1. भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्त्व एवं संरचनात्मक चुनौतियाँ (Overview & Structural Issues of Indian Agriculture)
भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि केवल एक आर्थिक क्षेत्रक नहीं है, बल्कि यह देश की सामाजिक-आर्थिक संरचना का मुख्य आधार है।
[भारतीय कृषि की दोहरी स्थिति]
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जीडीपी में योगदान: ~18% रोजगार सहभागिता: ~45.6%
(कम उत्पादकता का सूचक) (संरचनात्मक विषमता)
1.1 मुख्य आर्थिक आँकड़े एवं रुझान
•जीडीपी में योगदान: 1950-51 में राष्ट्रीय आय में कृषि का योगदान लगभग 55% था, जो वर्तमान में घटकर लगभग 17-18% रह गया है।
•रोजगार सहभागिता: आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) के अनुसार, आज भी देश की लगभग 45.6% कार्यशील आबादी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है। इसे अर्थशास्त्र में संरचनात्मक विषमता (Structural Distortion) कहा जाता है।
•जोत का आकार (Landholding Pattern): कृषि संगणना के अनुसार, भारत में कुल कृषि जोतों का 86% से अधिक भाग छोटे एवं सीमांत किसानों (1 से 2 हेक्टेयर से कम) के पास है। औसत कृषि जोत का आकार घटकर 1.08 हेक्टेयर रह गया है।
1.2 भारतीय कृषि की संरचनात्मक चुनौतियाँ (Structural Issues)
1.प्रच्छन्न/छद्म बेरोजगारी (Disguised Unemployment):
•कृषि क्षेत्र में आवश्यकता से अधिक श्रमिक लगे हुए हैं। यदि अतिरिक्त श्रमिकों को हटा भी दिया जाए, तो कुल उत्पादन पर शून्य प्रभाव पड़ता है (अर्थात् सीमांत उत्पादकता / Marginal Productivity = 0)।
2.कम पूँजी निर्माण (Low Capital Formation):
•कृषि में सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) के अनुपात में सकल पूँजी निर्माण (GCF) काफी कम (लगभग 15-16%) है। सार्वजनिक निवेश की तुलना में चालू सब्सिडी (बिजली, उर्वरक, पानी) पर अधिक व्यय होता है, जिससे दीर्घकालिक अवसंरचना का विकास बाधित होता है।
3.मानसून पर अत्यधिक निर्भरता एवं जलवायु परिवर्तन:
•भारत का लगभग 50% निवल बोया गया क्षेत्र (Net Sown Area) अभी भी असिंचित है और पूरी तरह मानसूनी वर्षा पर निर्भर है।
4.सब्जियों व खाद्य वस्तुओं में चक्रवाती मूल्य अस्थिरता (Cobweb Phenomenon):
•जब किसी वर्ष फसल का बंपर उत्पादन होता है तो मूल्य गिर जाते हैं, जिससे किसान अगले वर्ष उसकी बुआई कम कर देते हैं, परिणामस्वरूप अगले वर्ष भारी किल्लत व मूल्य वृद्धि होती है। इसे अर्थशास्त्र में कॉबवेब मॉडल (Cobweb Model) कहा जाता है।
2. भारत में भूमि सुधार (Land Reforms in India)
स्वतंत्रता के समय भारत में कृषि विकास की सबसे बड़ी बाधा औपनिवेशिक भू-राजस्व प्रणालियाँ (जमींदारी, रैयतवाड़ी, महालवाड़ी) थीं। स्वतंत्रता पश्चात भूमि सुधार का मुख्य उद्देश्य "भूमि जोतने वाले की" (Land to the Tiller) के सिद्धांत को लागू करना था।
[भूमि सुधार के चार स्तंभ]
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1. बिचौलियों का 2. काश्तकारी सुधार 3. जोत की सीमा 4. जोतों की चकबंदी
