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मुद्रा, बैंकिंग एवं मौद्रिक नीति

Money, Banking & Monetary Policy

मुद्रा आपूर्ति, मुद्रास्फीति, भारतीय रिजर्व बैंक, मौद्रिक नीति, बैंकिंग संरचना और वित्तीय प्रणाली का अध्यायवार अध्ययन।

मुद्रा आपूर्तिमुद्रास्फीतिRBIमौद्रिक नीति
इस अध्याय में
1. मुद्रा की अवधारणा एवं आपूर्ति (Money Supply & Aggregates)2. मुद्रास्फीति एवं इसकी गतिकी (Inflation & Dynamics)3. मौद्रिक नीति एवं भारतीय रिजर्व बैंक (Monetary Policy & RBI)4. भारतीय बैंकिंग संरचना एवं बैंकिंग क्षेत्र में सुधार (Banking Structure & Reforms)5. UPSC परीक्षा विशेष मॉड्यूल (Prelims & Mains Practice)

1. मुद्रा की अवधारणा एवं आपूर्ति (Money Supply & Aggregates)

1.1 मुद्रा के प्रकार एवं कार्य (Types & Functions of Money)

मुद्रा विनिमय का वह सर्वमान्य माध्यम है जो वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य मापन, संचय और हस्तांतरण का कार्य करती है।

आदेश मुद्रा (Fiat Money): सरकार द्वारा जारी की गई वह मुद्रा जिसे कानूनी तौर पर विनिमय का माध्यम स्वीकार करना अनिवार्य होता है (उदा. करेंसी नोट और सिक्के)।
न्यास मुद्रा (Fiduciary Money): वह मुद्रा जो भुगतानकर्ता और प्राप्तकर्ता के मध्य आपसी विश्वास पर आधारित होती है (उदा. चेक, ड्राफ्ट)।
धात्विक/वस्तु मुद्रा (Commodity Money): जिसका आंतरिक मूल्य (Intrinsic Value) उसके अंकित मूल्य (Face Value) के बराबर होता है (उदा. सोने-चाँदी के सिक्के)।
सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC / e-₹): भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा जारी कानूनी टेंडर का डिजिटल रूप, जो ब्लॉकचेन/DLT तकनीक पर आधारित है।

1.2 मुद्रा आपूर्ति के माप (Money Supply Aggregates)

आरबीआई द्वारा भारतीय अर्थव्यवस्था में तरलता और मुद्रा की मात्रा मापने के लिए निम्नलिखित चार संकेतकों (M_0, M_1, M_2, M_3, M_4) का उपयोग किया जाता है:

                  [ मुद्रा आपूर्ति के मापक ]
                             │
       ┌─────────────────────┴─────────────────────┐
  [ संकीर्ण मुद्रा (Narrow Money) ]   [ व्यापक मुद्रा (Broad Money) ]
       │                                           │
  ┌────┴────┐                                 ┌────┴────┐
 [M₀]      [M₁]                              [M₂]      [M₃] & [M₄]
 (आधार    (जनता की                           (M₁ +     (M₁ + आवधिक जमा /
  मुद्रा)  करेंसी +                          डाकघर      डाकघर कुल जमा)
           माँग जमा)                         बचत)
1.
आरक्षित मुद्रा / आधार मुद्रा (Reserve Money / High-Powered Money - M_0):
ext{M}_0 = ext{चलन में करेंसी} + ext{आरबीआई के पास बैंकों की जमा (CRR)} + ext{आरबीआई के पास अन्य जमा}

नोट: इसे केंद्रीय बैंक का कुल दायित्व (Liability) भी कहा जाता है।

2.
संकीर्ण मुद्रा (Narrow Money - M_1):
ext{M}_1 = ext{जनता के पास करेंसी} + ext{बैंकिंग प्रणाली में माँग जमा (Demand Deposits)} + ext{आरबीआई के पास अन्य जमा}
3.
M_2 मुद्रा:
ext{M}_2 = ext{M}_1 + ext{डाकघर बचत बैंकों में बचत जमा}
4.
व्यापक मुद्रा (Broad Money - M_3):
ext{M}_3 = ext{M}_1 + ext{बैंकिंग प्रणाली में सावधि जमा (Time Deposits / Fixed Deposits)}

