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पूँजी बाजार, शेयर बाजार एवं गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियाँ

Capital Market, Stock Market & NBFCs

पूँजी बाजार, शेयर बाजार उपकरण, SEBI, प्राथमिक-द्वितीयक बाजार, NBFCs और वित्तीय क्षेत्र की नियामकीय संरचना का उन्नत अध्ययन।

पूँजी बाजारशेयर बाजारSEBINBFC
इस अध्याय में
📌 अध्याय का परिचय एवं UPSC प्रासंगिकता1. पूँजी बाजार का मूलभूत वर्गीकरण (NCERT & Basic Concepts)2. शेयर बाजार उपकरण एवं प्रमुख शब्दावली (Stock Market Terminology)3. SEBI एवं पूँजी बाजार का नियामक ढाँचा4. गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियाँ (NBFCs) एवं नियामक ढाँचा5. वैकल्पिक निवेश उपकरण (Alternative Investment Vehicles)🌐 UPSC प्रारंभिक परीक्षा: त्वरित पुनरीक्षण बिंदु (Quick Revision Sheet)✍️ UPSC प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास प्रश्न (MCQs)📝 UPSC मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन ढाँचा (Mains Answer Blueprint)

📌 अध्याय का परिचय एवं UPSC प्रासंगिकता

यह अध्याय भारतीय वित्तीय प्रणाली (Financial System) के उस घटक पर केंद्रित है जो दीर्घकालिक निधियों (Long-term Funds) के जुटाने और आवंटन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वित्तीय बाजार को दो प्रमुख भागों में बांटा जाता है: मुद्रा बाजार (Money Market) जो अल्पकालिक (1 वर्ष तक) ऋण योग्य निधियों का प्रबंधन करता है, और पूँजी बाजार (Capital Market) जो मध्यम व दीर्घकालिक (1 वर्ष से अधिक) पूँजी जुटाने का साधन प्रदान करता है।

UPSC प्रारंभिक परीक्षा में शेयर बाजार के उपकरणों (Instruments), T+1 सेटलमेंट, शॉर्ट सेलिंग, REITs/InvITs, और NBFCs के नियमों से तकनीकी प्रश्न पूछे जाते हैं। मुख्य परीक्षा (GS Paper 3) में पूँजी निर्माण, कॉर्पोरेट बॉन्ड बाजार के विकास, और गैर-बैंकिंग वित्तीय क्षेत्र (NBFCs) के सिस्टमिक जोखिम (Systemic Risk) पर विश्लेषणात्मक प्रश्न बनते हैं।


1. पूँजी बाजार का मूलभूत वर्गीकरण (NCERT & Basic Concepts)

1.1 मुद्रा बाजार बनाम पूँजी बाजार (Money Market vs. Capital Market)

आधारमुद्रा बाजार (Money Market)पूँजी बाजार (Capital Market)
अवधि (Tenure)अल्पकालिक (Short-term: <= 1 वर्ष)दीर्घकालिक (Long-term: > 1 वर्ष)
मुख्य उपकरणट्रेजरी बिल (T-Bills), व्यावसायिक पत्र (Commercial Paper), प्रमाण पत्र (CD), कॉल मनीशेयर (Shares/Equities), डिबेंचर (Debentures), बॉन्ड (Bonds), डेरिवेटिव्स
मुख्य नियामकभारतीय रिज़र्व बैंक (RBI)भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI)
उद्देश्यकार्यशील पूँजी (Working Capital) व तरलता प्रबंधनपूँजीगत व्यय (CapEx), दीर्घकालिक परिसंपत्ति निर्माण

1.2 प्राथमिक बाजार बनाम द्वितीयक बाजार (Primary vs. Secondary Market)