उन्मूलन (लगान, अधिकार सुरक्षा) धारण (Ceiling) व डिजिटलीकरण
2.1 भूमि सुधार के चार मुख्य चरण/स्तंभ
(i) बिचौलियों का उन्मूलन (Abolition of Intermediaries)
•स्वतंत्रता के तुरंत बाद जमींदारी, जागीरदारी और महालवाड़ी व्यवस्थाओं को समाप्त किया गया।
•परिणाम: लगभग 2 करोड़ काश्तकारों को राज्य के साथ प्रत्यक्ष संबंध में लाया गया और वे भूमि के स्वामी बने।
(ii) काश्तकारी सुधार (Tenancy Reforms)
•लगान का विनियमन (Regulation of Rent): विभिन्न राज्यों में उपज का अधिकतम 1/4 से 1/5 भाग लगान तय किया गया (जो पहले 50% से 70% तक होता था)।
•बेदखली से सुरक्षा (Security of Tenure): काश्तकारों को मनमाने ढंग से जमीन से बेदखल करने पर रोक लगाई गई।
•स्वामित्व का अधिकार: लंबे समय से खेती कर रहे काश्तकारों को मालिकाना हक दिया गया।
(iii) जोत की अधिकतम सीमा निर्धारण (Land Ceiling)
•एक परिवार द्वारा रखी जाने वाली अधिकतम कृषि योग्य भूमि की सीमा तय की गई।
•अधिशेष (Surplus) भूमि का अधिग्रहण करके उसे भूमिहीन एवं अनुसूचित जाति/जनजाति के किसानों में पुनर्वितरित करना था।
•विफलता का कारण: बेनामी हस्तांतरण, कानूनी खामियों और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण यह चरण सबसे कम सफल रहा।
(iv) जोतों की चकबंदी एवं आधुनिकीकरण (Consolidation of Holdings & Modernization)
•बिखरी हुई छोटी-छोटी जोतों को एक स्थान पर एकत्रित करना ताकि आधुनिक तकनीकों का प्रयोग संभव हो सके।
•डिजिटल इंडिया भू-अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम (DILRMP): भू-अभिलेखों का कंप्यूटरीकरण, मानचित्रों का डिजिटलीकरण और यूनिक लैंड पार्सल आइडेंटिफिकेशन नंबर (ULPIN - भू-आधार) जारी करना।
3. कृषि इनपुट, सब्सिडी एवं लागत अर्थशास्त्र (Agricultural Inputs & Subsidies)
3.1 प्रत्यक्ष बनाम अप्रत्यक्ष कृषि सब्सिडी (Direct vs Indirect Subsidies)
| आधार | प्रत्यक्ष सब्सिडी (Direct Subsidy) | अप्रत्यक्ष सब्सिडी (Indirect Subsidy) |
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| परिभाषा | किसानों को सीधे नकद हस्तांतरण (Direct Benefit Transfer) के रूप में दी जाने वाली वित्तीय सहायता। | इनपुट सामग्री की कीमतों को बाजार मूल्य से कम रखकर दी जाने वाली रियायत। |
| उदाहरण | PM-KISAN (₹6,000 प्रति वर्ष), मूल्य न्यूनता भुगतान (PDPS)। | उर्वरक सब्सिडी, मुफ्त/सस्ती बिजली, सिंचाई जल सब्सिडी। |
| बाजार विकृति | न्यूनतम बाजार विकृति होती है; किसान अपनी इच्छानुसार इनपुट चुन सकता है। | बाजार में विकृति (Distortion) पैदा करती है; जैसे सस्ती बिजली से भूजल का अत्यधिक दोहन। |
| पर्यावरणीय प्रभाव | पर्यावरण-अनुकूल खेती एवं विविधता को बढ़ावा। | अत्यधिक उर्वरक एवं जल उपयोग से मृदा व जल प्रदूषण। |
3.2 उर्वरक सब्सिडी एवं पोषक तत्व आधारित सब्सिडी (NBS Scheme)
•समस्या: पारंपरिक रूप से यूरिया पर अत्यधिक सब्सिडी के कारण N:P:K का उपयोग अनुपात आदर्श 4:2:1 से बिगड़कर 8:3:1 से भी अधिक हो गया था, जिससे मृदा स्वास्थ्य खराब हुआ।