नोट: M_3 नीतिगत विश्लेषण के लिए मुद्रा आपूर्ति का सबसे महत्वपूर्ण और प्रयुक्त मापक है।

5.
M_4 मुद्रा:
ext{M}_4 = ext{M}_3 + ext{डाकघर की कुल जमा राशि (राष्ट्रीय बचत पत्र/NSC को छोड़कर)}
मापकघटकतरलता का क्रम (Liquidity Order)
M_0आरक्षित मुद्रा / हाई-पावर्ड मनीसर्वाधिक उच्च तरलता (मूल केंद्र)
M_1जनता के पास नकदी + माँग जमासर्वाधिक तरल (Most Liquid)
M_2M_1 + डाकघर बचत जमाउच्च तरलता
M_3M_1 + बैंकों में आवधिक जमामध्यम तरलता (व्यापक मापक)
M_4M_3 + डाकघर कुल जमान्यूनतम तरल (Least Liquid)

1.3 मुद्रा गुणक (Money Multiplier - MM)

मुद्रा गुणक यह दर्शाता है कि प्राथमिक आरक्षित मुद्रा (M_0) की प्रति इकाई वृद्धि से अर्थव्यवस्था में व्यापक मुद्रा (M_3) का कितना सृजन होता है।

$ ext{Money Multiplier (MM)} = rac{ ext{ व्यापक मुद्रा (M}_3 ext{)}}{ ext{आधार मुद्रा (M}_0 ext{)}}$

मुद्रा गुणक के निर्धारक कारक:

नकद आरक्षित अनुपात (CRR): CRR बढ़ने पर बैंकों की साख सृजन क्षमता घटती है \Rightarrow मुद्रा गुणक कम होता है।
करेंसी-जमा अनुपात (Currency-Deposit Ratio - c/d): यदि जनता नकदी के रूप में पैसा अधिक रखती है और बैंक में जमा कम करती है \Rightarrow मुद्रा गुणक कम होता है।
जनता की बैंकिंग आदतें: डिजिटल बैंकिंग और वित्तीय समावेशन में वृद्धि \Rightarrow जमा में वृद्धि \Rightarrow मुद्रा गुणक में वृद्धि।

$ ext{मुद्रा गुणक (MM)} \propto rac{1}{ ext{CRR / Reserve Ratio}}$


2. मुद्रास्फीति एवं इसकी गतिकी (Inflation & Dynamics)

2.1 मुद्रास्फीति की अवधारणा एवं वर्गीकरण

मुद्रास्फीति (Inflation) से तात्पर्य समय के साथ वस्तुओं और सेवाओं की सामान्य कीमत स्तर में सतत एवं व्यापक वृद्धि से है, जिसके परिणामस्वरूप मुद्रा की क्रय शक्ति (Purchasing Power) में कमी आती है।

दर के आधार पर वर्गीकरण:

1.
रेंगती मुद्रास्फीति (Creeping Inflation): 1% से 3% (अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य के लिए सकारात्मक)।
2.
चलती मुद्रास्फीति (Walking Inflation): 3% से 10% (सतर्कता का स्तर)।
3.
भागती/सरपट मुद्रास्फीति (Galloping Inflation): 10% से अधिक (दो या तीन अंकों में)।
4.
अति-मुद्रास्फीति (Hyper-Inflation): कीमतों में अनियंत्रित अप्रत्याशित वृद्धि (उदा. जिम्बाब्वे, वेनेजुएला)।

कारण के आधार पर वर्गीकरण:

                     [ मुद्रास्फीति के प्रकार ]
                                │
        ┌───────────────────────┴───────────────────────┐
 [ माँग-जन्य मुद्रास्फीति ]                   [ लागत-जन्य मुद्रास्फीति ]
 (Demand-Pull Inflation)                     (Cost-Push Inflation)
   • मुद्रा आपूर्ति में अत्यधिक वृद्धि            • कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि
   • राजकोषीय प्रोत्साहन व व्यय               • आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान
   • जनसंख्या व उपभोग में वृद्धि              • मजदूरी व करों में वृद्धि