प्राथमिक बाजार (Primary Market / New Issues Market): जहाँ प्रतिभूतियाँ (Securities) पहली बार जारी की जाती हैं। यहाँ निधि सीधे निवेशकों से जारीकर्ता (कंपनी/सरकार) को स्थानांतरित होती है।
द्वितीयक बाजार (Secondary Market / Stock Exchange): जहाँ पूर्व-जारी प्रतिभूतियों का खरीद-बिक्री (Trading) निवेशकों के आपस में होता है। यहाँ कंपनी को कोई नई पूँजी प्राप्त नहीं होती; केवल स्वामित्व का हस्तांतरण होता है।
                               ┌────────────────────────────────┐
                               │     वित्तीय बाजार (Financial)  │
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                                               │
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                       ▼                                               ▼
             मुद्रा बाजार (Money)                             पूँजी बाजार (Capital)
               [नियामक: RBI]                                   [नियामक: SEBI]
                       │                                               │
                       └────────────────────────┐       ┌──────────────┘
                                                ▼       ▼
                                       ┌─────────────────┐
                                       │ प्राथमिक बाजार  │ (IPO/FPO)
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                                       │ द्वितीयक बाजार  │ (BSE/NSE)
                                       └─────────────────┘

2. शेयर बाजार उपकरण एवं प्रमुख शब्दावली (Stock Market Terminology)

2.1 प्राथमिक बाजार में शेयर जारी करने के तरीके

आरंभिक सार्वजनिक प्रस्ताव (IPO - Initial Public Offering): जब कोई असूचीबद्ध (Unlisted) कंपनी पहली बार आम जनता को अपने शेयर जारी करके शेयर बाजार में सूचीबद्ध (Listed) होती है।
अनुवर्ती सार्वजनिक प्रस्ताव (FPO - Follow-on Public Offer): जब कोई पहले से सूचीबद्ध (Listed) कंपनी अतिरिक्त पूँजी जुटाने के लिए जनता को नए शेयर जारी करती है।
बिक्री का प्रस्ताव (OFS - Offer for Sale): इसमें कंपनी नए शेयर जारी नहीं करती, बल्कि मौजूदा प्रमोटर/शेयरधारक अपने शेयरों का हिस्सा जनता या संस्थागत निवेशकों को बेचते हैं।
अधिकार निर्गम (Rights Issue): जब कोई सूचीबद्ध कंपनी अपने मौजूदा शेयरधारकों को उनकी वर्तमान हिस्सेदारी के अनुपात में रियायती दर पर नए शेयर खरीदने का पहला अधिकार देती है।
वरीयता आवंटन (Preferential Allotment): विशिष्ट चयनित व्यक्तियों या संस्थाओं (जैसे एंजेल निवेशक या वेंचर कैपिटल) को प्राथमिकता के आधार पर शेयर जारी करना।

2.2 शेयर बाजार की प्रमुख प्रक्रियाएँ व अवधारणाएँ

T+1 सेटलमेंट साइकल (T+1 Settlement Cycle):
भारत शेयर बाजार व्यापार में 'T+1' (Trade Date + 1 Day) निपटान चक्र को पूरी तरह अपनाने वाला चीन के बाद दुनिया का दूसरा देश बना।
इसका अर्थ है कि यदि आपने सोमवार (T) को शेयर खरीदा/बेचा है, तो शेयर का हस्तांतरण और राशि का भुगतान मंगलवार (T+1) तक पूरा हो जाएगा। इससे बाजार में तरलता (Liquidity) बढ़ती है और जोखिम घटता है।
शॉर्ट सेलिंग (Short Selling):
जब कोई निवेशक किसी शेयर को उसके पास न होते हुए भी इस उम्मीद में बेचता है कि भविष्य में उसकी कीमत गिरेगी, और बाद में कम कीमत पर खरीदकर मुनाफा कमाता है। SEBI ने खुदरा व संस्थागत निवेशकों के लिए शॉर्ट सेलिंग के कड़े नियम तय किए हैं।
सर्किट ब्रेकर (Circuit Breakers):
अत्यधिक उतार-चढ़ाव (Volatility) को रोकने के लिए SEBI द्वारा निर्धारित एक स्वचालित तंत्र। जब सेंसेक्स या निफ्टी 10%, 15% या 20% तक गिरता है या उछलता है, तो पूरे बाजार में ट्रेडिंग कुछ समय के लिए रोक दी जाती है।
ग्रीनशू विकल्प (Greenshoe Option):
IPO में अत्यधिक माँग (Over-subscription) की स्थिति में जारीकर्ता कंपनी को मूल रूप से घोषित संख्या से अधिक (सामान्यतः 15% तक) शेयर जारी करने का अधिकार देता है ताकि सूचीबद्धता के बाद शेयर मूल्य को स्थिर रखा जा सके।