•नीम कोटेड यूरिया (Neem Coated Urea): यूरिया के गैर-कृषि/औद्योगिक विचलन को रोकने और नाइट्रोजन की धीमी रिहाई (Slow-release) हेतु 100% नीम कोटिंग अनिवार्य की गई।
•पोषक तत्व आधारित सब्सिडी (Nutrient Based Subsidy - NBS): फॉस्फेटिक और पोटाशिक (P&K) उर्वरकों के लिए प्रति किग्रा पोषक तत्व (N, P, K, S) पर निश्चित सब्सिडी दी जाती है।
•नैनो यूरिया (Nano Urea): तरल रूप में 500 मिली बोतल जो 45 किग्रा बोरी के बराबर प्रभाव देती है; इसकी अवशोषण क्षमता (Absorption Efficiency) 80% से अधिक है।
4. कृषि विपणन, मूल्य नीति एवं MSP (Agricultural Marketing, MSP & Price Policy)
4.1 APMC अधिनियम एवं e-NAM
•APMC (कृषि उपज बाजार समिति): राज्य सरकारों द्वारा स्थापित मंडियाँ जहाँ किसानों को अपनी उपज लाइसेंस प्राप्त व्यापारियों को नीलामी के माध्यम से बेचनी होती थी।
•APMC की कमियाँ: कार्टेलाइजेशन (व्यापारियों की गुटबंदी), अत्यधिक मंडी शुल्क, बिचौलियों (आढ़तियों) की लंबी श्रृंखला, तथा पारदर्शी बोली का न होना।
•e-NAM (राष्ट्रीय कृषि बाजार): पैन-इंडिया इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग पोर्टल जो मौजूदा APMC मंडियों को एक एकीकृत राष्ट्रीय बाजार बनाने के लिए जोड़ता है।
4.2 न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की संरचना एवं निर्धारण
MSP वह न्यूनतम मूल्य है जिस पर सरकार किसानों से फसल खरीदने की गारंटी देती है ताकि बंपर उत्पादन के समय मूल्यों में अत्यधिक गिरावट से किसानों को बचाया जा सके।
[CACP की लागत अवधारणाएँ]
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A2 A2 + FL C2
(प्रत्यक्ष नकद व्यय) (A2 + पारिवारिक श्रम) (A2+FL + भूमि किराया व
पूँजी पर ब्याज)
CACP की लागत अवधारणाएँ (Cost Concepts):
1.A2 लागत: बीज, उर्वरक, कीटनाशक, ईंधन, पट्टे की भूमि का किराया, सिंचाई आदि पर किया गया प्रत्यक्ष नकद व इन-काइंड व्यय।
2.A2 + FL लागत: A2 लागत + अमानत/वैतनिक पारिवारिक श्रम (Unpaid Family Labour) का अनुमानित मूल्य।
3.C2 लागत (व्यापक लागत / Comprehensive Cost): A2 + FL लागत के अलावा किसान की अपनी भूमि का अनुमानित किराया और स्वामित्व वाली पूँजी पर ब्याज।
राष्ट्रीय किसान आयोग (स्वामीनाथन आयोग, 2006) की संस्तुति: MSP का निर्धारण व्यापक लागत C2 के कम से कम 50% अधिक (C2 + 50%) होना चाहिए।
वर्तमान सरकारी नीति: सरकार (A2 + FL) लागत के 1.5 गुना (50% लाभ) के आधार पर MSP तय करती है।
CACP द्वारा अधिसूचित फसलें (22 अकृषि/कृषि फसलें + 1 गन्ना FRP):
•7 अनाज: धान, गेहूं, मक्का, जौ, ज्वार, बाजरा, रागी।
•5 दालें: चना, अरहर (तूर), उड़द, मूंग, मसूर।
•7 तिलहन: मूंगफली, सरसों, सोयाबीन, सूरजमुखी, तिल, नाइजरसीड, कुसुम।
•3 वाणिज्यिक फसलें: कपास, कच्चा जूट, खोपरा (Copra)।
•(नोट: गन्ने के लिए 'उचित एवं लाभकारी मूल्य' - FRP तय किया जाता है।)
5. खाद्य सुरक्षा, PDS एवं बफर स्टॉक (Food Security, PDS & Buffer Stocks)
[खाद्य सुरक्षा चक्र]