2.2 मुद्रास्फीति मापन के सूचकांक (Indices of Inflation: WPI vs. CPI)

सूचकांक पैरामीटरथोक मूल्य सूचकांक (WPI)उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI)
जारीकर्ता संस्थाआर्थिक सलाहकार कार्यालय (DPIIT), वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालयराष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO), सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI)
बाजार का स्तरथोक मंडी/प्रारंभिक चरण (Mandi Level)खुदरा/उपभोक्ता स्तर (Retail Level)
शामिल घटककेवल वस्तुएं (Goods Only) (सेवाएं शामिल नहीं)वस्तुएं एवं सेवाएं (Goods + Services) दोनों
आधार वर्ष (Base Year)2011-122012
सर्वाधिक भारांश (Weightage)निर्मित उत्पाद (Manufactured Products) ~ 64.2%खाद्य एवं पेय पदार्थ (Food & Beverages) ~ 45.86%
RBI का नीतिगत आधार2014 से पहले प्रयुक्त2014 के बाद (उर्जित पटेल समिति) मौद्रिक नीति का मुख्य आधार

2.3 महत्वपूर्ण शब्दावलियाँ (Key Inflation Concepts)

हेडलाइन मुद्रास्फीति (Headline Inflation): सभी वस्तुओं (खाद्य एवं ईंधन सहित) की कीमतों में वृद्धि की कुल दर। यह अत्यधिक अस्थिर (Volatile) होती है।
कोर मुद्रास्फीति (Core Inflation): हेडलाइन मुद्रास्फीति में से प्राथमिक खाद्य पदार्थों और ईंधन/ऊर्जा उत्पादों की कीमतों को घटाने पर प्राप्त सूचकांक।
ext{Core Inflation} = ext{Headline Inflation} - ( ext{Food Inflation} + ext{Fuel Inflation})
स्टैगफ्लेशन (Stagflation): वह आर्थिक स्थिति जहाँ उच्च मुद्रास्फीति (High Inflation), धीमी आर्थिक संवृद्धि (Stagnant Growth) और उच्च बेरोजगारी (High Unemployment) एक साथ विद्यमान हों।
फिलिप्स वक्र (Phillips Curve): मुद्रास्फीति की दर और बेरोजगारी की दर के मध्य व्युत्क्रमानुपाती (Inverse) संबंध को दर्शाता है। (अल्पकाल में लागू, परंतु स्टैगफ्लेशन में यह वक्र विफल हो जाता है)।
  मुद्रास्फीति दर (%)
     │
  High│       │   \  (फिलिप्स वक्र - अल्पकालिक)
     │      Low│_____\_________________
     0    High             बेरोजगारी दर (%)

3. मौद्रिक नीति एवं भारतीय रिजर्व बैंक (Monetary Policy & RBI)

3.1 भारतीय रिजर्व बैंक की संरचना एवं कार्य

भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 के तहत 1 अप्रैल 1935 को स्थापित RBI भारत का केंद्रीय बैंक है।

मुख्य कार्य: मुद्रा निर्गमन, बैंकों का बैंक, सरकार का बैंकर, विदेशी मुद्रा भंडार का संरक्षक (Forex Manager), और अंतिम ऋणदाता (Lender of Last Resort)।

3.2 मौद्रिक नीति समिति (Monetary Policy Committee - MPC)

आरबीआई अधिनियम, 1934 की धारा 45ZB के तहत उर्जित पटेल समिति की सिफारिश पर 2016 में MPC का गठन किया गया।