3. SEBI एवं पूँजी बाजार का नियामक ढाँचा

3.1 भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI)

स्थापना व वैधानिक दर्जा: 1988 में एक गैर-संवैधानिक निकाय के रूप में गठित, जिसे SEBI अधिनियम, 1992 द्वारा वैधानिक दर्जा (Statutory Status) प्राप्त हुआ।
त्रिस्तरीय भूमिका (Quasi-Executive, Quasi-Legislative, Quasi-Judicial):
1.
अर्द्ध-विधायी: विनियम एवं दिशानिर्देश बनाना।
2.
अर्द्ध-कार्यकारी: निरीक्षण, जाँच एवं प्रवर्तन करना।
3.
अर्द्ध-न्यायिक: उल्लंघनकर्ताओं पर जुर्माना एवं दंड लगाना।

3.2 बाजार अखंडता व निवेशक संरक्षण पहल

इनसाइडर ट्रेडिंग (Insider Trading) पर रोक: कंपनी की अप्रकाशित मूल्य-संवेदनशील जानकारी (UPSI) के आधार पर अवैध व्यापार पर कड़े दंडात्मक प्रावधान।
SCORES 2.0 (SEBI Complaint Redress System): निवेशकों की शिकायतों के त्वरित एवं पारदर्शी समाधान हेतु एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म।
ASBA (Application Supported by Blocked Amount): IPO में आवेदन करते समय बैंक खाते में से राशि सीधे नहीं कटती, बल्कि आवेदन ब्लॉक हो जाता है। शेयर आवंटित होने पर ही राशि कटती है, जिससे निवेशकों का ब्याज नुकसान नहीं होता।

4. गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियाँ (NBFCs) एवं नियामक ढाँचा

4.1 NBFC क्या है?

गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (NBFC) वह कंपनी है जो कंपनी अधिनियम, 2013 (या 1956) के तहत पंजीकृत होती है और जिसका मुख्य व्यवसाय ऋण देना, शेयरों/बॉन्डों में निवेश करना, पट्टा (Leasing), या जमा स्वीकार करना होता है।

4.2 बैंक बनाम NBFC में मुख्य अंतर

मानदंडबैंक (Commercial Banks)गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (NBFC)
माँग जमा स्वीकार करनाहाँ (चालू व बचत खाता - CASA स्वीकार करते हैं)नहीं (माँग जमा स्वीकार नहीं कर सकते)
भुगतान व निपटान प्रणालीहाँ (चेक जारी कर सकते हैं, UPI/RTGS के हिस्से)नहीं (स्वयं के चेक जारी नहीं कर सकते)
DICGC बीमा सुरक्षाहाँ (₹5 लाख तक जमा बीमा प्राप्त)नहीं (जमाकर्ताओं को DICGC बीमा सुरक्षा नहीं)
मूल अधिनियमबैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949कंपनी अधिनियम, 2013 एवं RBI अधिनियम, 1934 (अध्याय III-B)

4.3 RBI का स्केल-बेस्ड रेगुलेशन (SBR - Scale-Based Regulation)

2018 के IL&FS और दीवान हाउसिंग (DHFL) संकट के बाद NBFC क्षेत्र के सिस्टमिक जोखिम को नियंत्रित करने के लिए RBI ने 2021 से 4-स्तरीय जोखिम-आधारित विनियमन प्रणाली शुरू की:

                               ┌─────────────────────────┐
                               │  Top Layer (शीर्ष स्तर) │ -> (आमतौर पर रिक्त; अत्यधिक जोखिम पर)
                               ├─────────────────────────┤
                               │  Upper Layer (उच्च स्तर)│ -> (Top 25 NBFCs; बैंकों जैसे कड़े नियम)
                               ├─────────────────────────┤
                               │ Middle Layer (मध्य स्तर)│ -> (जमा स्वीकार करने वाली + गैर-जमा > ₹2000 Cr)
                               ├─────────────────────────┤
                               │   Base Layer (आधार स्तर)│ -> (गैर-जमा NBFCs < ₹2000 Cr, नैनो NBFCs)
                               └─────────────────────────┘