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कृषक से खरीद बफर स्टॉक सार्वजनिक वितरण प्रणाली
(MSP पर FCI द्वारा) (सुरक्षा एवं आपात) (NFSA 2013 के तहत)
5.1 राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA 2013)
•कवरेज: देश की लगभग 67% जनसंख्या (75% ग्रामीण तथा 50% शहरी आबादी) को कानूनी रूप से सस्ती दरों पर खाद्यान्न प्राप्त करने का अधिकार।
•प्राथमिकता वाले परिवार (Priority Households): 5 किग्रा खाद्यान्न प्रति व्यक्ति प्रति माह।
•अंत्योदय अन्ना योजना (AAY): अत्यंत निर्धन परिवारों को 35 किग्रा खाद्यान्न प्रति परिवार प्रति माह।
•रियायती मूल्य: गेहूं ₹2/किग्रा, चावल ₹3/किग्रा, तथा मोटा अनाज ₹1/किग्रा (वर्तमान में 'प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्ना योजना' के तहत खाद्यान्न पूर्णतः निःशुल्क प्रदान किया जा रहा है)।
•महिला सशक्तिकरण: राशन कार्ड जारी करने हेतु घर की 18 वर्ष या उससे अधिक आयु की सबसे वरिष्ठ महिला को घर का मुखिया माना जाता है।
5.2 भारतीय खाद्य निगम (FCI) एवं शांता कुमार समिति (2015)
भारतीय खाद्य निगम (FCI) MSP पर खाद्यान्न की खरीद, भंडारण और वितरण का कार्य करता है।
शांता कुमार समिति की मुख्य सिफारिशें:
1.खरीद का विकेंद्रीकरण: FCI को केवल उन राज्यों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो खाद्यान्न की कमी वाले हैं; सरप्लस राज्यों (पंजाब, हरियाणा) में राज्य एजेंसियों को खरीद सौंपनी चाहिए।
2.NFSA कवरेज में कमी: NFSA के तहत 67% जनसंख्या कवरेज को घटाकर 40% किया जाना चाहिए ताकि सब्सिडी का बोझ कम हो।
3.डीबीटी (Direct Benefit Transfer) लागू करना: राशन के खाद्यान्न के स्थान पर सीधे नकद हस्तांतरण का विकल्प दिया जाना चाहिए।
4.साइलोस (Silos) एवं आधुनिकीकरण: खाद्यान्न के नुकसान (Transit Loss) को रोकने के लिए आधुनिक स्टील साइलो का निर्माण करना और FCI के परिचालन का शत-प्रतिशत डिजिटलीकरण करना।
6. UPSC परीक्षा विशेष मॉड्यूल (UPSC Special Module)
6.1 त्वरित पुनरीक्षण बिंदु (Quick Revision Notes for Prelims)
•CACP (कृषि लागत और मूल्य आयोग): यह कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के तहत एक संलग्न कार्यालय है। यह केवल MSP की संस्तुति (Recommendation) करता है, जबकि अंतिम निर्णय आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (CCEA) द्वारा लिया जाता है।
•भू-आधार (ULPIN): यह प्रत्येक कृषि भूमि खंड के लिए 14-अंकीय विशिष्ट पहचान संख्या है।
•ऑपरेशन ग्रीन्स (Operation Greens): TOP (टमाटर, प्याज, आलू) फसलों से बढ़ाकर अब 22 शीघ्र नष्ट होने वाले (Perishable) कृषि उत्पादों तक विस्तारित।
6.2 उत्तर-व्याख्या सहित अभ्यास प्रश्न (Prelims Practice MCQs)
प्रश्न 1: भारत में न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1.CACP भारत सरकार का एक वैधानिक निकाय (Statutory Body) है जो MSP की घोषणा करता है।
2.स्वामीनाथन आयोग ने सिफारिश की थी कि MSP का निर्धारण A2 लागत के कम से कम 50% अधिक होना चाहिए।