संरचना (6 सदस्य):
3 सदस्य RBI से (RBI गवर्नर - पदेन अध्यक्ष, उप-गवर्नर, तथा एक अधिकारी)।
3 सदस्य केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त (4 वर्ष के कार्यकाल हेतु)।
निर्णय प्रक्रिया: बहुमत से निर्णय; बराबर मत होने की स्थिति में गवर्नर को निर्णायक मत (Casting Vote) का अधिकार।
जनादेश (Mandate): लचीली मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण (Flexible Inflation Targeting - FIT):
ext{लक्ष्य} = 4\% \quad [ ext{न्यूनतम सीमा } 2\% ext{ से अधिकतम सीमा } 6\% ext{ (अर्थात } 4\% \pm 2\% ext{)}]
विफलता का मानदंड: यदि मुद्रास्फीति लगातार 3 तिमाहियों (9 माह) तक 2\% से कम या 6\% से अधिक बनी रहती है, तो RBI को केंद्र सरकार को विफलता का कारण और सुधारात्मक उपाय प्रस्तुत करने होते हैं।

3.3 मौद्रिक नीति के उपकरण (Tools of Monetary Policy)

                     [ मौद्रिक नीति के उपकरण ]
                                │
        ┌───────────────────────┴───────────────────────┐
 [ मात्रात्मक उपकरण (Quantitative) ]           [ गुणात्मक उपकरण (Qualitative) ]
   • CRR, SLR (आरक्षित अनुपात)                   • मार्जिन आवश्यकताएँ
   • Repo, SDF, MSF, Bank Rate                  • नैतिक दबाव (Moral Suasion)
   • OMO (खुले बाजार की क्रियाएं)                  • ऋण की राशनिंग (Direct Action)

A. मात्रात्मक/परिमाणात्मक उपकरण (Quantitative Tools):

1.
नकद आरक्षित अनुपात (Cash Reserve Ratio - CRR): बैंकों की कुल शुद्ध माँग और समय देनदारियों (NDTL) का वह प्रतिशत जो बैंकों को आरबीआई के पास केवल नकद (Cash) के रूप में रखना अनिवार्य है। इस पर कोई ब्याज नहीं मिलता।
2.
वैधानिक तरलता अनुपात (Statutory Liquidity Ratio - SLR): NDTL का वह प्रतिशत जो बैंकों को स्वयं के पास तरल परिसंपत्तियों (नकद, सोना, स्वीकृत सरकारी प्रतिभूतियों/G-Secs) के रूप में रखना होता है।
3.
रेपो दर (Repo Rate): वह अल्पकालिक ब्याज दर जिस पर वाणिज्यिक बैंक सरकारी प्रतिभूतियाँ गिरवी रखकर RBI से नकद उधार लेते हैं।
4.
स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलिटी (SDF): वह दर जिस पर RBI बैंकों से बिना किसी प्रतिभूति/कोलेटरल के अतिरिक्त तरलता स्वीकार करता है। (यह रेपो कॉरिडोर की निचली सीमा है)।
5.
सीमांत स्थायी सुविधा (Marginal Standing Facility - MSF): वह दर जिस पर बैंक आपातकालीन स्थिति में अपनी SLR सीमा की प्रतिभूतियों का उपयोग करके रातभर (Overnight) के लिए RBI से अतिरिक्त ऋण ले सकते हैं। (यह रेपो कॉरिडोर की ऊपरी सीमा है)।
6.
बैंक दर (Bank Rate): वह दीर्घकालिक ब्याज दर जिस पर RBI बिना किसी प्रतिभूति के बैंकों को ऋण प्रदान करता है।
7.
खुले बाजार की क्रियाएँ (Open Market Operations - OMO): RBI द्वारा द्वितीयक बाजार में सरकारी प्रतिभूतियों (G-Secs) की खरीद और बिक्री।
G-Sec की बिक्री \Rightarrow बाजार से तरलता का निष्कासन (Liquidity Mop-up).
G-Sec की खरीद \Rightarrow बाजार में तरलता का प्रवाह (Liquidity Injection).