5. वैकल्पिक निवेश उपकरण (Alternative Investment Vehicles)

5.1 रियल एस्टेट व इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट (REITs & InvITs)

REITs (Real Estate Investment Trusts): यह म्यूचुअल फंड की तरह कार्य करता है, जहाँ छोटे निवेशकों से पूँजी एकत्र कर व्यावसायिक अचल संपत्ति (Commercial Real Estate) में निवेश किया जाता है। इससे मिलने वाला किराया निवेशकों में लाभांश के रूप में बांटा जाता है।
InvITs (Infrastructure Investment Trusts): यह सड़कों, बिजली ग्रिडों और हाईवे जैसी बुनियादी ढाँचा परिसंपत्तियों में निवेश करता है।
लाभ: बुनियादी ढाँचे और रियल एस्टेट में तरलता (Liquidity) लाना, परिसंपत्ति मुद्रीकरण (Asset Monetization) और आम निवेशकों के लिए स्थिर आय।

5.2 अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड्स (AIFs)

SEBI (AIF) विनियम, 2012 के तहत पंजीकृत निवेश कोष, जिन्हें 3 श्रेणियों में विभाजित किया गया है:

1.
श्रेणी I AIF (Category I): सामाजिक-आर्थिक रूप से वांछनीय क्षेत्रों में निवेश (उदा. स्टार्टअप्स, एंजेल फंड्स, SME फंड्स)।
2.
श्रेणी II AIF (Category II): इसमें कोई विशेष रियायत नहीं मिलती (उदा. प्राइवेट इक्विटी (PE) फंड्स, डेब्ट फंड्स)।
3.
श्रेणी III AIF (Category III): जटिल ट्रेडिंग रणनीतियों और लीवरेज का उपयोग करने वाले फंड (उदा. हेज फंड्स / Hedge Funds)।

🌐 UPSC प्रारंभिक परीक्षा: त्वरित पुनरीक्षण बिंदु (Quick Revision Sheet)

1.
शॉर्ट सेलिंग: भारत में केवल डिलीवरी-आधारित प्रतिभूतियों में संस्थागत निवेशकों के लिए नग्न शॉर्ट सेलिंग (Naked Short Selling) प्रतिबंधित है।
2.
T+1 निपटान: भारत की BSE और NSE पर लागू यह व्यवस्था ट्रेड निष्पादन के अगले कार्यदिवस पर शेयर व धन का हस्तांतरण सुनिश्चित करती है।
3.
DICGC कवर: NBFC में जमा धन पर ₹5 लाख का बीमा कवर लागू नहीं होता; यह केवल बैंकों (वाणिज्यिक व सहकारी) के लिए है।
4.
ASBA: IPO में भाग लेने के लिए अनिवार्य प्रणाली है जिससे जमा राशि बैंक खाते से सीधे ब्लॉक होती है, कटती नहीं।
5.
InvITs व REITs: दोनों SEBI द्वारा विनियमित होते हैं और प्राथमिक बाजार में IPO के माध्यम से तथा द्वितीयक बाजार में लिस्टिंग के जरिए व्यापार करते हैं।

✍️ UPSC प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास प्रश्न (MCQs)

प्रश्न 1: T+1 निपटान चक्र (Settlement Cycle) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

1.
इसका अर्थ है कि शेयर बाजार में सौदों का निपटान व्यापार के दिन से अगले कार्यदिवस के भीतर पूरा हो जाता है।
2.
भारत इस प्रणाली को पूर्ण रूप से लागू करने वाला विश्व का पहला देश बना।
3.
यह व्यवस्था निवेशकों की तरलता जोखिम (Liquidity Risk) को कम करती है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (a) केवल 1 और 2 (b) केवल 1 और 3 (c) केवल 2 और 3 (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b) व्याख्या:

कथन 1 सही है: T+1 का अर्थ Trade Date + 1 Day है।
कथन 2 सही नहीं है: चीन विश्व का पहला देश था जिसने T+1 लागू किया; भारत दूसरा देश बना।
कथन 3 सही है: तेजी से निपटान से बाजार में फँसी पूँजी जल्दी मुक्त होती है, जिससे तरलता जोखिम कम होता है।

प्रश्न 2: गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFCs) के संबंध में निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा कथन सत्य है?