3.गन्ने के लिए आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (CCEA) द्वारा 'उचित और लाभकारी मूल्य' (FRP) की घोषणा की जाती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (A) केवल 1 और 2 (B) केवल 3 (C) केवल 2 और 3 (D) 1, 2 और 3
उत्तर: (B) केवल 3 व्याख्या:
•कथन 1 असत्य है क्योंकि CACP एक गैर-वैधानिक (Non-statutory) संलग्न कार्यालय है और यह केवल संस्तुति करता है; घोषणा CCEA द्वारा की जाती है।
•कथन 2 असत्य है क्योंकि स्वामीनाथन आयोग ने C2 लागत के 50% अधिक की सिफारिश की थी, न कि A2 की।
•कथन 3 सत्य है; गन्ने के लिए FRP की मंजूरी CCEA द्वारा दी जाती है।
6.3 मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन ढाँचा (Mains Answer Writing Blueprint)
प्रश्न: "भारत में केवल MSP वृद्धि कृषि संकट का दीर्घकालिक समाधान नहीं हो सकती। कृषि क्षेत्रक को मूल्य सहायता के स्थान पर आय सहायता और अवसंरचनात्मक सुधारों की ओर स्थानांतरित करने की आवश्यकता है।" समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
🎯 उत्तर का संरचनात्मक ढाँचा:
[उत्तर का प्रवाह / Flow]
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1. भूमिका (Introduction) 2. मुख्य भाग (Body Paragraphs) 3. निष्कर्ष (Conclusion)
- MSP का उद्देश्य - MSP की सीमाएँ (6 फसलें, क्षेत्रीय) - आय सहायता + इंफ्रा
- वर्तमान कृषि संकट - आय सहायता (PM-KISAN) के लाभ - वे-फॉरवर्ड (Agri 2.0)
- अवसंरचनात्मक सुधार (AIF, e-NAM)
1.भूमिका (Introduction - 30-40 शब्द):
•MSP की उत्पत्ति और इसके मूल उद्देश्य (खाद्य सुरक्षा एवं मूल्य स्थिरता) का संक्षेप में उल्लेख करें। वर्तमान में कृषि जीवी-उत्पादन लागत में वृद्धि और घटती लाभप्रदता के संदर्भ को जोड़ें।
2.मुख्य भाग (Body - 140-160 शब्द):
•MSP की सीमाएँ एवं चुनौतियाँ:
•सीमित प्रभाव: वास्तविक लाभ केवल 6-8% किसानों (मुख्यतः पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी यूपी के गेहूं-धान उत्पादक) तक सीमित।
•पर्यावरणीय क्षति: धान-गेहूं चक्र के कारण भूजल स्तर में भारी गिरावट और मृदा का क्षरण।
•राजकोषीय बोझ व बफर स्टॉक विकृति: FCI के पास बफर मानकों से अधिक स्टॉक जमा होना।
•मूल्य सहायता बनाम आय सहायता (Price Support vs Income Support):
•PM-KISAN जैसी आय सहायता का महत्त्व: यह बाजार-निरपेक्ष (Market Neutral) है, छोटे/सीमांत किसानों को समान रूप से कवर करती है, और इनपुट चुनने की स्वतंत्रता देती है।
•अवसंरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता (Infrastructure Reforms):
•कृषि अवसंरचना कोष (AIF): पोस्ट-हार्वेस्ट कोल्ड चेन, गोदाम और प्रसंस्करण इकाइयों का विकास।
•कृषि विपणन: e-NAM का सुदृढ़ीकरण, FPO का निर्माण और अनुबंध कृषि हेतु स्पष्ट नियामक ढाँचा।
3.निष्कर्ष (Conclusion - 30-40 शब्द):
•कृषि को "सब्सिडी-संचालित" के स्थान पर "निवेश-संचालित" (Investment-led Agriculture) बनाने का आह्वान करें। नीति आयोग के "फार्मर इनकम डबलिंग" विजन और शांता कुमार समिति की सिफारिशों का संदर्भ देते हुए एक प्रगतिशील निष्कर्ष लिखें।