B. तरलता समायोजन सुविधा (Liquidity Adjustment Facility - LAF) कॉरिडोर:

ext{MSF / Bank Rate (ऊपरी सीमा)} > ext{Repo Rate (नीतिगत दर)} > ext{SDF (निचली सीमा)}

3.4 मौद्रिक नीति संचरण (Monetary Policy Transmission) एवं चुनौतियाँ

मौद्रिक नीति संचरण का अर्थ है RBI द्वारा नीतिगत रेपो दर में किए गए बदलावों का वाणिज्यिक बैंकों की ऋण दरों (Lending Rates) तक पहुँचना।

मौद्रिक नीति संचरण प्रणाली का विकास:

1.
**प्राइम लैंडिंग रेट (PLR) $

ightarrow$ बेस रेट (Base Rate)**

2.
MCLR (सीमांत लागत आधारित ऋण दर - 2016): बैंकों की निधि की सीमांत लागत पर आधारित।
3.
बाहरी बेंचमार्क आधारित दर (External Benchmark Lending Rate - EBLR - 2019): आरबीआई ने सभी फ्लोटिंग रेट खुदरा और एमएसएमई ऋणों को बाहरी बेंचमार्क (उदा. रेपो दर या ट्रेजरी बिल यील्ड) से जोड़ना अनिवार्य किया, जिससे मौद्रिक संचरण अत्यंत तीव्र और पारदर्शी हुआ है।

4. भारतीय बैंकिंग संरचना एवं बैंकिंग क्षेत्र में सुधार (Banking Structure & Reforms)

4.1 भारतीय बैंकिंग प्रणाली की संरचना

                     [ भारतीय बैंकिंग प्रणाली ]
                                │
        ┌───────────────────────┴───────────────────────┐
  [ वाणिज्यिक बैंक (Commercial Banks) ]          [ सहकारी बैंक (Cooperative Banks) ]
        │                                               │
  ┌─────┴───────────────────┐                     ┌─────┴───────────────────┐
 [अनुसूचित बैंक]      [गैर-अनुसूचित]              [शहरी सहकारी]         [ग्रामीण सहकारी]
 (RBI Act 2nd Sch.)                               (UCBs)                (STCBs / DCCBs)
        │
  ┌─────┼───────────────┬──────────────┐
[सार्वजनिक] [निजी]  [विदेशी] [RRBs] [पेमेंट/लघु वित्त बैंक]
1.
अनुसूचित बैंक (Scheduled Banks): वे बैंक जो आरबीआई अधिनियम, 1934 की दूसरी अनुसूची (Second Schedule) में शामिल हैं। शर्तें: चुकता पूँजी + आरक्षित निधि कम से कम ₹5 लाख होनी चाहिए तथा जमाकर्ताओं के हितों के विरुद्ध कार्य न करें।
2.
भुगतान बैंक (Payment Banks): नचिकेता मोर समिति की सिफारिश पर स्थापित।
विशेषताएँ: प्रति ग्राहक अधिकतम ₹2 लाख जमा स्वीकार कर सकते हैं; ऋण (Loans) और क्रेडिट कार्ड जारी नहीं कर सकते; केवल एटीएम/डेबिट कार्ड दे सकते हैं।
3.
लघु वित्त बैंक (Small Finance Banks - SFBs):
विशेषताएँ: कम से कम 75% ऋण प्राथमिक क्षेत्रक (PSL) को देना अनिवार्य; 50% ऋण ₹25 लाख से कम राशि के होने चाहिए।

4.2 गैर-निष्पादित परिसंपत्तियाँ (Non-Performing Assets - NPA)

जब किसी ऋण का मूलधन (Principal) या ब्याज का भुगतान 90 दिनों की अवधि तक बकाया रहता है, तो उसे गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (NPA) घोषित किया जाता है। (कृषि ऋणों के लिए: अल्पकालिक फसलों हेतु 2 फसल मौसम और दीर्घकालिक फसलों हेतु 1 फसल मौसम)।

NPA का वर्गीकरण:

[ संकटग्रस्त परिसंपत्ति (Stressed Assets) ]
                  │
   ┌──────────────┴──────────────┐
[विशेष उल्लेख खाता (SMA)]     [गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (NPA)]
   • SMA-0: 1 - 30 दिन           • सब-स्टैंडर्ड (Sub-Standard): 12 माह तक NPA
   • SMA-1: 31 - 60 दिन          • संदिग्ध (Doubtful): 12 माह से अधिक NPA
   • SMA-2: 61 - 90 दिन          • हानि परिसंपत्ति (Loss Asset): पूर्णतः डूबा ऋण

4.3 एनपीए समाधान के विधायी एवं संस्थागत उपाय (NPA Resolution Framework)