(a) NBFCs माँग जमा (Demand Deposits) स्वीकार कर सकती हैं। (b) NBFCs स्वयं के नाम पर चेक जारी कर सकती हैं। (c) NBFCs में जमाकर्ताओं को ₹5 लाख तक का DICGC बीमा संरक्षण प्राप्त होता है। (d) NBFCs का मुख्य व्यवसाय ऋण देना, प्रतिभूतियों में निवेश करना और लीजिंग है।

उत्तर: (d) व्याख्या: NBFCs माँग जमा (CASA) स्वीकार नहीं कर सकतीं, न ही वे भुगतान व निपटान प्रणाली का हिस्सा बनकर चेक जारी कर सकती हैं। इन पर DICGC बीमा कवर लागू नहीं होता। अतः विकल्प (d) सत्य है।


📝 UPSC मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन ढाँचा (Mains Answer Blueprint)

प्रश्न: "गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFCs) का संकट केवल वित्तीय क्षेत्र तक सीमित न रहकर संपूर्ण अर्थव्यवस्था की संवृद्धि को प्रभावित करता है।" इस कथन के आलोक में हालिया स्केल-बेस्ड रेगुलेशन (SBR) सुधारों का मूल्यांकन कीजिए। (250 शब्द)

                            उत्तर लेखन संरचना (Framework)
                                       │
      ┌────────────────────────────────┼────────────────────────────────┐
      ▼                                ▼                                ▼
[1. प्रस्तावना (20-30 शब्द)]  [2. मुख्य भाग (180-200 शब्द)]   [3. निष्कर्ष (20-30 शब्द)]
• NBFCs की परिभाषा व अर्थव्यवस्था• NBFC संकट के व्यापक प्रभाव:     • SBR से वित्तीय स्थिरता
  में भूमिका (ऋण आपूर्ति में     - रियल एस्टेट व MSME पर असर      तथा नवोन्मेष में संतुलन।
  20%+ योगदान)।                  - बैंकों का स्पिलओवर (Contagion) • 'समावेशी वित्त + सतर्क
                                 • RBI के SBR सुधार (4-स्तरीय)     विनियमन' का भावी मार्ग।
                                 • सुधारों का मूल्यांकन

उत्तर का खाका:

1.
प्रस्तावना:
NBFCs को भारतीय अर्थव्यवस्था का "लास्ट-माइल क्रेडिट डिलीवरी इंजन" माना जाता है, जो बैंकों की पहुँच से दूर क्षेत्रों (MSME, रियल एस्टेट, ऑटो लोन) को वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराती हैं।
2.
मुख्य भाग:
सिस्टमिक जोखिम व अर्थव्यवस्था पर प्रभाव: DHFL व IL&FS संकट ने यह दिखाया कि NBFCs की परिसंपत्ति-देयता असंतुलन (Asset-Liability Mismatch - ALM) से बॉन्ड बाजार और बैंकों में ऋण प्रवाह रुक जाता है, जिससे जीडीपी संवृद्धि दर प्रभावित होती है।
स्केल-बेस्ड रेगुलेशन (SBR) की आवश्यकता: पारंपरिक रूप से NBFCs को 'हल्के विनियमन' (Light-touch regulation) के तहत रखा गया था। SBR ने वित्तीय आकार और सिस्टमिक जोखिम के आधार पर 4 परतें (Base, Middle, Upper, Top Layer) बनाकर बड़े NBFCs पर बैंकों जैसे कड़े नियम (NPA वर्गीकरण, पूंजी पर्याप्तता) लागू किए।
मूल्यांकन: SBR से वित्तीय स्थिरता मजबूत हुई है और बैंकों में सिस्टमिक छूत (Contagion Risk) घटा है, किंतु छोटे NBFCs के लिए अनुपालन लागत (Compliance Cost) बढ़ी है।
3.
निष्कर्ष:
NBFC क्षेत्र के सतत विकास के लिए कड़े पर्यवेक्षण के साथ-साथ तरलता सहायता और फिनटेक-आधारित सह-ऋणदान (Co-lending Model) को बढ़ावा देना आवश्यक है ताकि 'वित्तीय स्थिरता' और 'वित्तीय समावेशन' का संतुलन बना रहे।