीय और ध्रुवीय व्यास में लगभग 43 किमी का अंतर है।
- विषुवतीय परिधि लगभग 40,075 किमी है।
- ध्रुवों से होकर गुजरने वाली परिधि लगभग 40,008 किमी है।
- सामान्य रूप से पृथ्वी की परिधि लगभग 40,000 किमी मानी जा सकती है।
- गुरुत्व ध्रुवों पर अधिक तथा विषुवत रेखा पर कम होता है।
- वस्तु का द्रव्यमान स्थान बदलने से नहीं बदलता, जबकि भार में परिवर्तन हो सकता है।
- एराटोस्थनीज ने सूर्य की छाया और ज्यामिति की सहायता से पृथ्वी की परिधि का प्रारंभिक वैज्ञानिक मापन किया।
- उनकी गणना अलेक्जेंड्रिया और सायीन के अवलोकनों पर आधारित थी।
- सायीन वर्तमान अस्वान के निकट स्थित था।
- एराटोस्थनीज के प्रयोग में लगभग 7.2° का कोण महत्वपूर्ण था।
- 7.2°, पूर्ण वृत्त का लगभग 1/50 भाग है।
निष्कर्ष
पृथ्वी का आकार उसकी घूर्णन गति और गुरुत्वीय संरचना का परिणाम है। सामान्य रूप से गोल दिखाई देने के बावजूद पृथ्वी वास्तव में विषुवत रेखा पर उभरी और ध्रुवों पर चपटी है। इसलिए इसे गणितीय रूप से चपटा गोलाभ तथा गुरुत्वीय रूप से जियोइड माना जाता है। पृथ्वी की त्रिज्या, व्यास और परिधि में विषुवतीय तथा ध्रुवीय अंतर इसके वास्तविक आकार को प्रमाणित करते हैं। पृथ्वी के आकार और मापन की यही आधारभूत समझ आगे अक्षांश, देशांतर, समय, गुरुत्व, मानचित्रण तथा पृथ्वी की गतियों जैसे विषयों को समझने का आधार बनती है।