1.
SARFAESI अधिनियम, 2002: बैंकों को बिना अदालत के हस्तक्षेप के सुरक्षित परिसंपत्तियों को जब्त करने और बेचने का अधिकार देता है (कृषि भूमि पर लागू नहीं)।
2.
दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (Insolvency and Bankruptcy Code - IBC, 2016):
समयबद्ध समाधान प्रक्रिया (Time-bound Resolution - अधिकतम 330 दिन)।
कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) के संचालन हेतु नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) निर्णायक प्राधिकरण है।
3.
राष्ट्रीय परिसंपत्ति पुनर्गठन कंपनी लिमिटेड (NARCL / बैड बैंक - Bad Bank):
बैंकों के एनपीए को खरीदकर उनका निपटान करती है। इसमें 51% हिस्सेदारी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSBs) की है।
केंद्र सरकार द्वारा NARCL द्वारा जारी सुरक्षा रसीदों (Security Receipts) पर गारंटी प्रदान की जाती है।

4.4 बासेल मानक (Basel Norms) एवं जोखिम प्रबंधन

बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स (BIS), स्विट्जरलैंड द्वारा वैश्विक बैंकिंग प्रणाली की स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए बासेल मानक जारी किए जाते हैं।

पूँजी पर्याप्तता अनुपात (Capital to Risk-Weighted Assets Ratio - CRAR):

$ ext{CRAR} = rac{ ext{Tier-1 Capital} + ext{Tier-2 Capital}}{ ext{जोखिम भारित परिसंपत्तियाँ (Risk Weighted Assets)}}$

Tier-1 पूँजी: मुख्य पूँजी (इक्विटी शेयर, शेयर प्रीमियम) - जो घाटे को तुरंत सोख सकती है।
Tier-2 पूँजी: अनुपूरक पूँजी (पुनर्मूल्यांकन आरक्षित, अधीनस्थ ऋण)।
भारतीय मानदंड: बासेल III के तहत RBI ने भारत के लिए न्यूनतम CRAR 9% (वैश्विक मानक 8% से 1% अधिक) और कैपिटल कंजर्वेशन बफर (CCB) 2.5% निर्धारित किया है (कुल 11.5%)।

5. UPSC परीक्षा विशेष मॉड्यूल (Prelims & Mains Practice)

5.1 प्रीलिम्स त्वरित पुनरीक्षण बिंदु (Quick Revision Points)

1.
M_1 और M_2 को संकीर्ण मुद्रा, जबकि M_3 और M_4 को व्यापक मुद्रा कहा जाता है।
2.
जब लोग अपनी नकदी बैंक में जमा कराते हैं, तो M_1 अपरिवर्तित रहता है, लेकिन मुद्रा गुणक की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।
3.
SDF (स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलिटी) के तहत RBI बैंकों से तरलता सोखने के लिए सरकारी प्रतिभूतियाँ (G-Secs) गिरवी नहीं रखता।
4.
WPI में सेवाओं को शामिल नहीं किया जाता, जबकि CPI में वस्तुएँ और सेवाएँ दोनों शामिल हैं।
5.
पेमेंट बैंक जमा स्वीकार कर सकते हैं और डेबिट कार्ड दे सकते हैं, लेकिन ऋण और क्रेडिट कार्ड जारी करने पर प्रतिबंध है।

5.2 प्रीलिम्स अभ्यास प्रश्न (Prelims Practice Questions)

प्रश्न 1 (UPSC आधारित):

निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

1.
मौद्रिक नीति समिति (MPC) की अध्यक्षता भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर करते हैं।
2.
नकद आरक्षित अनुपात (CRR) में वृद्धि करने से मुद्रा गुणक (Money Multiplier) में वृद्धि होती है।
3.
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) में खाद्य पदार्थों का भारांश थोक मूल्य सूचकांक (WPI) की तुलना में अधिक है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (a) केवल 1 और 2 (b) केवल 1 और 3 (c) केवल 2 और 3 (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b) व्याख्या: कथन 1 सही है (RBI गवर्नर MPC के पदेन अध्यक्ष होते हैं)। कथन 2 गलत है क्योंकि CRR बढ़ाने से बैंकों की साख सृजन क्षमता घटती है, जिससे मुद्रा गुणक घटता है (MM \propto 1/CRR)। कथन 3 सही है (CPI में खाद्य पदार्थों का भार ~45.86% है जबकि WPI में प्राथमिक खाद्य वस्तुएं केवल ~15.2% हैं)।


5.3 मेन्स अभ्यास प्रश्न एवं उत्तर-लेखन ढाँचा (Mains Answer Blueprint)

प्रश्न: "भारतीय बैंकिंग क्षेत्रक में गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPA) के उच्च स्तर ने आर्थिक संवृद्धि और साख सृजन को बाधित किया है। इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) और 'बैड बैंक' (NARCL) की भूमिका का मूल्यांकन करते हुए इस संकट के स्थायी समाधान हेतु उपाय सुझाइए।" (250 शब्द, 15 अंक)

📝 उत्तर का विश्लेषणात्मक ढाँचा:

                  [ मेन्स उत्तर ढाँचा: NPA संकट व समाधान ]
                                   │
   ┌───────────────────────────────┼───────────────────────────────┐
 [भूमिका (Introduction)]   [मुख्य भाग (Body Paragraphs)]    [निष्कर्ष (Conclusion)]
  • NPA की परिभाषा           • NPA का आर्थिक संवृद्धि        • 4R रणनीति का उल्लेख
  • ट्विन बैलेंस शीट संकट    व साख संचरण पर प्रभाव           (Recognition, Resolution,
    (TBS Problem) की स्थिति   • IBC 2016 का मूल्यांकन         Recapitalisation, Reforms)
                            • Bad Bank (NARCL) की भूमिका     • स्थायी वित्तीय स्थिरता का
                            • विद्यमान चुनौतियाँ              भावी रोडमैप
1.
भूमिका (Introduction):
NPA की परिभाषा (90 दिनों तक मूलधन/ब्याज बकाया) दें।
भारत में 'ट्विन बैलेंस शीट समस्या' (बैंको का तनावग्रस्त बहीखाता और कॉरपोरेट क्षेत्र का अति-ऋणग्रस्त होना) का उल्लेख करते हुए उत्तर प्रारंभ करें।
2.
मुख्य भाग (Body Paragraphs):
अर्थव्यवस्था पर NPA का प्रतिकूल प्रभाव: बैंकों की साख सृजन क्षमता में कमी, उच्च ऋण ब्याज दरें, निजी निवेश में मंदी, और बैंकों की लाभप्रदता का ह्रास।
IBC (2016) का मूल्यांकन:
सकारात्मक: लेनदार-नियंत्रित मॉडल, प्रवर्तकों का डर (Section 29A), औसत रिकवरी दर में सुधार।
सीमाएँ: एनक्लाइट (NCLT) में मामलों का अत्यधिक लंबित होना, 330 दिनों की समय सीमा का उल्लंघन, तथा भारी कटौती (Haircuts ~60-70%)।
बैड बैंक (NARCL) की भूमिका:
बैंकों के बहीखाते से बड़े तनावग्रस्त परिसंपत्तियों (Stressed Assets) को हटाकर बैंकों को नए ऋण प्रदान करने में सक्षम बनाना।
चुनौती: यह केवल समाधान की प्रक्रिया को स्थानांतरित करता है, NPA के मूल कारणों (खराब क्रेडिट अप्रैज़ल) को समाप्त नहीं करता।
3.
आगे की राह एवं निष्कर्ष (Way Forward & Conclusion):
4R नीति: पहचान (Recognition), समाधान (Resolution), पुनर्पूँजीकरण (Recapitalisation) और सुधार (Reforms)।
सुधार के बिंदु: एआई/एमएल तकनीक से क्रेडिट जोखिम मूल्यांकन, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का पेशेवर शासन (Bank Board Bureau / FSIB), और प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग ढाँचे का सुदृढ़ीकरण।
निष्कर्ष: बैंकिंग क्षेत्र की सुदृढ़ता भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने की अनिवार्य शर्त है।